नई दिल्लीः अगर आधुनिक हिंदी फ़िल्म के इतिहास पर नज़र डालें तो ऐसी अनगिनत फ़िल्में मिल जाएंगी जिन्होने किसी न किसी रुप में इतिहास में जगह बनाई है। ये फ़िल्में अपने कलात्मक तेवर और बेजोड़ अभिनय के लिए आज भी याद की जाती हैं। यहां ये कहने की ज़रुरत नहीं कि ये फ़िल्में व्यवसायिक रुप से भी सफल थी।
हम यहां बात कर रहे हैं महिला प्रधान फिल्मों की जिनमे बेहद मामूली सी दिखने वाली अभिनैत्रियों ने अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी है। तब्बू की बात करें तो उन्होंने अभिनय की शुरुआत तो बाल कलाकार के रुप में की थी लेकिन बतौर हिरोइन माचिस (1996), विरासत (1997), हू तू तू (1999), अस्तित्व (2000), चांदनी बार (2001), मक़बूल (2003), चीनी कम (2007) और हैदर (2014) में उनके अभिनय खूब सराहा गया। इनमें अस्तित्व और चांदनी बार बॉक्स ऑफिस पर अच्छी चली।
इस फ़ेहरिस्त में अगला नाम आता है विद्या बालान का जिन्होंने लीक से हटकर फि़ल्में की जिन्हें बहुत सराहा गया। इनमें पा ( 2009), इश्क़िया ( 2010), नो वन किल्ड जेसिका (2011), डर्टी पिक्चर (2011 और कहानी (2012)।
इन दोनों की फ़िल्मों को देखें तो एक बात बहुत स्पष्ट रुप से सामने आती है और वो ये कि इनकी फ़िल्में या तो बड़े बैनर की थी या फिर बिग बजट थी। इनमें एक दो फ़िल्में अपवाद हो सकती हैं।
तब्बू और विद्या बालान ने इन फ़िल्मों के ज़रिये जहां हिंदी फिल्मों की लंबे समय से चली आ रही हिरोइन की स्टीरिओ छाप इमेज को तोड़ा जो काम बहुत पहले नरगिस, मीना कुमारी, वहीदा रहमान, रेहान सुल्ताना ने बी किया था, वहीं एक बार फिर प्रोड्यूसर को भरोसा दिलाया कि हमारे जैसे पुरुष प्रधान समाज में एक महिला भी लोगों को सिनेमा घर तक खींच कर ला सकती है।
ये तो सच है कि बॉलीवुड फिल्मों में अभिनेताओं का ज्यादा दबदबा रहा है और आज की कहानी भी ज्यादा अलग नहीं है।