आज के समय में नया स्मार्टफोन, फ्रिज, स्मार्ट टीवी या एसी खरीदना पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है। इसकी वजह है नो कॉस्ट EMI। ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स से लेकर बड़े-बड़े शोरूम तक हर जगह यह ऑफर दिखाई देता है। ग्राहकों को लगता है कि बिना एक्स्ट्रा ब्याज दिए महंगा सामान आसानी से खरीदा जा सकता है। लेकिन यही सुविधा कई बार लोगों को आर्थिक जाल में भी फंसा सकती है। चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक का मानना है कि नो कॉस्ट EMI का सबसे बड़ा असर लोगों की सोच पर पड़ता है।
सीए नितिन कौशिक के अनुसार, जब किसी 1.2 लाख रुपये के स्मार्टफोन की कीमत एक साथ दिखाई देती है, तो कई लोग खरीदने से पहले दो बार सोचते हैं। लेकिन जब वही रकम 12 महीनों की 10,000 रुपये की EMI में बदल जाती है, तो खरीदारी आसान और सस्ती लगने लगती है। यही वह मनोवैज्ञानिक बदलाव है, जहां लोग कुल खर्च पर नहीं बल्कि मासिक किस्त पर ध्यान देने लगते हैं।
क्या सच में फ्री होती है No Cost EMI?
नो कॉस्ट ईएमआई में ग्राहक को अलग से ब्याज नहीं देना पड़ता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई लागत नहीं होती। कई बार कंपनियां डिस्काउंट कम कर देती हैं, प्रोसेसिंग फीस जोड़ देती हैं या अन्य शुल्कों के जरिए अपनी लागत निकाल लेती हैं। ऐसे में ग्राहक को लगता है कि वह बिना एक्स्ट्रा खर्च के खरीदारी कर रहा है, जबकि असलियत कुछ और हो सकती है।
कई EMI मिलकर बन जाती हैं बड़ा बोझ
शुरुआत में एक EMI छोटी लगती है। लेकिन जब मोबाइल, टीवी, कार, फर्नीचर और होम रेनोवेशन जैसी कई EMI एक साथ चलने लगती हैं, तब मासिक बजट पर दबाव बढ़ जाता है। कुछ लोगों की सैलरी का बड़ा हिस्सा हर महीने EMI चुकाने में चला जाता है। इससे बचत, इन्वेस्टमेंट और इमरजेंसी जरूरतों के लिए पैसे कम पड़ने लगते हैं।
भविष्य की कमाई पर बढ़ता है दबाव
EMI का मतलब है भविष्य की आय को आज ही खर्च कर देना। जब आप कर्ज लेते हैं, तो यह मानकर चलते हैं कि आने वाले महीनों या वर्षों में आपकी कमाई स्थिर रहेगी। लेकिन नौकरी छूटना, मेडिकल इमरजेंसी या आर्थिक संकट जैसी परिस्थितियां किसी भी समय आ सकती हैं। ऐसे में EMI का बोझ और भारी महसूस होने लगता है।
खरीदने से पहले अपनाएं 'डबल टेस्ट'
सीए नितिन कौशिक एक आसान नियम बताते हैं। उनके मुताबिक अगर आप किसी वस्तु को दो बार नकद खरीदने की क्षमता नहीं रखते, तो संभव है कि वह वस्तु आपकी मौजूदा आर्थिक स्थिति के हिसाब से महंगी हो। यह नियम लोगों को अपनी फाइनेंशियल क्षमता समझने और गैर-जरूरी खर्चों से बचने में मदद कर सकता है।