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ट्रेन के इंजन की खिड़की पर जाली क्यों लगी होती है, जवाब सपने में भी नहीं सोचा होगा; आज जान लीजिए

 Written By: Shaswat Gupta
 Published : Dec 20, 2025 10:35 am IST,  Updated : Apr 08, 2026 08:29 am IST

Railway Interesting Facts: इंटरनेट पर रेलवे से संबंधित कई जानकारीपरक तथ्य वायरल होते रहते हैं। आज हम आपको ट्रेन के इंजन से जुड़ा बहुत अनोखा रहस्य बताने वाले हैं।

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इंजन की खिड़की पर लगी जाली। Image Source : INDIANRAILINFO

Railway Interesting Facts: किसी भी एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए लोग ट्रेन का उपयोग जरूर करते होंगे। कई लोगों ने अब तक अपने जीवन की सैकड़ों ट्रेन यात्राएं भी कर ली होंगी। ट्रेन में सफर कर रहे लोगों की नजर कई बार रेलवे ट्रैक पर पड़े पत्थरों पर पड़ती है तो कभी आने वाले रेलवे स्टेशन के बोर्ड पर लिखे 'समुद्र तल से ऊंचाई' पर पड़ती है। इसके अलावा यात्रा के दौरान कई और भी ऐसी चीजें दिखाई देती हैं जिनके अस्तित्व में होने की वजह नहीं मिल पाती है। पैसेंजर्स के मन में ऐसी चीजों को लेकर कई बार सवाल आते हैं मगर उसका जवाब ढूंढ़कर भी नहीं मिलता है। आज ऐसी ही खास चीज के बारे में हम आपको बताएंगे। क्या आपने गौर किया है कि, ट्रेन के इंजन की खिड़की पर जाली लगी होती है..आखिर ऐसा क्यों है और इसकी क्या वजह है ? आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे। 

ट्रेन के इंजन में उपकरण 

ये तो आपको पता ही होगा कि, ट्रेन के इंजन में कई महत्वपूर्ण उपकरण होते हैं। इनमें से इंजन (डीजल/इलेक्ट्रिक/स्टीम), कर्षण मोटर (Traction Motors), कंट्रोल सिस्टम, ट्रांसमिशन सिस्टम और सहायक उपकरण (कूलिंग पंखे, कंप्रेशर आदि) प्रमुख हैं। ये इंजन को शक्ति देने, पहियों को घुमाने, और लोकोमोटिव को सुरक्षित रूप से नियंत्रित करने का काम करते हैं, जिसमें थ्रॉटल, ब्रेक लीवर, और गेज जैसे कंट्रोल शामिल होते हैं। 

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Image Source : INDIANRAILINFOलोकोमोटिव इंजन।

इंजन का फ्यूल सिस्टम 

ट्रेन इंजन के फ्यूल की खपत में काफी भिन्नता होती है, लेकिन इसे आमतौर पर लीटर प्रति किलोमीटर (एलपीकेएम) या लीटर प्रति 1000 सकल टन भार किलोमीटर (जीटीकेएम) में मापा जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पैसेंजर ट्रेनों के लिए 4-6 लीटर/किमी फ्यूल लगता है। मालगाड़ियों का ईंधन खपत भार, गति और ठहराव पर बहुत अधिक निर्भर करता है और भारी मालगाड़ियां खाली ट्रेनों या यात्री ट्रेनों की तुलना में प्रति किलोमीटर कहीं अधिक ईंधन की खपत करती हैं।  

इंजन की खिड़की पर जाली क्यों लगती है

दावा किया जाता है कि, ट्रेन के इंजन की खिड़की पर जाली मुख्य रूप से सुरक्षा के लिए लगाई जाती है, ताकि तेज गति पर पटरी से उड़े पत्थर, धूल, या कोई बाहरी वस्तु इंजन के शीशे से टकराकर टूट न जाए और लोको पायलट (ड्राइवर) को चोट न लगे। यह जाली लोको पायलट को सुरक्षित रखते हुए इंजन के सामने के हिस्से को सुरक्षित करती है, खासकर जब ट्रेन हाई स्पीड (जैसे 130-160 किमी/घंटा) पर चलती है, जहां टक्कर का प्रभाव बहुत अधिक होता है। 

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Image Source : INDIANRAILINFOट्रेन का इंजन।

जाली लगाने की वजह ऐसे समझें 

  • ट्रेन के इंजन की खिड़की पर जाली लोको पायलट को चलती ट्रेन से टकराने वाली वस्तुओं (जैसे गिट्टी, पेड़ की टहनियां) से बचाती है, जिससे दुर्घटनाओं का जोखिम कम होता है।
  • शताब्दी या राजधानी ट्रेनों पर उनकी स्पीड के कारण विपरीत दिशा से आने वाली वस्तुएं बहुत तेजी से टकराती हैं, जिससे शीशा टूटने का खतरा बढ़ जाता है। खिड़की पर लगने वाली जाली इस खतरे को कम करती है।
  • इंजन की खिड़की पर लगी जाली या रॉड यात्रियों को खिड़की से बाहर निकलने या सिर निकालने से भी रोकती है, खासकर सामान्य डिब्बों में, जिससे उनकी सुरक्षा बढ़ती है। 

वंदे भारत जैसी ट्रेनों में नहीं होती जाली 

वंदे भारत जैसी सेमी हाई-स्पीड ट्रेनों में जाली नहीं लगी होती क्योंकि उनमें विशेष, मजबूत और महंगी 'आर्मर्ड ग्लास' का इस्तेमाल किया जाता है। इसे बख्तरबंद शीशा भी कहते हैं, जो पत्थरों से आसानी से नहीं टूटता और विजिबिलिटी भी अच्छी रखता है। 

डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।

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