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Amalaki Ekadashi 2021:आमलकी एकादशी, साथ ही जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा

 Written By: India TV Lifestyle Desk
 Published : Mar 22, 2021 11:03 am IST,  Updated : Mar 24, 2021 12:06 pm IST

फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी का व्रत करने का विधान है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है।

Amalaki Ekadashi 2021: कब है आमलकी एकादशी, साथ ही जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा- India TV Hindi
Amalaki Ekadashi 2021: कब है आमलकी एकादशी, साथ ही जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा Image Source : INSTAGRAM/ANGEL_RADHIKAA

फाल्गुन शुक्ल पक्ष की उदया तिथि एकादशी और शुक्रवार का दिन है| आचार्य इंदु प्रकाश के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी का व्रत करने का विधान है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। दरअसल आंवले का एक नाम 'आमलकी' भी है और  इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा के चलते ही इस एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है। भगवान विष्णु को आंवले का वृक्ष अत्यंत प्रिय है।

आंवले के हर हिस्से में भगवान का वास माना जाता है। इसके मूल, यानी जड़ में श्री विष्णु जी, तने में शिव जी और ऊपर के हिस्से में ब्रहमा जी का वास माना जाता है। साथ ही इसकी टहनियों में मुनि, देवता, पत्तों में वसु, फूलों में मरुद्गण और इसके फलों में सभी प्रजापतियों का निवास माना जाता है। जानिए आमलकी एकादशी का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा। 

आमलकी एकादशी का शुभ मुहूर्त

एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 मार्च सुबह 10 बजकर 24 मिनट से  

एकादशी तिथि समाप्त:  25 मार्च 2021 को सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक। 
पारण का समय:  26 मार्च 2021 को सुबह 6 बजकर 18 मिनट से सुबह 8  बजकर 21 मिनट तक।

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आमलकी एकादशी की पूजा विधि

जो इस दिन व्रत रख रहा हो वो एक दिन पहले यानी कि 5 मार्च की रात को भगवान विष्णु को ध्यान करके सोएं। दूसरे दिन सुबह जल्दी सभी कामों से निवृत्त होकर पूजा-स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या फिर मूर्ति को रखें। इसके बाद प्रतिमा के सामने हाथ में तिल, कुश, सिक्का और जल लेकर संकल्प करें कि मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता हूं। मेरा यह व्रत सफलतापूर्वक पूरा हो, इसके लिए श्रीहरि मुझे अपनी शरण में रखें। इसके बाद इस मंत्र का जाप करें।

मम कायिकवाचिकमानसिक सांसर्गिकपातकोपपातकदुरित क्षयपूर्वक श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फल प्राप्तयै श्री परमेश्वरप्रीति कामनायै आमलकी एकादशी व्रतमहं करिष्ये।

इसके बाद भगवान विष्णु की षोड्षोपचार पूजा करें। फिर आंवले के वृक्ष की पूजा करें। इसके लिए सबसे पहले वृक्ष के चारों ओर की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें। पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें।

इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमंत्रित करें। कलश में सुगंधी और पंच रत्न रखें। इसके ऊपर पांच तरह के वृक्षों के पत्ते रखें फिर दीप जलाएं। कलश पर श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं।

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अंत में कलश के ऊपर भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम की मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुरामजी की पूजा करें। रात में भागवत कथा व भजन कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें। अगले दिन सुबह ब्राह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा दें। साथ ही भगवान परशुराम की मूर्ति सहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें। इसके बाद ही स्वयं भोजन करें।

आमलकी एकादशी की व्रत कथा

भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न होने के बाद ब्रह्मा जी के मन में जिज्ञासा हुई कि वह कौन हैं, उनकी उत्पत्ति कैसे हुई। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ब्रह्मा जी परब्रह्म की तपस्या करने लगे। ब्रह्म जी की तपस्या से प्रश्न होकर परब्रह्म भगवान विष्णु प्रकट हुए। विष्णु को सामने देखकर ब्रह्मा जी खुशी से रोने लगे।

इनके आंसू भगवान विष्णु के चरणों पर गिरने लगे। ब्रह्मा जी की इस प्रकार भक्ति भावना देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। और ब्रह्मा जी के आंसूओं से आमकली यानी आंवले का वृक्ष उत्पन्न हुआ।

भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी से कहा कि आपके आंसूओं से उत्पन्न आंवले का वृक्ष और फल मुझे अति प्रिय रहेगा। जो भी आमकली एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करेगा उसके सारे पाप समाप्त हो जाएंगे और व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी होगा। अमालकी एकादशी की कथा में इस संदर्भ में एक राजा की कथा का उल्लेख किया गया है जो पूर्व जन्म में एक शिकारी था।

एक बार आमलकी एकादशी के दिन जब सभी लोग मंदिर में एकादशी का व्रत करके भजन और पूजन कर रहे थे तब मंदिर में चोरी के उद्देश्य से वह मंदिर के बाहर छुप कर बैठा रहा। मंदिर में चल रही पूजा अर्चना देखते हुए वह लोगों के जाने का इंतजार कर रहा था। अगले दिन सुबह हो जाने पर शिकारी घर चला गया।

इस तरह अनजाने में शिकारी से आमलकी एकादशी का व्रत हो गया। कुछ समय बाद शिकारी की मृत्यु हुई और उसका जन्म राज परिवार में हुआ। पण्डित जी कहते है कि कई जगहों पर भगवान विष्णु के थूक से आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति की कथा मिलती है जो सही नहीं है। अगर आंवला भगवान का थूक है तो वह भगवान को इतना प्रिय नहीं हो सकता। 

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