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इमरजेंसी वार्ड में विधायक के आने पर खड़ा नहीं हुआ डॉक्टर, सरकार ने की कार्रवाई तो हाई कोर्ट ने लगाई कड़ी फटकार

 Edited By: Mangal Yadav @MangalyYadav
 Published : Nov 22, 2025 10:57 pm IST,  Updated : Nov 22, 2025 11:01 pm IST

हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। दरअसल, सरकारी अस्पताल में एक विधायक निरीक्षण करने पहुंचे थे लेकिन डॉक्टर खड़े होकर उनका अभिवादन नहीं किया था।

सांकेतिक तस्वीर- India TV Hindi
सांकेतिक तस्वीर Image Source : ANI

चंडीगढ़ः पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कोविड ड्यूटी पर तैनात एक सरकारी डॉक्टर के खिलाफ केवल इसलिए अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने पर निराशा जताई क्योंकि वह इमरजेंसी वार्ड में विधायक के आने पर खड़ा नहीं हुआ था। अदालत ने कहा कि यह राज्य का असंवेदनशील और बेहद चिंताजनक रवैया दिखाता है। 

न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की पीठ ने कहा कि समर्पित चिकित्सीय पेशेवरों के साथ होने वाली ऐसी अवांछित घटनाओं पर रोक लगनी चाहिए। अदालत ने हरियाणा के प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि चिकित्सक को ‘स्नातकोत्तर चिकित्सीय पाठ्यक्रम’ के लिए जरूरी ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ (एनओसी) तुरंत जारी किया जाए और उसने राज्य पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। 

डॉक्टर से नाराज हो गए थे विधायक

याचिकाकर्ता डॉ.मनोज हरियाणा सरकार के ‘कैजुअल्टी मेडिकल ऑफिसर’ थे और कोविड-19 महामारी के दौरान सरकारी अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में ड्यूटी पर थे। चिकित्सक की याचिका के अनुसार, एक दिन अस्पताल का निरीक्षण करने आए एक विधायक इस बात पर नाराज हो गए कि डॉक्टर ने उनके आने पर उठकर उनका अभिवादन नहीं किया। इसके बाद राज्य सरकार ने 2016 के हरियाणा सिविल सर्विसेज (दंड और अपील) नियमों के तहत चिकित्सक को मामूली सजा देने का प्रस्ताव रखा और उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया। 

डॉक्टर ने नोटिस में दिया था ये जवाब

डॉ.मनोज ने जून 2024 में अपना जवाब दिया जिसमें उन्होंने कहा कि वह विधायक को पहचान नहीं पाए थे। इसलिए वह खड़े नहीं हुए और उन्होंने ऐसा जानबूझकर नहीं किया था। चिकित्सक के अनुसार, आज तक इस मामले में कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया गया है।

हाई कोर्ट ने सरकार को लगाई फटकार

अदालत ने कहा कि हमें राज्य द्वारा उठाए गए इस कदम पर आश्चर्य और निराशा है कि कोविड काल के दौरान आपातकालीन ड्यूटी पर तैनात एक चिकित्सक को केवल इसलिए नोटिस जारी किया गया क्योंकि वह विधायक के आने पर खड़े नहीं हुए। किसी डॉक्टर से यह उम्मीद करना कि वह आपातकालीन वार्ड में विधायक के आने पर खड़ा हो और ऐसा न करने पर उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना बेहद व्यथित करने वाला है। पीठ ने कहा कि हमारी नजर में इस तरह के आरोप पर चिकित्सक के खिलाफ कार्रवाई करना राज्य की असंवेदनशीलता दिखाता है। उसने कहा कि चिकित्सक को एनओसी न देकर उसे उच्च शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा पूरी तरह मनमाना रवैया है। 

कोर्ट ने लगाया जुर्माना

अदालत ने कहा कि हमें दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि अखबारों में अक्सर समाचार आते हैं कि मरीजों के परिजन या जनप्रतिनिधि चिकित्सकों के साथ बिना किसी ठोस कारण के दुर्व्यवहार करते हैं। अब समय आ गया है कि ऐसी अवांछित घटनाओं पर सख्ती से रोक लगाई जाए और ईमानदार चिकित्सकों को पर्याप्त सम्मान दिया जाए।’’ अदालत ने कहा, ‘‘राज्य सरकार चिकित्सक को तुरंत एनओसी जारी करे। उसने कहा कि याचिका स्वीकार की जाती है और राज्य सरकार को 50,000 रुपये का जुर्माना ‘पीजीआईएमईआर (स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान), चंडीगढ़’ के ‘गरीब मरीज कल्याण कोष’ में जमा करना होगा।

इनपुट-भाषा  

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