बिहार विधानसभा चुनावों का ऐलान जल्द ही होनेवाला है। इस चुनाव में मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ एनडीए और आरजेडी-कांग्रेस की अगुवाई वाली महागठबंधन से है। वर्ष 1951 में बिहार में विधानसभा का पहला चुनाव हुआ था। तब से लेकर 2020 तक कुल 17 विधानसभा चुनाव हुए हैं। इस लेख में हम जानेंगे कि अब तक चुनावों का क्या इतिहास रहा? चुनावों में किस पार्टी को जीत मिली और कितनी बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा।
2020 विधानसभा चुनाव
2020 का विधानसभा चुनाव बीजेपी और जेडीयू ने साथ मिलकर लड़ा था। एनडीए में इन दोनों दलों के अलावा जीतराम मांझी की हम और मुकेश सहनी की वीआईपी भी शामिल थी। वहीं चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ा था। वहीं दूसरी ओर महागठबंध में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, वाम दलों-सीपीआईएमएल, सीपीआई, सीपीएम का गठजोड़ था। इस चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल 75 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। बीजेपी ने 74 सीटें जीती और वह दूसरे नंबर पर रही। नीतीश की अगुवाई वाली जनता दल यूनाइटेड को केवल 43 सीटें ही मिल पाई। कांग्रेस को 19 सीटों पर सफलता मिली जबकि एलजेपी एक सीट जीत पाने में कामयाब रही। एनडीए की सरकार बनी और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने।
2015 विधानसभा चुनाव
2015 का विधानसभा चुनाव अक्टूबर-नवंबर 2015 में पांच चरणों में हुआ था। इस चुनाव में मुख्य मुकाबला महागठबंधन (जदयू, आरजेडी और कांग्रेस) और एनडीए (भाजपा और सहयोगी) के बीच था। महागठबंधन को कुल 178 सीटों पर जीत हासिल हुई थी जबकि एनडीए केवल 58 सीटों पर सिमट गई थी। जनता दल (यूनाइटेड) - 71, राष्ट्रीय जनता दल - 80 और कांग्रेस को 27 सीटें हासिल हुई थीं। वहीं एनडीए में भाजपा-53, लोजपा-2 और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा-1 सीट हासिल कर सकी थी। चुनाव जीतने के बाद नीतीश कुमार (जनता दल यूनाइटेड) ने 20 नवंबर 2015 को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
2010 विधानसभा चुनाव
2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू और बीजेपी के बीच गठबंधन था। इस चुनाव में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. जेडीयू ने 141 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिनमें 115 पर जीत हासिल की थी जबकि बीजेपी ने 102 में 91 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल ने 168 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे केवल 22 विधानसभा सीटों पर सफलता मिली थी। कांग्रेस को इस चुनाव में करारा झटका लगा और उसके केवल 4 उम्मीदवार ही चुनाव जीत पाए थे। यह कांग्रेस की यह बेहद ही करारी हार थी> इस बार भी नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने थे.
