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ट्रेन हादसे से कुछ देर पहले सीट अदला-बदली करने वाला शख्स बाल-बाल बचा

 Written By: Bhasha
 Published : Nov 22, 2016 09:44 pm IST,  Updated : Nov 22, 2016 09:44 pm IST

पुखरायां (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के पुखरायां इलाके में बीते रविवार को तड़के हुए भीषण ट्रेन हादसे में संतोष उपाध्याय बाल-बाल बच गए। संतोष चमत्कारिक रूप से अपनी जान बचने के लिए

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पुखरायां (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के पुखरायां इलाके में बीते रविवार को तड़के हुए भीषण ट्रेन हादसे में संतोष उपाध्याय बाल-बाल बच गए। संतोष चमत्कारिक रूप से अपनी जान बचने के लिए ट्रेन में ही सवार रहे एक दंपति के ताउम्र शुक्रगुजार रहेंगे। हालांकि, संतोष को अफसोस है कि वह उस दंपति को कभी शुक्रिया नहीं कह सकेंगे।

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हादसे का शिकार हुई इंदौर-पटना एक्सप्रेस ट्रेन के एस-2 डिब्बे में सफर कर रहे संतोष से हादसे के कुछ ही देर पहले एक दंपति ने अनुरोध किया कि वह एस-5 डिब्बे में चले जाएं। दंपति की सीट एस-5 में ही थी।

संतोष ने बताया कि उन्होंने दंपति के अनुरोध को स्वीकार कर लिया लेकिन उस वक्त उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनका यह फैसला उनकी जान के लिए वरदान साबित होगा और वह ताउम्र इस दंपति के शुक्रगुजार रहेंगे।

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उन्होंने बताया, उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं उन्हें सीट संख्या-11 दे सकता हूं.....उन्होंने पूछा कि क्या हम अपनी सीट बदल सकते हैं, क्योंकि एस-2 में उनकी सीट संख्या-7 थी और दोनों साथ बैठ सकते थे....लिहाजा, मैं इंसानियत की खातिर राजी हो गया, क्योंकि इसमें एक महिला की भी बात थी। संतोष ने कहा, रात 10:30 बज रहे थे और ट्रेन बीना से रवाना हुई थी। उस वक्त मैं एस-5 में चला गया।

इंदौर-पटना एक्सप्रेस के 14 डिब्बे रविवार तड़के पटरी से उतर गए थे, जिसमें 148 लोग मारे गए और करीब 200 अन्य जख्मी हो गए। कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हाल के सालों में सबसे भीषण बताए जा रहे इस हादसे में ट्रेन के चार डिब्बे- एस-1, एस-2, एस-3 और एस-4 - बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। यह हादसा पुखरायां-मालसा स्टेशनों के बीच तड़के तीन बजे हुआ।

संतोष ने कहा, हादसे में दंपति की मौत हो गई। डिब्बे की क्षत-विक्षत हालत देखकर तो मुझे नहीं लगता कि एस-2 में कोई जीवित बचा। रेल अधिकारी जिन्हें बचा सकते थे, उन्हें बचा लिया। पास के खेतों में मारे गए लोगों के शव और घायल लोग तितर-बितर पड़े थे। स्थिति ऐसी थी कि लोगों को शवों पर पांव रखकर चलना पड़ा।

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