Highlights
- चुनावी लिहाज से देखें तो उत्तर प्रदेश काफी महत्वपूर्ण राज्य माना जाता है।
- पीएम मोदी कर रहे हैं यूपी का ताबड़तोड़ दौरा।
- पीएम नरेंद्र मोदी की संक्रियता यूपी में लगातार बढ़ रही है।
लखनऊ: यूपी में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। ऐसा माना जा रहा है कि जनवरी के दूसरे सप्ताह में वहां आचार संहिता भी लग सकता है। ऐसे में यूपी विधानसभा 2022 के चुनावी रण में सभी पार्टियां अपना पूरा दमखम लगा रही हैं। सत्ताधारी भाजपा भी अपनी वापसी के लिए लगातार चुनावी रणनीति बना रही है। इसी कड़ी में भाजपा के सबसे बड़े चेहरे और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 7 दिनों के भीतर यूपी में 3 बार दौरा करेंगे।
पीएम मोदी ने खुद सम्भाली यूपी चुनावी की कमान
पीएम नरेंद्र मोदी की संक्रियता यूपी में लगातार बढ़ रही है। कुशीनगर एयरपोर्ट, पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, सरयू नहर परियोजना, काशी कॉरिडोर जैसे बड़े प्रोजेक्ट की सौगात पीएम मोदी ने यूपी को दी है। इसी दिसम्बर महीने में पीएम के प्रयाग काशी लखनऊ और कानपुर में दौरे प्रस्तावित है। पीएम के अलावा उनकी कैबिनेट के सहयोगी भी यूपी को मथने निकल पड़े है। जनविश्वास यात्रा के जरिये यूपी की सभी 403 विधान सभा सीटो तक पहुंचने की तैयारी है।
दिसंबर में पीएम मोदी का यूपी दौरा
7 दिसंबर को गोरखपुर में AIIMS की सौगात
11 दिसंबर बलरामपुर में सरयू नहर परियोजना
13 तथा 14 दिसंबर वाराणसी में काशी कॉरिडोर
18 दिसंबर शाहजहांपुर में गंगा एक्सप्रेस वे की आधारशिला
21 दिसंबर को प्रयागराज में करेंगे योजनाओं का उद्घाटन
23 दिसंबर वाराणसी अमूल प्लांट समेत 1550 करोड़ की योजनाएं
28 दिसंबर कानपुर में मेट्रो का लोकार्पण
यूपी में भले विकास और राष्ट्रवाद की बातें जोर शोर से सुनाई देती है लेकिन यहां “जाती है कि जाति नही”। सो दल कोई भी हो सबके दिलों में जातिगत समीकरणों को साधने की ललक साफ नजर आती है।
बयानों में विकास की डगर, मगर धार्मिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर खासा जोर
बीजेपी जहां हिंदुत्व की छतरी को खोल अयोध्या काशी और मथुरा के सहारे चुनावो में बाजी मारने की कवायद कर रही है। तो अति पिछड़ी जातियों को साधने की रणनीति भी सधे कदमो से लागू कर रही है। सीएम योगी से लेकर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या तक सबके बयानों में विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने का जिक्र होता है तो अयोध्या और काशी का नाम को लेकर बढ़े यूपी के गौरव का गान भी सुनाई पड़ता है। इस बार बात केवल अयोध्या और काशी तक नही है बल्कि पश्चिम में ब्रिज क्षेत्र के मथुरा का जिक्र भी बीजेपी की रणनीति को बयां कर रहा है।
सभाओं में भीड़ उमड़ने से अखिलेश भी हैं उत्साहित
