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'मिस टनकपुर हाजिर हो' फिल्म रिव्यूः खाप और कानून व्यवस्था पर करारी चोट करती है फिल्म

 Written By: India TV News Desk
 Published : Jun 26, 2015 09:51 am IST,  Updated : Jun 26, 2015 10:18 pm IST

रेटिंग- 3 स्टार अभिनेता- अनु कपूर, ह्रिषिता भट्ट, रवि किशन, राहुल बग्गा, ओम पुरी निर्देशक- विनोद कापड़ी संगीत- पलक मुछल डॉक्यूमेंट्री 'कांट टेक दिस शिट एनीमोर' के लिए नेशनल अवार्ड जीत चुके विनोद कापड़ी फिल्म '

'मिस टनकपुर  हाजिर हो'...- India TV Hindi
'मिस टनकपुर हाजिर हो' फिल्म रिव्यू

रेटिंग- 3 स्टार

अभिनेता- अनु कपूर, ह्रिषिता भट्ट, रवि किशन, राहुल बग्गा, ओम पुरी
निर्देशक- विनोद कापड़ी
संगीत- पलक मुछल

डॉक्यूमेंट्री 'कांट टेक दिस शिट एनीमोर' के लिए नेशनल अवार्ड जीत चुके विनोद कापड़ी फिल्म 'मिस टनकपुर हाजिर हो' से बॉलीवुड में अच्छी शुरुआत करते है। छोटे शहरों में अंधविश्वास, खाप पंचायत के खोखले फैसले से लेकर कानूनी व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए कापड़ी फिल्म के जरिए एक संदेश देते हैं।

समाज का एक तबका ऐसा भी है जहां नारियों से लोग जानवर की तरह पेश आते हैं। भले ही हम कितनी भी कोशिश कर ले, उनके मस्तिष्क से इस सोच को नहीं निकाल सकते। कापड़ी इसकी तस्वीर हमारे सामने पेश करते हैं। लेकन कमजोर पटकथा के चलते वो तस्वीर साफ नहीं हो पाती। उसकी वजह बताने से पहले हम आपको बताते है इस फिल्म की कहानी के बारे में।

टनकपुर गांव के प्रधान सुआलाल गनदास (अनु कपूर) अपने से काफी कम उम्र की लड़की माया (ह्रिषिता भट्ट) से शादीशुदा हैं जिसका वो शारीरिक शोषण करते हैं। यहां माया के चेहरे पर मुस्कुराहट लाता है अर्जुन प्रसाद (राहुल बग्गा) जिससे वो प्यार भी करती है। लेकिन एक रात गनदास अर्जुन को अपनी पत्नी के साथ रंगे हाथों पकड़ लेता है। खूब खातिरदारी के बाद गनदास गांव वालों के सामने उसकी बेइज़त्ती करता है और उसपर मिस टनकपुर, एक प्रतियोगिता में विजय रही भैंस, का बलात्कार करने का आरोप लगा देता है। आगे की कहानी इसके ऊपर चल रही हास्यात्मक कार्यवाही के बारे में है।

एक भैंस का बलात्कार की संकल्पना जितनी सुनने में अविश्वसनीय लगती है उतनी ही रोचक तरीके से इसे फिल्म में दर्शाया गया है।

कापड़ी इसको लेकर फिल्म के कुछ हिस्सों में हंसी-मज़ाक का तड़का डालते है। फिल्म के पहले एक घंटे में उनकी पकड़ थोड़ी ढ़ीली है लेकिन वहीं इन्टर्वल के बाद ये आपको चौकाती है। हंसी-मजाक के मामले में ये फिल्म कामयाब तो होती है लेकिन फिल्म की कहानी कई जगह भटक जाती हैं। कुछ सवाल के जवाब तो अपको फिल्म के अंत तक नहीं मिलते।
 
सड़क पर घायल भैंस को देखकर नायक यानी अर्जुन का उसे सहलाना और फिर समाज में औरत की स्थिति को लेकर नायिका यानी माया का भैंस के आगे रोना, ऐसे कुछ दृश्यों की जरूरत फिल्म में समझ नहीं आती।

अर्जुन का बलात्कार के झूठे इल्ज़ाम में फंस जाने के बाद अपने लिए आवाज़ न उठाना सवाल खड़ा करता है वो भी तब जब इन सब के चलते उसके पिता आत्महत्या कर लेते हैं। वहीं माया का भी ये सब देखते हुए चुप बैठे रहना भी फिल्म को और लचर बनाता है।

फिल्म शारीरिक एवं मानसिक रुप से बलात्कार की शिकार हो रही महिलाओं के लिए आवाज़ उठाने की कोशिश तो करती है लेकिन किसी परिणाम तक नहीं पहुंचा पाती। फिल्म का अंत भी काफी निराशाजनक है।

ऐसे में फिल्म की जान हैं इसके व्यंगात्मक डॉयलाग्स जो समय-समय पर आपको हंसाते है। वहीं अदाकारी के मामले में छोटे से छोटा कलाकार भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। लेकिन इन सबमें ऊपर हैं अनु कपूर जो गांव के अड़ियल प्रधान के किरदार में बिल्कुल फिट बैठते हैं।

अनु के भांजे के किरदार में रवि किशन बिल्कुल उनकी तरह संखीपना और रुपयों का रौब झाड़ने वाले शख्स को बढ़िया निभाते हैं। राहुल बग्गा एक मजबूर, सताए हुए शक्स के किरदार में मासूमियत डालते है। काफी लंबे समय बाद ह्रिषिता भट्ट भी अच्छी वापसी करती हुई दिखती हैं।

घूसखोर पुलिस के किरदार में ओम पुरी भी कमाल का प्रदर्शन करते हैं।

आखिरी राय- अपनी तमाम खामियों के बावजूद फिल्म आपको हंसाती है लेकिन कुछ ही हिस्सों में।

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