नई दिल्लीः पंडित राम प्रसाद बिसमिल किसी परिचय के मोहताज नहीं। उनके द्वारा लिखे गए ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ गज़ल का हर शब्द हर हिंदुस्तानी की जुबान पर है। आजादी से पहले स्वतंत्रता सेनानियों ने इस गीत के जरिए अपने अंदर जोश भरा। हर भारतीय के दिल में इस गीत ने इस कदर जगह बनाई और अंग्रेज़ों से भारत की आज़ादी के लिए वो चिंगारी छेड़ी जिसने ज्वाला का रूप लेकर ब्रिटिश शासन के भवन को लाक्षागृह में परिवर्तित कर दिया था।
जल्द ही फिल्मों के जरिए भी ये गीत हर देशभक्त के जहन में उतरा। हो न हो बिसमिल साहब ने इस गीत से बॉलीवुड में बड़ा योगदान दिया है। फिल्मों का विवरण करने से पहले आपको बताते है 'सरफ़रोशी की तमन्ना' की खोज के पीछे की कहानी-
राम प्रसाद 'बिस्मिल' की तरह क्रान्तिकारीअशफाक उल्ला खाँ भी बेहेतरीन शायर थे। इन दोनों की शायरी की अगर तुलना की जाये तो रत्ती भर का भी फर्क आपको नजर नहीं आयेगा। पहली बार की मुलाकात में ही बिस्मिल अशफाक के मुरीद हो गये थे जब एक मीटिंग में बिस्मिल के एक शेर का जबाव उन्होंने अपने उस्ताद जिगर मुरादाबादी की गजल के मक्ते से दिया था। जब बिस्मिल ने कहा-
"बहे बहरे-फना में जल्द या रब! लाश 'बिस्मिल' की।
कि भूखी मछलियाँ हैं जौहरे-शमशीर कातिल की।।"
तो अशफाक ने "आमीन" कहते हुए जबाव दिया-
"जिगर मैंने छुपाया लाख अपना दर्दे-गम लेकिन।
बयाँ कर दी मेरी सूरत ने सारी कैफियत दिल की।।"
एक रोज का वाकया है अशफाक आर्य समाज मन्दिर शाहजहाँपुर में बिस्मिल के पास किसी काम से गये। संयोग से उस समय अशफाक जिगर मुरादाबादी की यह गजल गुनगुना रहे थे-
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