Wednesday, March 04, 2026
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बच्चे के मन में क्या चल रहा है, कहीं वो परेशान तो नहीं है, मनोचिकित्सक ने बताया 5 लक्षण को नजरअंदाज न करें माता पिता

Written By: Bharti Singh @bhartinisheeth Published : Nov 21, 2025 03:05 pm IST, Updated : Nov 21, 2025 03:05 pm IST

School Kids Suicide And Mental Health: बच्चों में आत्महत्या के बढ़ते मामले सिर्फ पैरेंट्स ही नहीं समाज को भी परेशान कर रहे हैं। ऐसे में बच्चे को समझना और समझाना दोनों जरूरी हैं। मनोचिकित्सक से जानते हैं बच्चों के व्यहार से कैसे समझें कि वो परेशान चल रहा है?

बच्चों को कैसे समझें- India TV Hindi
Image Source : FREEPIK बच्चों को कैसे समझें

पिछले कुछ सालों में बच्चों की परवरिश पैरेंट्स के लिए सबसे ज्यादा चुनौती का विषय बन चुकी है। डिजिटल युग में बच्चों को फोन, टीवी और सोशल मीडिया से बचाकर रखना मुश्किल है। बच्चों को उम्र से पहले चीजें पता चल जाती हैं। जिससे कई बार बच्चों और माता पिता के लिए चुनौतियां पैदा हो जाती हैं। बच्चों की भावनाओं को समझना और सही राह पर ले जाना किसी भी पैरेंट्स के लिए सबसे चुनौती भरा काम है। हाल ही में बच्चों की आत्महत्या से जुड़े कई मामले सामने आ चुके हैं। जयपुर में एक तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली स्टूडेंट ने सुसाइड कर ली तो वहीं दिल्ली में 16 साल के एक बच्चे ने आत्महत्या कर ली। इन घटनाओं ने हर अभिभावक को हिला कर रख दिया है। पढ़ाई लिखाई और खेल के साथ बच्चे को समझना और समझाना बहुत जरूरी हो गया है। ऐसे में आपको ये पता लगाना जरूरी है कि बच्चे के दिमाग में क्या चल रहा है। वो क्या सोचता है और उसके साथ क्या हो रहा है। मनोचिकित्सक से जानते हैं बच्चों के कुछ अर्ली साइन जो पैरेंट्स को ये जानने में मदद कर सकते हैं कि आपका बच्चा कहीं परेशान तो नहीं है। उसके दिमाग में क्या चल रहा है। 

बच्चे के दिमाग में क्या चल रहा है कैसे समझें? 

डॉक्टर अस्तिक जोशी (चाइल्ड, ऐडोलसेंट व फॉरेंसिक साइकैट्रिस्ट, फोर्टिस हॉस्पिटल दिल्ली और वेदा क्लिनिक रोहिणी) ने बताया कि बच्चे और युवा  उम्र में आत्महत्या जैसे कदम यह संकेत देते हैं कि मानसिक तनाव, भावनात्मक बोझ और अकेलापन उनके भीतर कितनी गहराई तक बैठ चुका है। बच्चों की आत्महत्या कभी अचानक नहीं होती। इसके संकेत अक्सर हफ्तों या महीनों पहले दिखने लगते हैं। समस्या यह है कि बहुत से माता-पिता और शिक्षक इन अर्ली वॉर्निंग साइन को पहचान नहीं पाते या उन्हें नजरअंदाज़ कर देते हैं।

बच्चे के अंदर दिख रहे इन  5 शुरुआती संकेत को बिल्कुल इग्नोर न करें

बार-बार आत्महत्या या मरने की बात करना- अगर आपका बच्चा कभी भी इस तरह की बात करता है तो इसे हल्के में भूलकर भी न लें। बच्चे की बातों पर गौर करें। अगर बच्चा कहता है “मैं नहीं रहना चाहता।” “सब मेरे बिना बेहतर होगा।” “मुझे मर जाना चाहिए।” तो इसे ‘ड्रामा’ या ‘एटेंशन-सीकिंग’ न मानें। बच्चे सीधी भाषा में अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर पाते। ऐसी बातें उनके अंदर गहरे भावनात्मक संघर्ष और निराशा का संकेत हैं।

सेल्फ-हार्म करने की कोशिश करना- कलाई काटना, खुद को खरोंचना, सिर दीवार पर मारना, या खुद को चोट पहुंचाने की कोशिश करना सिर्फ दर्द का इज़हार नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है कि बच्चा भावनाओं को संभाल नहीं पा रहा। डॉक्टर जोशी के अनुसार, सेल्फ-हार्म बच्चे के मन में आत्मघाती विचारों की शुरुआत का संकेत हो सकता है। इन्हें जरूर पहचानें।

अपनी देखभाल छोड़ देना- अगर बच्चा अचानक से अपनी आदतें बदल लें। जैसे नहाना या साफ रहना छोड़ दे। बच्चा खाना न खाए या बहुत कम खाए। बच्चे की सोने की दिनचर्या बिगड़ जाए। बच्चे का स्कूल जाने का मन न करे। बच्चा स्कूल जाना बंद कर दे, तो यह अंदरूनी संघर्ष, डिप्रेशन या चिंता का संकेत हो सकता है। यह बदलाव अक्सर धीरे-धीरे दिखते हैं और बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

दोस्तों, परिवार और एक्टिविटीज़ से दूर होना- अगर बच्चा अचानक कमरे में बंद रहने लगे। दोस्तों से दूरी बना ले, परिवार से बात करना बंद कर दे और पहले पसंद आने वाले कामों में दिलचस्पी खो दे, तो यह भावनात्मक थकान, अकेलेपन और मानसिक संघर्ष का गंभीर संकेत है। यह बदलाव आत्महत्या के जोखिम को बढ़ाते हैं।

रोजमर्रा की गतिविधियों में हिस्सा न लेना- अगर आपका बच्चा स्कूल, खेल, हॉबी, पढ़ाई में भाग नहीं लेना चाहता है। तो इसको समझें। ये सिर्फ आलस नहीं है। यह अक्सर संकेत देता है कि बच्चा मानसिक रूप से सुन्न (numb), अत्यधिक तनावग्रस्त या ओवरवेल्म्ड महसूस कर रहा है। कई बार यह स्थिति आत्महत्या की ओर बढ़ने की शुरुआत होती है।

माता-पिता क्या करें?

  • बच्चे की हर बात और व्यवहार को गंभीरता से लें।
  • उसे डांटने, समझाने या सुधारने के बजाय सिर्फ सुनें।
  • उसे सुरक्षा और समझ का माहौल दें।
  • स्कूल या सोशल मीडिया का दबाव समझने की कोशिश करें।
  • ज़रा-सा भी जोखिम दिखे तो तुरंत चाइल्ड साइकैट्रिस्ट या काउंसलर से मदद लें।
  • किशोरों के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत करें।

Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।)

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