बीजिंग: भारत और चीन के भविष्य के आठ स्तंभों को रेखांकित करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार को कहा कि दोनों देशों के बीच की विभिन्न चुनौतियों को राजनीतिक सूझबूझ और सभ्यतापरक विवेक के जरिए समग्र ढंग से सुलझा लेना चाहिए। पेकिंग विश्वविद्यालय में अपने संबोधन में भारत-चीन संबंधों के लिए जनता की साझेदारी की दिशा में आठ कदमों का उल्लेख करते हुए मुखर्जी ने कहा कि चीन के साथ साझेदारी को मजबूत करने के लिए एक द्विदलीय प्रतिबद्धता है।
उन्होंने कहा कि विकास पर आधारित करीबी साझेदारी के लिए दोनों देशों के बीच राजनीतिक समझ होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि वह जनता-केंद्रित रूख की नींव में इन आठ स्तंभों को लगाकर इस बात से आश्वस्त हैं कि हम दोनों देशों की जनता के साझा लाभ के लिए हमारे सहयोग को पर्याप्त ढंग से बढ़ा एवं मजबूत कर सकते हैं। उन्होंने कहा, इसे करने का एक तरीका राजनीतिक संवाद में वृद्धि लाना है। भारत में चीन के साथ संबंध को मजबूत करने के प्रति एक द्विदलीय प्रतिबद्धता है। हमारे नेताओं के बीच लगातार होने वाले संपर्क इसका प्रमाण हैं।
भारत-चीन संबंध जनता-केंद्रित साझेदारी की दिशा में आठ कदम पर संबोधन देते हुए मुखर्जी ने कहा, हमने साझा आधार को विस्तार दिया है और अपने मतभेदों का प्रबंधन सीखा है। सीमा के सवाल के साथ-साथ कई चुनौतियां हैं, जिन्हें समग्र रूप से निपटाए जाने की जरूरत है। भारत और चीन के बीच 3488 किलोमीटर लंबी सीमा को लेकर मतभेद हैं। बीजिंग का कहना है कि सीमा विवाद 2000 किलोमीटर तक सीमित है और यह अरूणाचल प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में है, जिसे वह दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताता है। वहीं भारत का कहना है कि इस विवाद के दायरे में पूरी वास्तविक नियंत्रण रेखा आती है और इसमें वह अक्सई चिन भी आता है, जिसपर 1962 के युद्ध के दौरान चीन ने कब्जा कर लिया था।