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कोर्ट ने बच्ची को चूमने के आरोपी को बरी किया, फैसला सुनाते हुए कही ये बड़ी बात

 Published : Sep 10, 2025 02:24 pm IST,  Updated : Sep 10, 2025 02:24 pm IST

महाराष्ट्र की ठाणे अदालत ने एक 54 वर्षीय व्यक्ति को 3 साल की बच्ची को गाल पर चूमने और गले लगाने के मामले में बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी की कोई गलत मंशा साबित नहीं हुई।

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कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया। Image Source : PEXELS REPRESENTATIONAL

ठाणे: महाराष्ट्र के ठाणे की एक विशेष अदालत ने एक शख्स को एक बच्ची के साथ छेड़छाड़ के मामले में बरी करते हुए कहा कि शख्स की गलत मंशा नहीं थी। अदालत ने 54 साल के ओमप्रकाश रामबचन गिरी को एक 3 साल की बच्ची के साथ छेड़छाड़ के मामले में बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बच्ची को गाल पर चूमने और गले लगाने की घटना को आपराधिक नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसमें कोई गलत मंशा नहीं थी। यह घटना 9 जनवरी 2021 को हुई थी।

फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कही ये बात

विशेष जज रूबी यू मलवंकर, जो POCSO (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस) एक्ट के तहत मामलों की सुनवाई करती हैं, ने 22 अगस्त को यह फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा कि बच्चियों से प्यार करने वाला कोई भी शख्स स्वाभाविक रूप से उन्हें गोद में उठाकर या गाल पर चूम सकता है। यह हमारे समाज में आम बात है। कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि आरोपी उसी मोहल्ले का रहने वाला था और बच्ची के लिए अजनबी नहीं था, इसलिए उसकी हरकत को पूरी तरह आपराधिक नहीं माना जा सकता।

आखिर क्या था पूरा मामला?

आरोप था कि ओमप्रकाश ने 9 जनवरी 2021 को 2 अलग-अलग मौकों पर एक 3 साल की बच्ची को गले लगाया और गाल पर चूमा। इस मामले में पुलिस ने POCSO एक्ट और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 (महिला की इज्जत को ठेस पहुंचाने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का उपयोग) के तहत केस दर्ज किया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, 'हमारे देश में इस तरह का व्यवहार, जब तक कि यह बच्ची को नुकसान न पहुंचाए या कोई बिल्कुल अजनबी गलत इरादे से ऐसा न करे, आमतौर पर आपत्तिजनक नहीं माना जाता।'

आरोप साबित करने में नाकामी

कोर्ट ने यह भी देखा कि बच्ची को इन घटनाओं के दौरान कोई दर्द नहीं हुआ और न ही वह रोई। जज ने कहा, 'ऐसी स्थिति में बच्ची की इज्जत को ठेस पहुंचाने का इरादा नहीं दिखता। यह एक स्नेहपूर्ण व्यवहार था, जिसे आपराधिक नहीं माना जा सकता।' कोर्ट ने यह भी पाया कि प्रॉसिक्यूशन यह साबित करने में नाकाम रहा कि ओमप्रकाश का इरादा गलत था। इसके अलावा, बच्ची की उम्र साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र या कोई अन्य दस्तावेज पेश नहीं किया गया। बच्ची की मां ने दावा किया कि उनकी बेटी 3 साल की थी, लेकिन उनके बयान के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं मिला।

मां ने खुद घटना को नहीं देखा

मामले की जांच में भी कई कमियां थीं। बच्ची की मां को यह बात एक 12 साल की लड़की और एक अन्य बच्चे ने बताई थी, लेकिन मां ने खुद घटना नहीं देखी। जांच अधिकारी ने उस अहम गवाह का बयान दर्ज नहीं किया, जिसने दूसरी घटना के बारे में मां को बताया था। इसके अलावा, बच्ची के गाल पर खरोंच का दावा किया गया, लेकिन जांच अधिकारी ने बच्ची का मेडिकल टेस्ट तक नहीं करवाया। बच्ची का बयान 7 साल की उम्र में दर्ज किया गया, लेकिन कोर्ट ने इसे विश्वसनीय नहीं माना। बच्ची ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में कबूल किया कि उसके पिता ने उसे कोर्ट में क्या बोलना है, यह सिखाया था। (PTI)

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