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जन्म से पहले ही रिश्ता पक्का! एक लड़की लो और एक वापस दो; जानें क्या है राजस्थान की आटा-साटा प्रथा

Written By: Khushbu Rawal @khushburawal2 Published : Jan 24, 2026 12:03 am IST, Updated : Jan 24, 2026 12:03 am IST

आटा-साटा की वजह से पश्चिमी राजस्थान में हजारों रिश्ते टूट रहे हैं। हर गांव में 20-30 ऐसे उदाहरण जरूर मिल जाएंगे जहां अदला-बदली वाले रिश्ते से शादी टूट गई या फिर रिश्तों में अनबन हो गई। यह परंपरा भले ही एक समय में जरूरत थी, लेकिन अब समाज को ऐसे रिश्तों की जरूरत है जो बराबरी और सम्मान पर टिके हों, न कि अदला-बदली पर।

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Image Source : PEXELS राजस्थान की आटा-साटा प्रथा में बेटे-बेटी की अदला-बदली होती है (प्रतीकात्मक तस्वीर)

देश में हर साल 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। इसे मनाने का उद्देश्य है- समाज और सरकार मिलकर बेटियों के अधिकार, उनके सपने और उनकी संभावनाओं को सम्मान दे सकें। लेकिन आज हम आपको राजस्थान की एक ऐसी प्रथा के बारे में बताएंगे जिसमें दो परिवारों के बीच भाई-बहन की अदला-बदली की जाती है। राजस्थान सरकार ने इस प्रथा को रोकने के लिए कई कानूनों का सहारा लिया है, लेकिन जागरूकता की कमी और सामाजिक रूढ़िवादिता के कारण यह आज भी कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है, जो महिलाओं के सशक्तिकरण में एक बड़ी बाधा है।

क्या है आटा-साटा प्रथा?

आटा-साटा प्रथा एक ऐसी परंपरा है जिसमें दो परिवारों के बीच बेटे-बेटी का आदान-प्रदान होता है, लेकिन यह प्रथा अक्सर दांपत्य जीवन और परिवारों के बीच तनाव का कारण बनती है। इसमें एक परिवार की बेटी की शादी दूसरे परिवार के बेटे से और दूसरे परिवार की बेटी की शादी पहले वाले बेटे से होती है, जो अक्सर लड़कियों की सहमति के बिना, पारिवारिक दबाव या संपत्ति को बचाने के लिए की जाती है। राजस्थान के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी आटा-साटा प्रथा की पुरानी परंपरा देखने को मिलती है। हालांकि यह देखने में हानिरहित लग सकता है, लेकिन राजस्थान की युवा लड़कियों के जीवन में इस प्रथा का प्रभाव बिल्कुल अलग है। 

सुसाइड करने को मजबूर हो जाती हैं बेटियां

  1. एक तरफ जहां ग्रामीण समाज में इसे दहेज-मुक्त विवाह व्यवस्था माना जाता है, क्योंकि इसमें आर्थिक लेन-देन बहुत कम होता है। परिवार और समाज के लोग यह मानते हैं कि इस तरीके से खर्चा कम होता है। लेकिन इस प्रथा के सकारात्मक पहलू की जगह नकारात्मक पहलू ज्यादा हैं।
  2. कई बार जब एक लड़की के साथ उसके ससुराल में बुरा व्यवहार होता है, तो दूसरी लड़की को भी सजा भुगतनी पड़ती है। क्योंकि दोनों रिश्ते और परिवार एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में डिवोर्स लेना भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि एक परिवार की बेटी का भविष्य दूसरे परिवार की बेटी से बंधा होता है।
  3. इस प्रथा में लड़कियों की कई परिवारों के बीच सौदेबाजी तक हो जाती है, खासकर उम्रदराज लड़कों की शादी के लिए। यह कुप्रथा कई बार लड़कियों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर देती है।

आटा-साटा कुप्रथा के प्रमुख पहलू क्या है?

  • दहेज प्रथा का विकल्प- यह प्रथा दहेज न देने की मजबूरी या आर्थिक कारणों से उपजी है, जहां बेटियों की अदला-बदली से शादी का खर्च कम किया जा सके।
  • पारिवारिक दबाव और जबरन विवाह- इसमें अक्सर लड़कियां अपनी मर्जी के खिलाफ शादी करने के लिए मजबूर होती हैं, क्योंकि उन्हें उनके भाई या परिवार की प्रतिष्ठा के लिए एक 'मोहरे' की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
  • शिक्षा और विकास में बाधा- कम उम्र में शादी होने के कारण लड़कियों की शिक्षा और मानसिक विकास रुक जाता है।
  • महिलाओं पर अत्याचार- अगर किसी एक जोड़े के बीच रिश्ते खराब होते हैं (जैसे घरेलू हिंसा या तलाक), तो दूसरे जोड़े के रिश्ते पर भी इसका सीधा असर पड़ता है और उस लड़की को भी प्रताड़ित किया जाता है।
  • लड़कों की शादी नहीं होने पर आटा-साटा की शर्त- कई मामलों में बच्चों के जन्म से पहले ही रिश्ते तय हो जाते हैं। कई बार लड़कों की शादी नहीं होने पर उनके माता-पिता आटा-साटा की शर्त रखते हैं।

इस प्रथा की वजह से पश्चिमी राजस्थान में हजारों रिश्ते टूट रहे हैं। हर गांव में आपको कम से कम ऐसे 20-30 उदाहरण  जरूर मिल जाएंगे जहां अदला-बदली वाले रिश्ते से शादी टूट गई या फिर रिश्तों में अनबन हो गई। कभी कभी तो बचपन में ही मां-बाप द्वारा ये अदला-बदला का सौदा कर दिया जाता है। इस कुप्रथा के कारण लड़के और लड़कियों दोनों का ही जीवन खराब होता है। 

शिक्षा का प्रसार और महिलाओं में जागरूकता लाने की जरूरत

यह परंपरा भले ही एक समय में जरूरत थी, लेकिन अब समाज को ऐसे रिश्तों की जरूरत है जो बराबरी और सम्मान पर टिके हों, न कि अदला-बदली पर। राजस्थान के कई जिलों में अब यह प्रथा धीरे-धीरे खत्म हो रही है लेकिन अब भी कई ग्रामीणों इलाकों में आटा-साटा के मामले देखने को मिलते हैं। इसके लिए शिक्षा का प्रसार और महिलाओं में जागरूकता लाना जरूरी है कि ताकि लोग लोग यह समझ सके कि रिश्ता लेन-देन नहीं, बल्कि सहमति और सम्मान पर टिका होना चाहिए।

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