देश में हर साल 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। इसे मनाने का उद्देश्य है- समाज और सरकार मिलकर बेटियों के अधिकार, उनके सपने और उनकी संभावनाओं को सम्मान दे सकें। लेकिन आज हम आपको राजस्थान की एक ऐसी प्रथा के बारे में बताएंगे जिसमें दो परिवारों के बीच भाई-बहन की अदला-बदली की जाती है। राजस्थान सरकार ने इस प्रथा को रोकने के लिए कई कानूनों का सहारा लिया है, लेकिन जागरूकता की कमी और सामाजिक रूढ़िवादिता के कारण यह आज भी कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है, जो महिलाओं के सशक्तिकरण में एक बड़ी बाधा है।
आटा-साटा प्रथा एक ऐसी परंपरा है जिसमें दो परिवारों के बीच बेटे-बेटी का आदान-प्रदान होता है, लेकिन यह प्रथा अक्सर दांपत्य जीवन और परिवारों के बीच तनाव का कारण बनती है। इसमें एक परिवार की बेटी की शादी दूसरे परिवार के बेटे से और दूसरे परिवार की बेटी की शादी पहले वाले बेटे से होती है, जो अक्सर लड़कियों की सहमति के बिना, पारिवारिक दबाव या संपत्ति को बचाने के लिए की जाती है। राजस्थान के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी आटा-साटा प्रथा की पुरानी परंपरा देखने को मिलती है। हालांकि यह देखने में हानिरहित लग सकता है, लेकिन राजस्थान की युवा लड़कियों के जीवन में इस प्रथा का प्रभाव बिल्कुल अलग है।
इस प्रथा की वजह से पश्चिमी राजस्थान में हजारों रिश्ते टूट रहे हैं। हर गांव में आपको कम से कम ऐसे 20-30 उदाहरण जरूर मिल जाएंगे जहां अदला-बदली वाले रिश्ते से शादी टूट गई या फिर रिश्तों में अनबन हो गई। कभी कभी तो बचपन में ही मां-बाप द्वारा ये अदला-बदला का सौदा कर दिया जाता है। इस कुप्रथा के कारण लड़के और लड़कियों दोनों का ही जीवन खराब होता है।
यह परंपरा भले ही एक समय में जरूरत थी, लेकिन अब समाज को ऐसे रिश्तों की जरूरत है जो बराबरी और सम्मान पर टिके हों, न कि अदला-बदली पर। राजस्थान के कई जिलों में अब यह प्रथा धीरे-धीरे खत्म हो रही है लेकिन अब भी कई ग्रामीणों इलाकों में आटा-साटा के मामले देखने को मिलते हैं। इसके लिए शिक्षा का प्रसार और महिलाओं में जागरूकता लाना जरूरी है कि ताकि लोग लोग यह समझ सके कि रिश्ता लेन-देन नहीं, बल्कि सहमति और सम्मान पर टिका होना चाहिए।
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