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शुभ काम के लिए निकलने से पहले क्यों खिलाई जाती है दही-शक्कर? जानिए इस छोटी-सी परंपरा का बड़ा रहस्य

 Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
 Published : Jun 22, 2026 03:40 pm IST,  Updated : Jun 22, 2026 03:40 pm IST

Dahi Shakkar Tradition: दही-शक्कर खाने की दो चीजों का सिर्फ एक पारंपरिक मिश्रण नहीं, बल्कि शुभकामनाओं और अच्छे परिणामों की उम्मीद का प्रतीक है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई है। जानिए इस छोटी-सी परंपरा का बड़ा रहस्य क्या है।

Dahi Shakkar Tradition- India TV Hindi
क्यों खिलाई जाती है दही-शक्कर? Image Source : MAGNIFIC

Dahi Shakkar Tradition: भारतीय परिवारों में किसी शुभ काम के लिए घर से निकलते समय दही-शक्कर खिलाने की सदियों पुरानी परंपरा है। परीक्षा या इंटरव्यू देने जाना हो, नई नौकरी का पहला दिन हो या किसी महत्वपूर्ण यात्रा से पहले दही शक्कर खिलाना बेहद शुभ माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर क्यों यह परंपरा निभाई जाती है? दरअसल, इसके पीछे धार्मिक, स्वास्थ्य और मनोविज्ञान से जुड़े दिलचस्प पहलू भी छिपे हैं। जिनके बारे में हम आपको यहां बताने जा रहे हैं।  

आशीर्वाद और शुभकामनाएं देने की परंपरा

भारतीय संस्कृति में कई ऐसी परंपराएं हैं जो केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि भावनाओं का प्रतीक भी हैं। घर से किसी महत्वपूर्ण काम के लिए निकलते समय दही-शक्कर खिलाना भी ऐसी ही एक परंपरा है। बड़े-बुजुर्ग इसे शुभ संकेत मानते हैं, इसके जरिए अपने आशीर्वाद और शुभकामनाएं व्यक्त करते हैं।

शुभता का प्रतीक

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दही शुद्धता, शांति और समृद्धि का प्रतीक है। वहीं, शक्कर जीवन में मिठास और सफलता की कामना का संकेत देती है। इन दोनों का सेवन एक साथ करना किसी भी नए काम की सकारात्मक शुरुआत माना जाता है। 

सेहत को भी मिलता है लाभ

इस परंपरा का संबंध केवल आस्था तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य के नजरिए से भी दही-शक्कर फायदेमंद माना जाता है। दही में मौजूद कैल्शियम, प्रोटीन और प्रोबायोटिक्स पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं। वहीं शक्कर शरीर को तुरंत ऊर्जा देती है। 

गर्मियों में और बढ़ जाता है महत्व?

गर्म मौसम में दही की तासीर ठंडी होती है। इसलिए गर्मियों के दौरान घर से बाहर निकलने से पहले दही-शक्कर खाने की सलाह दी जाती है। इससे शरीर को ठंडक मिलती है और यात्रा के दौरान होने वाली बेचैनी या थकान महसूस नहीं होती। 

आत्मविश्वास बढ़ाने का जरिया

किसी बड़े काम से पहले तनाव या घबराहट होना आम बात है। ऐसे समय में परिवार का सहयोग और बड़ों का आशीर्वाद व्यक्ति का मनोबल बढ़ाता है। यह परंपरा इसी भावनात्मक जुड़ाव का हिस्सा है। इससे व्यक्ति के मन में सकारात्मकता बढ़ती है और वह पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने काम के लिए निकलता है। यह छोटी सी रस्म यह संदेश देती है कि सफलता मेहनत के साथ-साथ सकारात्मक सोच और अपनों की शुभकामनाओं से भी जुड़ी होती है। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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