सियासी लड़ाई अगर बहु कोणीय रहती है तो बीजेपी को फायदा पहुचेगा लेकिन बीजेपी नेताओं के बयानों में निशाने पर अखिलेश रहते हैं ऐसे में मुकाबला बीजेपी बनाम सपा है ये तस्वीर साफ होती जा रही है। पश्चिम में रालोद के साथ से अखिलेश ने जाट मुस्लिम यादव समीकरण अपने पक्ष में करने का खाका तैयार कर लिया है। पूर्वांचल में ओपी राजभर के सहारे राजभर वोट बैंक हासिल कर सियासी राह की मुश्किल कम करने का प्लान है। संजय चौहान और कृष्णन पटेल जैसे नेताओ की पार्टियों से हाथ मिलाकर अखिलेश पिछड़ा और अतिपिछड़ा समाज को साथ जोड़ने की मुहिम छेड़े हुए है। अखिलेश ने शिवपाल यादव से हाथ मिलाकर यादव वोटबैंक में बिखराव के खतरे को भी कम कर लिया है।
अखिलेश अभी अपने रथ को लेकर पूर्वांचल और बुंदेलखंड और अवध के कुछ एक जिलों में पहुंचे है लेकिन अपनी यात्रा में उमड़ रही भीड़ से उनके कार्यकर्ता बहुत उत्साहित है। हाल ही में अपने करीबियों के ठिकानों पर पड़ी आईटी की रेड को भी अखिलेश जनता की लड़ाई बनाने की कोशिश कर रहे है। ओवैसी के यूपी में हो रहे दौरो से अल्पसंख्यक मतों में बिखराव को लेकर सपा चिंता में दिखाई देती है। इस बार आजम भी जेल में है सो अबू आसिम आजमी, महबूब अली, इकबाल अहमद को मुस्लिम वोट बैंक को लामबंद करने का जिम्मा सौंपा गया है। माया के दलित वोट बैंक पर भी सपा की इस बार निगाहें है बाबा साहेब वाहीन का गठन इसी एजेंडे से किया गया है।
कांग्रेस और बीएसपी भी लड़ाई में, प्रियंका आधी आबादी को साधकर जमीन मजबूत करने में जुटी
प्रियंका गांधी के विरोध करने की सियासत के तरीके से कांग्रेस चर्चा में आ जाती है इंसमे कोई दो राय नही है लेकिन हालत और माहौल ये बता रहे है कि कांग्रेस इससे बहुत कामयाबी की उम्मीद न रखे। पार्टी के परंपरागत वोटर्स का 89 के बाद जो कांग्रेस से मोहभंग हुआ है वो इस विधानसभा चुनाव में नजदीक आता हुआ नजर नही आता। हालांकि प्रियंका गांधी में कांग्रेस को चर्चा में जरूर ला दिया है। लड़की हूँ लड़ सकती हूं के स्लोगन से आधी आबादी को साध कर प्रियंका की यूपी में रफ्तार पकड़ने की कोशिश भी रंग लाती नही दिखती। जहां बीजेपी की तरफ से पीएम मोदी और पार्टी आलाकमान यूपी के अति सक्रिय है वन्ही कांग्रेस की तरफ से यूपी में राहुल गांधी की आमद एक सीमित दायरे में है।
मायावती की रणनीति दलित और ब्राह्मण गठजोड़ के पुराने फॉर्मूले को जिंदा कर 17 और 19 में छिटके गैर जाटव दलित वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने की है जिसमे मुस्लिम तबके को साथ लाकर माया एक बार सरकार बनाने लायक समीकरण बनाना चाहती है। अगर प्रबुद्ध जन सम्मेलन को छोड़ दिया जाय तो बीएसपी की तरफ से यूपी के इस सियासी संग्राम में अभी तक कोई बड़ी रैली या कार्यक्रम देखने को नही मिला है। पार्टी के कई बड़े नेताओं का बीएसपी से मोहभंग हो गया है। इनमे से ज्यादातर सपा में शामिल हो गए हैं। भीम आर्मी की सक्रियता बढ़ने से माया के सामने दलित तबके के युवाओं को अपने साथ रखने की चुनोती बढ़ गयी है।
इम्तिहान बड़ा है और टफ भी सो इसे पास करने के लिए हर मोर्चे को दुरस्त करने में सभी दल जुटे हैं। एक दूसरे से बढ़त बनाने की होड़ में बयानों का दौर तीरों में तब्दील हो गया है। अब ये तीर किसे घायल कर किसे विजय दिलाते हैं इसकी तस्वीर भी धीरे धीरे साफ होती जाएगी।