Boys Ear Piercing: आज के दौर में लड़कों का कान छिदवाना केवल फैशन और स्टाइल से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन ज्यादातर लोग ये नहीं जानते हैं कि सिर्फ लड़कियां ही नहीं बल्कि लड़कों का कान छिदवाना भी सनातन धर्म की मुख्य परंपरा मानी गई है। हिंदू धर्म में इस परंपरा को 'कर्णवेध संस्कार' के नाम से जाना जाता है। ये संस्कार आमतौर पर शिशु के जन्म के छठे, सातवें, आठवें, बारहवें या सोलहवें महीने में किया जाता है। लेकिन समय के साथ-साथ ये परंपरा सिर्फ लड़कियों तक ही सीमित होती जा रही है। चलिए जानते हैं हमारे धर्म-शास्त्र लड़कों के कान छिदवाने को लेकर क्या कहते हैं।
धर्म-शास्त्रों के अनुसार लड़कों का कान छिदवाना क्यों जरूरी?
- सनातन धर्म के 16 संस्कारों में से कर्णवेध नौवां संस्कार माना जाता है। शास्त्रों अनुसार ये संस्कार लड़कियों ही नहीं लड़कों के लिए भी अनिवार्य है। कहते हैं कान छिदवाने से बालक की बुद्धि तेज होती है और उसकी एकाग्रता शक्ति भी बढ़ती है। ज्योतिष के अनुसार इससे राहु-केतु जैसे ग्रहों का अशुभ प्रभाव भी कम होता है और कुंडली में बुध ग्रह मजबूत होता है। जिससे बोलने की शक्ति में सुधार होता है।
- प्राचीन काल में राजा-महाराजा भी कान छिदवाते थे और सनातन धर्म के सभी देवताओं को भी कान में कुंडल पहने देखा जाता है। इससे ये स्पष्ट हो जाता है कि लड़कों के कान छिदवाने की परंपरा प्राचीन समय से ही चली आ रही है।
- हमारा पौराणिक ग्रंथ सुश्रुत कहता है की रोग आदि से रक्षा के लिए भी बालकों का कान छिदवाना जरूरी है। वेदों में भी कहा गया है कि जो अपने कानों में सोना धारण करता है, उसके तेज को राक्षस भी नही हर सकते। जैसा कि रामचरित मानस में वर्णन आता है कि भगवान राम का भी कर्णवेध संस्कार हुआ था।
विज्ञान अनुसार भी कान छिदवाना फायदेमंद
- विज्ञान के नजरिए से देखें तो कान के निचले हिस्से में एक केंद्र बिंदु होता है जो मस्तिष्क के बाएं और दाएं गोलार्द्धों को जोड़ने में मदद करता है। ऐसे में कान छिदवाने से मस्तिष्क सक्रिय होता है जिससे याददाश्त अच्छी रहती है।
- कहा जाता है कि कान छिदवाने से आंखों की रोशनी भी तेज होती है।
- इतना ही नहीं कान छिदवाने से तनाव भी कम होता है।
- कहते हैं बच्चों का छोटी उम्र में ही कान छेद देने से उनके दिमाग का विकास सही तरह से होता है।
- कान छिदवाने से पाचन क्रिया भी दुरुस्त रहती है।
लड़कों का कौन सा कान छिदवाना चाहिए?
वैसे तो लड़कों का दोनों कान छिदवाने की परंपरा है। लेकिन अगर आप दोनों नहीं छिदवाना चाहते हैं तो फिर आप बायां कान छिदवाएं। बता दें जन्म के छठे, सातवे, आठवें या बाहरवें महीने में कर्णवेध संस्कार का उचित समय होता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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