ईरान के मंत्री का कहना है कि अमेरिका अगर हमले बंद कर देता है तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से खुल जाएगा। वरिष्ठ ईरानी राजनयिक सईद खतीबज़ादेह ने एक कार्यक्रम को दौरान कहा कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करेगा। उनका कहना है कि अमेरिका द्वारा ईरान के साथ युद्ध शुरू करने से पहले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सदियों से खुला था। हालांकि, उन्होंने कहा कि होर्मुज तभी खुलेगा जब अमेरिका वास्तव में हमले बंद कर देगा। उनका इशारा संभवतः लेबनान पर इज़राइल के हमलों की ओर था।
खतीबज़ादेह ने कहा कि ईरान अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करेगा। हालांकि, उन्होंने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज कोई अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नहीं आता है और इसे पार करना और इससे सुरक्षित आवागमन ईरान और ओमान की सद्भावना पर निर्भर करता है। सुरक्षित आवागमन का मतलब यह है कि ईरान हर जहाज से शुल्क नहीं लेगा या उसे उड़ाने की धमकी नहीं देगा? इसके जवाब में मंत्री ने कहा कि ईरान चाहता है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज "शांतिपूर्ण" रहे, लेकिन सुरक्षित आवागमन दोनों पक्षों के लिए आवश्यक है और वह खाड़ी का युद्धपोतों द्वारा दुरुपयोग स्वीकार नहीं करेगा।
क्या है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?
होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ओमान के बीच स्थित एक संकरा जलमार्ग है। यह जलमार्ग, जो अपने सबसे संकरे बिंदु पर लगभग 21 मील (33 किमी) लंबा है, खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है, जिससे यह एक महत्वपूर्ण वैश्विक जहाजरानी मार्ग बन जाता है। इसका आकार डमरू की तरह है, शायद इसीलिए इसे जलडमरूमध्य कहते हैं।
होर्मुज स्ट्रेट का उपयोग कौन करता है?
विश्व के लगभग 20% तेल और लिक्विड प्राकृतिक गैस का आना जाना आमतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर होता है। यह तेल न केवल ईरान से, बल्कि इराक, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों से भी आता है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआईए) के अनुमानों के अनुसार, 2025 में प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल इस जलमार्ग से होकर गुजरेगा, यानी लगभग 600 अरब डॉलर (447 अरब पाउंड) मूल्य का ऊर्जा व्यापार प्रति वर्ष होता है। ईरान पर इजरायल और अमेरिका के हमले के बाद खाड़ी में शुरू हुए युद्ध होने के बाद से समुद्री यातायात में काफी कमी आई है।
होर्मुज का तेल कहा कहां जाता है?
ईआईए के अनुमानों के अनुसार, 2022 में होर्मुज जलडमरूमध्य से निकलने वाले कच्चे तेल और अन्य जीवाश्म ईंधन का लगभग 82% हिस्सा एशियाई देशों की ओर जा रहा था। अनुमान है कि अकेले चीन ईरान द्वारा निर्यात किए जाने वाले तेल का लगभग 90% हिस्सा खरीदता है।