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EPF स्कीम की सैलरी लिमिट में होगा बदलाव? सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फैसला लेने के लिए दिया 4 महीने का समय

 Edited By: Sunil Chaurasia
 Published : Jan 05, 2026 10:25 pm IST,  Updated : Jan 05, 2026 10:25 pm IST

याचिकाकर्ता के वकील प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने अपनी दलील में कहा कि देश के कई हिस्सों में न्यूनतम वेतन इस लिमिट से ज्यादा होने के बावजूद ईपीएफ की सैलरी लिमिट में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

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सुप्रीम कोर्ट Image Source : PTI

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 'कर्मचारी भविष्य निधि' (EPF) योजना में सैलरी लिमिट के संशोधन पर 4 महीने के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया है। ईपीएफ योजना में सैलरी लिमिट में पिछले 11 सालों से कोई बदलाव नहीं किया गया है। सोमवार को सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस ए. एस. चंदुरकर की बेंच ने ये आदेश सुनाया। याचिका के मुताबिक, कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं संचालित करने वाला 'कर्मचारी भविष्य निधि संगठन' (EPFO) इस योजना में 15,000 रुपये से ज्यादा की मंथली सैलरी वाले कर्मचारियों को शामिल नहीं करता है। 

याचिकाकर्ता के वकीलों ने क्या बताया

याचिकाकर्ता के वकील प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने अपनी दलील में कहा कि देश के कई हिस्सों में न्यूनतम वेतन इस लिमिट से ज्यादा होने के बावजूद ईपीएफ की सैलरी लिमिट में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इससे बड़ी संख्या में कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा और भविष्य निधि के लाभ से वंचित रखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटान करते हुए याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वो दो हफ्ते के भीतर आदेश की प्रति के साथ केंद्र सरकार के समक्ष प्रतिवेदन रखें। सरकार 4 महीने के भीतर इस बारे में कोई फैसला ले। याचिका में तर्क दिया गया कि पिछले 70 सालों में सैलरी लिमिट का पुनरीक्षण बहुत मनमाने ढंग से हुआ है और कभी-कभी तो ये 13-14 साल के अंतराल के बाद हुआ है। इस दौरान महंगाई, न्यूनतम वेतन या प्रति व्यक्ति आय जैसे आर्थिक संकेतक से कोई संबंध नहीं रखा गया। 

बहुत कम कर्मचारियों को मिल रहा है योजना का लाभ

याचिका के मुताबिक, "इस असंगत नीति के कारण ईपीएफ योजना के तहत पहले की तुलना में आज बहुत कम कर्मचारियों को इसका लाभ मिल रहा है। साल 2022 में ईपीएफओ की उप-समिति ने सैलरी लिमिट बढ़ाने और ज्यादा कर्मचारियों को योजना में शामिल करने की सिफारिश की थी, जिसे केंद्रीय बोर्ड ने भी मंजूरी दे दी थी। लेकिन केंद्र सरकार ने अब तक इस पर फैसला नहीं लिया है।" याचिका के मुताबिक, पिछले 70 सालों में ईपीएफ योजना की सैलरी लिमिट में हुए संशोधन के विश्लेषण से पता चलता है कि शुरुआती 30 सालों में ये एक समावेशी ढांचे के रूप में थी, लेकिन पिछले तीन दशकों में ये स्पष्ट रूप से ज्यादा कर्मचारियों को बाहर रखने का जरिया बन गई है।

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