2005 विधानसभा चुनाव
2005 में एक साल के अंदर दो चुनाव हुए थे। फरवरी 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में राबड़ी देवी की अगुवाई में आरजेडी ने केवल 75 सीटें जीती थी जबकि नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड ने 55 और बीजेपी ने 37 सीटों पर जीत हासिल की थी। कांग्रेस केवल 10 सीटें जीत पाई थी। ऐसे में किसी को भी स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हो पाया था। नीतीश कुमार सीएम बने लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। विधानसभा भंग कर दी गई। फिर अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा का चुनाव हुआ। इस चुनाव में जेडीयू 139 सीटों पर चुनाव लड़ी और 88 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, वहीं बीजेपी 102 सीटों पर चुनाव लड़ी और 55 सीटों पर उसे जीत मिली। जबकि आरजेडी-54, लोजपा-10, कांग्रेस-9 सीटें जीत पाई। नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ सरकार बनाई।
2000 विधानसभा चुनाव
1997 में राबड़ी देवी के सीएम बनने के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव था। ये वो समय जब बिहार से अलग करके झारखंड राज्य नहीं बनाया गया था। साल 2000 के नवंबर में झारखंड का गठन हुआ था। उस समय बिहार में 324 सीटें हुआ करती थीं और जीतने के लिए 162 सीटों की ज़रूरत होती थी। राष्ट्रीय जनता दल ने कुल 293 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 124 सीटें हासिल हुई थीं। वहीं, बीजेपी को 168 में से 67 सीटें हासिल हुई थीं, नीतीश कुमार की पार्टी को 120 में से 34 और कांग्रेस को 324 में से 23 सीटें हासिल हुई थीं। कांग्रेस के समर्थन से राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं थीं।
1995 का विधानसभा चुनाव
इस चुनाव में बिहार न तो राष्ट्रीय जनता दल का उदय हुआ था और न ही जेडीयू का। 1994 में नतीतीश कुमार लालू से अलग होकर समता पार्टी का गठन कर चुके थे। लालू की अगुवाई में जनता दल ने 264 सीटों पर चुनाव लड़ा और 167 सीटों पर उसे जीत हासिल हुई। बीजेपी ने 315 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए लेकिन सिर्फ़ 41 सीटों पर ही उसे सफलता मिल सकी। कांग्रेस केवल 29 सीटें जीतने में कामयाब रही। झारखंड मुक्ति मोर्च का 10 और नीतीश कुमार की समता पार्टी को 7 सीटें मिली थीं। लालू प्रसाद सीएम बने थे।
1990 का विधानसभा चुनाव
1990 के विधानसभा चुनाव में जनता दल ने पहली बार बिहार चुनाव लड़ा था। जनता दल ने 122 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। सरकार बनाने के लिए 162 सीटों की जरूरत थी। कांग्रेस-71, बीजेपी 39, जेएमएम-19, सीपीाई-23 सीटें जीती थी। बीजेपी और अन्य दलों के समर्थन से बिहार में लालू प्रसाद के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी थी।
1985 का विधानसभा चुनाव
1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उसे कुल 196 सीटें मिली थीं जो बहुमत से कहीं ज़्यादा थीं। लोकदल को 46, बीजेपी को 16 सीटें मिली थी। इन्हीं चुनावों के बाद बिहार में एक ही कार्यकाल में चार मुख्यमंत्री बने थे।1985 से 1988 तक बिंदेश्वरी दुबे सीएम रहे। उसके बाद भागवत झा आजाद ने सीएम की कुर्सी संभाली। वे करीब एक साल सीएम रहे। फिर सत्येंद्र नारायण सिंह और फिर डॉ जगन्नाथ मिश्रा बिहार के मुख्यमंत्री बने।
1980 विधानसभा चुनाव
1980 में बिहार विधानसभा के लिए हुए चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा) ने शानदार जीत हासिल करते हुए पूर्ण बहुमत प्राप्त किया और सत्ता में वापसी की। इस चुनाव में कांग्रेस ने कुल 324 सीटों में से 169 सीटों पर जीत हासिल की। जनता पार्टी (सेक्युलर) को 42 सीटें मिलीं। सीपीआई-23, बीजेपी-21, जनता पार्टी-13, इंडियन कांग्रेस यू-14, जेएमएम-11 और निर्देलीय को 23 सीटें मिली। यह चुनाव 1977 में जनता पार्टी के हाथों करारी हार के बाद कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण वापसी थी। चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद, जगन्नाथ मिश्र ने मुख्यमंत्री के रूप में बिहार की कमान संभाली। उन्होंने 8 जून 1980 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह उनका दूसरा कार्यकाल था। इस चुनाव के बाद बनी सरकार ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।
