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Explainer: अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर हुआ समझौता, जानें ये डील क्यों है चीन के लिए झटका

 Published : Oct 21, 2025 06:45 pm IST,  Updated : Oct 21, 2025 06:45 pm IST

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर अहम समझौता हुआ है। यह समझौता चीन के लिए झटका माना जा रहा है। समझौते के बाद अब अमेरिका की पहुंच ऑस्ट्रेलिया के दुर्लभ खनिज संसाधनों तक अधिक आसानी से होगी।

America And Australia Rare Earth Minerals Agreement- India TV Hindi
America And Australia Rare Earth Minerals Agreement Image Source : AP/INDIA TV

America And Australia Rare Earth Minerals Agreement: दुनिया की अर्थव्यवस्था अब तेल या सोने पर नहीं, बल्कि “रेयर अर्थ मिनरल्स” यानी दुर्लभ खनिजों पर टिकी है। यही वो खनिज हैं जिनसे मोबाइल से लेकर मिसाइल तक और सैटेलाइट से लेकर इलेक्ट्रिक कार तक सब कुछ चलता है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने इन दुर्लभ खनिजों को लेकर बड़ी रणनीतिक साझेदारी की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने द्विपक्षीय बैठक के बाद खनिज समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब चीन ने अपने रेयर अर्थ मिनरल्स के निर्यात पर सख्त नियंत्रण लगा रखा है। चलिए ऐसे में समझते हैं कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुई डील चीन के लिए बड़ा झटका क्यों हैं। 

रेयर अर्थ मिनरल्स क्या हैं?

रेयर अर्थ मिनरल्स (Rare Earth Minerals) दरअसल 17 रासायनिक तत्वों का समूह हैं, जिनमें नीओडाइमियम, सेरियम, लैंथेनम, प्रसीओडाइमियम, समेरियम, यूरोपियम जैसे धातु शामिल हैं। ये तत्व आमतौर पर पृथ्वी में कम मात्रा में पाए जाते हैं, लेकिन इनका उपयोग अत्यधिक जरूरी है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टीवी स्क्रीन, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहन, जेट इंजन, रडार सिस्टम, गाइडेड मिसाइलें और डिफेंस टेक्नोलॉजी, कहना गलत नहीं होगा कि 21वीं सदी का हर 'स्मार्ट' उपकरण इन पर निर्भर है।

दुनिया में चीन का वर्चस्व

दुनिया में लगभग 70 से 80 प्रतिशत रेयर अर्थ माइनिंग और रिफाइनिंग पर चीन का नियंत्रण है। चीन के पास विशाल खनिज भंडार हैं, विशेषकर इनर मंगोलिया के बायन ओबो क्षेत्र में। चीन ना केवल इन खनिजों का उत्पादन करता है, बल्कि उनकी प्रोसेसिंग और एक्सपोर्टिंग में भी अग्रणी है। कई देशों की हाई-टेक इंडस्ट्री, खासकर अमेरिका, जापान और यूरोप, चीन से मिलने वाली इन धातुओं पर निर्भर रही है।

यह निर्भरता चीन को एक आर्थिक हथियार देती है कि वह जब चाहे इन खनिजों की सप्लाई रोककर दुनिया पर दबाव बना सकता है।

क्यों अहम है अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया की साझेदारी?

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने डील की है जिसके तहत दोनों देश रेयर अर्थ मिनरल्स के खनन, प्रसंस्करण और आपूर्ति में मिलकर काम करेंगे।
इस समझौते का मकसद यह है कि चीन पर रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर निर्भरता की जा सके। सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाया जा सके जिससे निर्बाध आपूर्ति जारी रहे। इतना ही नहीं इस डील से रक्षा और हाई-टेक सेक्टर को स्थिर सपोर्ट भी मिल सकेगा। ऑस्ट्रेलिया के पास विश्व के लगभग 10 प्रतिशत रेयर अर्थ भंडार हैं, और अमेरिका के पास तकनीकी संसाधन। दोनों देशों की साझेदारी से एक विकल्पिक वैश्विक स्रोत तैयार होगा।

चीन के लिए झटका क्यों है डील?

चीन का रेयर अर्थ एक्सपोर्ट हर साल अरबों डॉलर का होता है। अगर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया मिलकर इसका विकल्प बना लेते हैं, तो चीन का बड़ा विदेशी राजस्व घटेगा। इतना ही नहीं अब तक चीन ने इन खनिजों के जरिए सप्लाई कंट्रोल पॉलिसी अपनाई थी, यानी जो देश उसके खिलाफ बोलता, उसकी सप्लाई घटा दी जाती है। यह डील दबाव की रणनीति को तोड़ देती है। अमेरिका के लिए भी यह डील “टेक्नोलॉजिकल सेफ्टी” की दिशा में बड़ा कदम है। अब वह अपने डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों के लिए चीन पर निर्भर नहीं रहेगा। यह डील केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। 

ऑस्ट्रेलिया को होगा लाभ

ऑस्ट्रेलिया में रेयर अर्थ खनिज मुख्य रूप से वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया और नॉर्दर्न टेरिटरी में पाए जाते हैं। लायनास कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियां पहले से ही चीन के बाहर रेयर अर्थ प्रोसेसिंग में सक्रिय हैं। अब अमेरिका के निवेश और टेक्नोलॉजी से इन परियोजनाओं का विस्तार होगा, इससे ऑस्ट्रेलिया दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेयर अर्थ निर्यातक बन सकता है। यह ना केवल ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा बल्कि उसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक रणनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करेगा।

क्या है चीन का तर्क?

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की डील को लेकर चीन खुश नहीं है। चीन का तर्क है कि इससे  “रेयर अर्थ संसाधनों का राजनीतिकरण” होगा जो वैश्विक बाजार के लिए हानिकारक है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह तर्क उसके बाजार प्रभुत्व के खतरे की वजह से है, क्योंकि अब उसकी मोनोपॉली टूट सकती है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक चीन ने अपने एक्सपोर्ट कोटा घटाना और नई माइनिंग पॉलिसी तैयार शुरू कर दी जिससे वह प्रतिस्पर्धा में बना रहे।

चीन की खनिज शक्ति पर चोट

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की रेयर अर्थ डील सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं बल्कि संबंधों में टर्निंग पॉइंट भी है। यह कदम साबित करता है कि अब दुनिया किसी एक देश, खासकर चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहती है। आने वाले वर्षों में यह साझेदारी चीन के लिए ना केवल आर्थिक झटका बनेगी बल्कि उसकी वैश्विक शक्ति संतुलन की रणनीति को भी चुनौती देगी।

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