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'या तो तिरंगा लहराकर आऊंगा, या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा, पर मैं आऊंगा जरूर'

 Written By: Vineet Kumar Singh @VickyOnX
 Published : Jul 07, 2017 02:20 pm IST,  Updated : Jul 07, 2017 05:25 pm IST

कैप्टन विक्रम बत्रा वह नाम है जो 7 जुलाई 1999 को हिंदुस्तान के शहीदों की सूची में अमर हो गया। इस बहादुर सैनिक अफसर ने जान की बाजी लगाकर वह कर दिखाया जो केवल एक 'परमवीर' ही कर सकता है।

Photo: facebook.com/Indianarmy.adgpi- India TV Hindi
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नई दिल्ली: कैप्टन विक्रम बत्रा वह नाम है जो 7 जुलाई 1999 को हिंदुस्तान के शहीदों की सूची में अमर हो गया। इस बहादुर सैनिक अफसर ने जान की बाजी लगाकर वह कर दिखाया जो केवल एक 'परमवीर' ही कर सकता है। विक्रम बत्रा की कहानी ने कई नौजवानों को अपने सपने सच कर दिखाने का हौसला दिया। उनकी कहानी में असीम बहादुरी है, और उनकी बहादुरी में एक अजीब-सी रूमानियत है। तो आइए, आपको बताते हैं 7 जुलाई 1999 को करगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए इस बहादुर कैप्टन की कहानी...

9 सितंबर 1974 को पालमपुर के रहने वाले जी.एल. बत्रा के घर 2 बेटियों के बाद जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ था। जी.एल. बत्रा की पत्नी कमलकांता की श्रीरामचरितमानस में गहरी श्रद्धा थी, इसलिए उन्होंने इन बच्चों का नाम लव-कुश रखा। बड़े बेटे विक्रम को लव, और छोटे बेटे विशाल को कुश नाम से पुकारा जाने लगा। विक्रम बत्रा की स्कूली शिक्षा DAV स्कूल, और फिर सेंट्रल स्कूल पालमपुर से हुई। विक्रम ने कॉलेज की पढ़ाई DAV चंडीगढ़ से की, और NCC में रहते हुए सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुने गए। यही नहीं, विक्रम ने गणतंत्र दिवस की परेड में भी हिस्सा लिया था।

बढ़िया जॉब ऑफर छोड़कर सेना में शामिल हुए

बचपन में अपना स्कूल सैनिक छावनी में होने के कारण विक्रम ने सेना का अनुशासन देखा था। कॉलेज के बाद उन्होंने सेना में जाने का पूरा मन बना लिया और CDS की तैयारी शुरू कर दी। इस दौरान विक्रम को हांगकांग में भारी वेतन पर मर्चेंट नेवी में भी नौकरी मिल रही थी, लेकिन विक्रम ने सेना में जाने के लिए इस नौकरी को ठुकरा दिया। आखिरकार विक्रम का चयन CDS के जरिए सेना में हो गया, और जुलाई 1996 में उन्होंने IMA देहरादून में दाखिला लिया।

करगिल की लड़ाई में ही बन गए लेफ्टिनेंट से कैप्टन
दिसंबर 1997 में IMA से शिक्षा समाप्त होने के बाद विक्रम को जम्मू के सोपोर में 6 दिसंबर 1997 को 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। पहली जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प और राकी नाब नाम की जगहों पर भारत की विजय पताका फहराने के बाद लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा को कैप्टन बना दिया गया।

पाकिस्तानियों से छीना प्वाइंट 5140, कहा 'ये दिल मांगे मोर'
19 जून, 1999 के विक्रम बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने घुसपैठियों को खदेड़कर प्वाइंट 5140 पर कब्जा जमा लिया। इस महत्वपूर्ण चोटी को जीतने के बाद कैप्टन ने रेडियो से जब ऐलान किया 'ये दिल मांगे मोर', तो उनका नाम सेना ही नहीं, पूरे भारत में छा गया। विक्रम का कोड नेम 'शेरशाह' था, और इस बड़ी जीत के बाद उन्हें 'करगिल का शेर' भी कहा जाने लगा। अगले दिन प्वाइंट 5140 पर लहराते हुए तिरंगे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो मीडिया में आया तो हर भारतीय इस वीर सपूत का दीवाना हो उठा। इसके बाद शुरू हुई प्वाइंट 4875 को कब्जे में लेने की तैयारी।

Photo: facebook.com/Indianarmy.adgpi
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प्वाइंट 4875 को भी पाकिस्तानियों के कब्जे से छुड़ाया
प्वाइंट 5140 को जीतने के बाद विक्रम प्वाइंट 4875 को जीतने के लिए निकल पड़े। समुद्रतल से 17 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस प्वाइंट को जीतना बेहद मुश्किल नजर आ रहा था। विक्रम ने असीम बहादुरी का परिचय देते हुए अपनी टीम के साथ इस प्वाइंट को भी फतह कर लिया, और इस दौरान कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा। 

मकसद को अंजाम देकर शहीद हो गया 'शेरशाह'
मिशन लगभग पूरा हो चुका था कि तभी विक्रम के साथी लेफ्टीनेंट नवीन के पास आकर एक बम फट जाने से नवीन के पैर बुरी तरह जख्मी हो गए। विक्रम बत्रा ने नवीन को तुरंत हटाया, लेकिन एक और जख्मी ऑफिसर को हटाते हुए विक्रम को गोली लग गई और वह शहीद हो गए। कहा जाता है कि उस सुबेदार को हटाते हुए विक्रम ने कहा था, 'तू बाल-बच्चेदार है, हट जा पीछे।' इसी दौरान विक्रम को एक गोली आकर लगी, और भारतमाता का यह सपूत शहीद हो गया। विक्रम के आखिरी शब्द थे, 'जय माता दी।' करगिल की लड़ाई के दौरान विक्रम ने कहा था, 'या तो तिरंगा लहराकर आऊंगा, या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा, पर मैं आऊंगा जरूर।' विक्रम को उनकी बहादुरी के लिए भारत सरकार ने परमवीर चक्र से नवाजा।

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