'जस्सी वेड्स जस्सी' महज एक फिल्म नहीं है, यह 90 के दशक के उस सीधे-सादे, मासूम और खूबसूरत दौर का एक नोस्टैल्जिक सफर है, जिसे डिजिटल शोर और इंस्टेंट कनेक्टिविटी ने हमसे छीन लिया है। निर्देशक परन बावा ने उत्तर भारत के छोटे शहर के दिल से निकली इस कहानी को जिस आत्मीयता और ईमानदारी से परदे पर उतारा है, वह लंबे समय तक याद रहेगा। यह एक ऐसी फिल्म है जो शोर-शराबे वाले हास्य की बजाय सिचुएशन कॉमेडी और किरदारों के बीच की केमिस्ट्री पर दांव लगाती है और जीत जाती है।
कहानी
फिल्म की शुरुआत ही एक दिल को छू लेने वाले नोट से होती है, जिसमें दिवंगत सतीश कौशिक और राजू श्रीवास्तव जैसे दिग्गजों को श्रद्धांजलि दी गई है। यह सिर्फ औपचारिकता नहीं है, बल्कि उस दौर के हास्य और सिनेमाई विरासत के प्रति एक गहरा सम्मान है, जिसकी नींव पर यह फिल्म टिकी है। इसके बाद आया वह पुराने जमाने का ड्रीम सीक्वेंस, जो हमें तुरंत उस दुनिया में खींच लेता है जहाँ प्रेम कहानियाँ सादगी और थोड़ी-सी नाटकीयता से बुनी जाती थीं। यह फिल्म की टोन सेट करता है, थोड़ी पुरानी, बहुत ईमानदार।
कहानी हमें 1996 के उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के हल्द्वानी ले जाती है। यह समय याद और उम्मीदों का था, जब किसी का फ़ोन नंबर पाने के लिए दोस्तों के घरों के चक्कर काटने पड़ते थे और किसी को सोशल मीडिया पर स्टॉक करने की बजाय उसके लौटने का इंतजार किया जाता था। फ़िल्म इस ‘विलंब की संस्कृति’ को एक प्यारे आकर्षण में बदल देती है। मुख्य किरदार जसप्रीत उर्फ़ जस्सी (हर्षवर्धन सिंह देव) एक हताश प्रेमी है, जो अपने सच्चे प्यार, जसमीत (रहमत रतन) की तलाश में है। लेकिन बीच में आ जाता है एक और जस्सी (सिकंदर खेर), जिसकी वजह से कहानी एक मज़ेदार त्रिकोणीय उलझन में फँस जाती है।
यह 1996 की पृष्ठभूमि सिर्फ एक तारीख नहीं है; यह फिल्म की रग-रग में है। ऑडियो कैसेट सुनना, दोस्तों के साथ तांबोला खेलना, ये छोटे-छोटे दृश्य उस युग की आत्मा को पकड़ते हैं। 'दम लगा के हईशा' या 'विक्की विद्या का वो वाला वीडियो' की तरह, 'जस्सी वेड्स जस्सी' भी उस 'नोस्टेल्जिया की चाशनी' में डूबी है जो दर्शकों को अपने बचपन या युवावस्था की याद दिलाती है।
अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी शक्ति इसकी बेदाग और जबरदस्त कलाकार-मंडली है। रणवीर शौरी और मनु ऋषि चड्ढा का समानांतर ट्रैक इस फिल्म की जान है। शौरी, सहगल के रूप में एक सीधे-सादे पारिवारिक व्यक्ति हैं, जिनकी जिंदगी में एक रहस्यमय महिला के फोन कॉल्स से हंगामा मच जाता है। शौरी को हर जॉनर में महारत हासिल है, चाहे वह 'खोसला का घोसला' की स्लाइस-ऑफ-लाइफ कॉमेडी हो या 'लूटकेस' की डार्क कॉमेडी। यहां भी वह इस प्रहसन को एक नयापन देते हैं। उनकी टाइमिंग इतनी सटीक है कि सबसे घिसा-पिटा मजाक भी उनके चेहरे के भाव से ताजा हो जाता है। इंस्पेक्टर करतार सिंह की भूमिका में मनु ऋषि चड्ढा का साथ एक कॉमेडी डबल-एक्ट तैयार करता है जो फिल्म को जोरदार हंसी के पल देता है।
वहीं मुख्य जोड़ी हर्षवर्धन सिंह देव और रहमत रतन एक ताजगी भरी हवा के झोंके की तरह हैं। हर्षवर्धन अपने निराशा और ईमानदारी भरे किरदार में सहज लगते हैं, जबकि रहमत अपनी मासूमियत और आकर्षण से परदे को भर देती हैं। उनकी केमिस्ट्री सहज, अजीब और प्यारी है, जो 90 के दशक के सीधे-सादे रोमांस की भावना को जगाती है, लेकिन इस फिल्म का डार्क हॉर्स हैं सिकंदर खेर। 2008 में डेब्यू करने के बावजूद, सिकंदर को अब ऐसे किरदार मिल रहे हैं जिनमें वह पूरी तरह से रम सकते हैं। इस फिल्म में उनका किरदार एक ऐसी बड़ी बाधा है जो कहानी को मजेदार भावनात्मक मोड़ देती है।
निर्देशन और सिनेमैटिक बारीकी
परन बावा का निर्देशन आत्मविश्वास से भरा और साफ-सुथरा है। बावा पंचलाइन के पीछे नहीं भागते; वह पलों को बुनते हैं। हास्य जबरदस्ती के तमाशे से नहीं, बल्कि स्थितियों की विसंगति और किरदारों के आपसी रिश्तों से उत्पन्न होता है। कला निर्देशन और प्रोडक्शन डिजाइन भी तारीफ के काबिल हैं। फिल्म 90 के दशक के उत्तर भारतीय शादियों की जीवंतता, अनोखे रिश्तेदारों और छोटे शहरों की सादगी को खूबसूरती से दर्शाती है। यह हमें मह एक कहानी नहीं दिखाती, बल्कि एक पूरा युग महसूस कराती है।
फिल्म का प्री-क्लाइमेक्स सीक्वेंस एक सिनेमैटिक मास्टरस्ट्रोक है, एक जोरदार और शानदार ढंग से किया गया रामायण से प्रेरित नाटक। यह दृश्य महान 'जाने भी दो यारों' के प्रतिष्ठित महाभारत नाटक की याद दिलाता है। इसे सच्चे सिनेमा प्रेमी समझेंगे और आनंद लेंगे। इसके बाद का अपहरण दृश्य 90 के दशक की कॉमेडी फिल्मों की भी याद दिलाएगा।
क्यों देखें ये फिल्म
'जस्सी वेड्स जस्सी' इस बात का प्रमाण है कि सच्चे हास्य के लिए शोर-शराबे की नहीं, बल्कि अच्छी लेखनी, ईमानदार अभिनय और एक नेकदिल कहानी की जरूरत होती है। यह हमें उस जमाने की याद दिलाती है जब प्यार थोड़ा धीरे पर गहरा होता था और हंसी के लिए आपको केवल पड़ोस के एक अजीब लेकिन प्यारे परिवार की जरूरत होती थी। यह फिल्म, अपनी बारीकियों, पुराने जमाने के आकर्षण और कलाकारों के दमदार अभिनय के बल पर आज के सिनेमाई परिदृश्य में एक गुदगुदी भरी मुस्कान बनकर उभरती है। रणवीर शौरी और मनु ऋषि चड्ढा की उपस्थिति इसे एक जरूर देखने लायक फिल्म बनाती है।