1977 विधानसभा चुनाव
1977 बिहार विधानसभा चुनाव मई-जून 1977 में हुए थे। कुल 324 सीटों के लिए मतदान हुआ। यह चुनाव आपातकाल (1975-77) के बाद हुआ था, और राष्ट्रीय स्तर पर जनता पार्टी की लहर थी, जिसने केंद्र में इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार को हराया था। बिहार में मुख्य मुकाबला जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के बीच था। जनता पार्टी को कुल 214 सीटें हासिल हुईं। कांग्रेस को 57, सीपीआई-21, निर्दलीय 24 सीटों पर जीते जबकि अन्य दलों को 8 सीटें हासिल हुईं। जनता पार्टी ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जो आपातकाल के खिलाफ जनता के गुस्से और जनता पार्टी की एकजुटता का परिणाम था। चुनाव जीतने के बाद कर्पूरी ठाकुर (जनता पार्टी) ने 24 जून 1977 को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। कर्पूरी ठाकुर के बाद रामसुंदर दास बिहार के सीएम बने।
1972 विधानसभा चुनाव
1972 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत हुई थी। उसे कुल 167 सीटें मिली थी। वहीं, कांग्रेस (ओ) को 30 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। भारतीय जन संघ को 25, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को 33 सीटों पर सफलता मिली थी। लगभग दो महीने राष्ट्रपति शासन लगा रहा और उसके बाद एक या दो साल के लिए केदार पांडे, अब्दुल गफ़ूर और जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री रहे। लगभग दो महीने राष्ट्रपति शासन लगा रहा और उसके बाद एक या दो साल के लिए केदार पांडे, अब्दुल गफ़ूर और जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री रहे।
1969 विधानसभा चुनाव
बिहार विधानसभा चुनाव फरवरी 1969 में हुए थे। उस समय बिहार में कुल 318 विधानसभा सीटें थीं। यह चुनाव राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच कड़े मुकाबले का गवाह था, और यह दौर बिहार में राजनीतिक अस्थिरता के लिए जाना जाता है। मुख्य मुकाबला भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC), भारतीय जनसंघ (BJS), समाजवादी दलों, और अन्य क्षेत्रीय दलों के बीच था। कांग्रेस-118, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP)-52, भारतीय जनसंघ-34, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी -18, सीपीआई-25, लोकतांत्रिक दल-22, निर्दलीय-26 और अन्य पार्टियां 23 सीट जीतने में सफल रहीं। इस चुनाव के बाद बिहार में राजनीतिक अस्थिरता रही, और कई नेताओं ने अल्पकालिक सरकारें बनाईं। राष्ट्रपति शासन के बाद दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर और भोला पासवान शास्त्री कुछ-कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बने।
1967 विधानसभा चुनाव
1967 बिहार विधानसभा चुनाव फरवरी 1967 में हुए थे। उस समय बिहार में कुल 318 विधानसभा सीटें थीं। यह चुनाव भारत में चौथे आम चुनावों के साथ हुआ और बिहार में राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव का दौर था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का दबददबा था, लेकिन गैर-कांग्रेसी दलों, विशेष रूप से समाजवादी और जनसंघ, ने भी मजबूत चुनौती पेश की।
चुनाव परिणाम: कांग्रेस-128, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP)-68, भारतीय जनसंघ (BJS)-26,प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP)-18, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)-24, स्वतंत्र पार्टी-6, निर्दलीय-37, अन्य पार्टियां-11
कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला (318 में 160 सीटें आवश्यक थीं)। इस कारण गठबंधन और अस्थिरता का दौर शुरू हुआ। महामाया प्रसाद सिन्हा (जन क्रांति दल, जो बाद में कांग्रेस में शामिल हुए) ने 5 मार्च 1967 को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। उनकी सरकार संयुक्त मोर्चा (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और अन्य दलों के समर्थन) पर आधारित थी। हालांकि, उनकी सरकार ज्यादा समय तक नहीं चली, और 25 जनवरी 1968 को उनकी सरकार गिर गई। इसके बाद:सत्येंद्र नारायण सिन्हा (कांग्रेस) ने 1968 में कुछ समय के लिए कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। इसके बाद भोला पासवान शास्त्री (कांग्रेस) ने 22 मार्च 1968 को मुख्यमंत्री पद संभाला, जो 29 जून 1968 तक रहे।
1962 विधानसभा चुनाव
1962 बिहार विधानसभा चुनाव फरवरी 1962 में हुए थे। उस समय बिहार में कुल 318 विधानसभा सीटें थीं। यह चुनाव भारत में तीसरे आम चुनावों के साथ हुआ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का बिहार में मजबूत दबदबा था। मुख्य मुकाबला कांग्रेस और अन्य दलों जैसे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP), स्वतंत्र पार्टी, और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के बीच था।
चुनाव परिणाम: कांग्रेस-185, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP)-29, स्वतंत्र पार्टी-50, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)-12, जनसंघ (BJS)-3, सोशलिस्ट पार्टी-7, निर्दलीय-24, अन्य पार्टियां-8
चुनाव जीतने के बाद बिनोदानंद झा (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) ने 25 फरवरी 1962 को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल 25 फरवरी 1962 से 2 अक्टूबर 1963 तक रहा। उनके बाद कृष्ण बल्लभ सहाय (कांग्रेस) ने 2 अक्टूबर 1963 को मुख्यमंत्री का पद संभाला।
1957 विधानसभा चुनाव
1957 बिहार विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च 1957 में हुए थे। उस समय बिहार में कुल 318 विधानसभा सीटें थीं यह चुनाव भारत के दूसरे आम चुनावों के साथ हुआ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का बिहार में मजबूत दबदबा था। मुख्य मुकाबला कांग्रेस और अन्य दलों जैसे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), और जनसंघ (BJS) के बीच था।
चुनाव परिणाम: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC)-210, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP)-31, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)-7, भारतीय जनसंघ (BJS)-4, झारखंड पार्टी-31, निर्दलीय-29, अन्य पार्टियां-6
चुनाव जीतने के बाद श्रीकृष्ण सिंह (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) बिहार के मुख्यमंत्री बने रहे। उन्होंने 1952 से ही मुख्यमंत्री का पद संभाला था और 1957 के चुनाव के बाद भी वे इस पद पर बने रहे। उनका कार्यकाल 31 अक्टूबर 1961 तक चला, जब उनकी मृत्यु हो गई। श्रीकृष्ण सिंह को बिहार के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक माना जाता है, जिन्होंने राज्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके बाद बिनोदानंद झा ने 1961 में मुख्यमंत्री का पद संभाला।
1951 विधानसभा चुनाव
1951 बिहार विधानसभा चुनाव भारत के पहले आम चुनावों का हिस्सा थे। यह स्वतंत्र भारत का पहला विधानसभा चुनाव था, जो मार्च-अप्रैल 1951/1952 में हुआ। उस समय बिहार में कुल 330 विधानसभा सीटें थीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का दबदबा था, लेकिन समाजवादी दल (SP), झारखंड पार्टी, और अन्य छोटे दल भी सक्रिय थे। परिणाम 1952 की शुरुआत में घोषित किए गए।
चुनाव परिणाम: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC)-239,सोशलिस्ट पार्टी (SP)-23, झारखंड पार्टी-32, लोक सेवक संघ-7, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)-2, निर्दलीय-24, अन्य पार्टियां-3
चुनाव जीतने के बाद श्रीकृष्ण सिंह (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) ने बिहार के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। वे 15 अगस्त 1947 से ही अंतरिम सरकार में मुख्यमंत्री थे और चुनाव के बाद भी इस पद पर बने रहे। उनका कार्यकाल 1952 से 1961 तक उनकी मृत्यु तक चला। श्रीकृष्ण सिंह, जिन्हें "बिहार केसरी" के नाम से जाना जाता है