नई दिल्ली। वित्त वर्ष 2017-18 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों को हुए घाटे से सरकार का इन बैंकों में किया गया करीब 13 अरब डॉलर का पूंजी निवेश एक तरह से बेकार हो गया और चालू वित्त वर्ष में भी इस स्थिति में सुधार की उम्मीद नहीं है। रेटिंग एजेंसी फिच ने आज यह बात कही। फिच ने चेताया कि बड़े घाटे की वजह से बैंकों की व्यवहार्यता रेटिंग भी प्रभावित होगी।
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फिच ने कहा कि सरकारी बैंकों का घाटा बीते वित्त वर्ष में इतना ऊंचा रहा है कि इससे सरकार द्वारा उनमें डाली गई 13 अरब डॉलर की समूची पूंजी डूब गई। ऐसा कमजोर प्रदर्शन इस साल भी जारी रहने की आशंका है।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि बैंकों के कमजोर नतीजों की वजह गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) की पहचान करने के नियमों में किया गया संशोधन है। उसने कहा कि 12 फरवरी का संशोधन बैंकों के बही खातों को साफ-सुथरा करने की कवायद है और इससे दीर्घावधि में बैंकों की सेहत में सुधार होगा।
इन संशोधनों की वजह से बीते वित्त वर्ष में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के ऋण की लागत बढ़कर 4.3 प्रतिशत हो गई, जो इससे एक साल पहले 2.5 प्रतिशत थी। वहीं इस दौरान कुल बैंकिंग क्षेत्र का एनपीए उम्मीद से ज्यादा तेजी से बढ़कर 12.1 प्रतिशत हो गया, जो एक साल पहले 9.3 प्रतिशत पर था।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का औसत एनपीए 14.5 प्रतिशत तक बढ़ा है। आईडीबीआई बैंक, यूको बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक का एनपीए 25 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है। वित्त वर्ष के दौरान 21 में से 19 सार्वजनिक बैंकों को घाटा हुआ। इनमें देश का सबसे बड़ा भारतीय स्टेट बैंक भी शामिल है। निजी क्षेत्र के बैंक भी इस स्थिति से अछूते नहीं हैं। एक्सिस बैंक को पहली बार तिमाही नुकसान हुआ है।