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BLOG: और कितनी आफ़रीन-सायरा? ट्रिपल तलाक़ अब नहीं !

 Written By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : May 26, 2016 04:44 pm IST,  Updated : May 26, 2016 04:48 pm IST

बहुत मुश्किल है ऐसे मुद्दे पर कुछ कहना जो अपने धर्म का मसला न हो। तब और मुश्किल हो जाता है जब आप पीड़ित को करीब से जानते हो।

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मीनाक्षी जोशी

BLOG: बहुत मुश्किल है ऐसे मुद्दे पर कुछ कहना जो अपने धर्म का मसला न हो। तब और मुश्किल हो जाता है जब आप पीड़ित को करीब से जानते हो। जो आपकी हम उम्र हो, मां-बाप की छाया से महरूम हो। लेकिन कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, इसलिए ‪#‎TripleTalaq पर अपनी राय रखना ज़रूरी समझती हूँ।

मुस्लिम धर्म में 'ट्रिप्पल तलाक़' यानि पति के बीवी को तीन बार तलाक़ कहने या लिखने से तलाक़ हो जाता है। लेकिन ये मामला महज़ इतना नहीं है, बल्कि इस्लामी उसूल ये कहता है कि पति द्वारा ' एक बार तलाक़ ' कहने के बाद मियां-बीवी को सुलह करने का एक मौका मिलता है, यह एक महीने का समय होता है।ऐसे कुल तीन महीने का वक़्त 'iddah' कहलाता है, जिसमें इस दरमियां दोनों परिवार या मियां-बीवी समझौता कर सकते हैं। मुस्लिम धर्म में तीन बार तलाक़ कह देने भर से अलहदा होने की औपचारिकता पूरी नहीं हो जाती। इसका सीधा मतलब यह है कि, गैर इस्लामी होने के बाद भी यह रिवाज प्रचलन में है। कभी तीन बार तलाक़ कह कर, कभी स्पीड पोस्ट से, कभी skype से तो कभी whatsapp या messenger से तलाक़ कहना महिलाओं के अधिकारों का हनन है।

और इसकी वजह साफ़ है....क्योंकि मुस्लिम समाज के ही कुछ धर्मगुरु इस परम्परा को फिर से परिभाषित नहीं कर पा रहें हैं।  मसलन.... एक वाद-विवाद के दौरान एक मुस्लिम धर्मगुरु ‪#‎AfreenRehman को दिए गए तलाक़ के तरीक़े को ग़लत बता रहें थे , फिर इसे गैर इस्लामी भी कह रहे थे, फिर यह भी कह रहें थे कि इसे तलाक़ ही माना जाएगा। एक मुद्दे पर इतना विरोधाभास समझ से परे है।

अगर यह तलाक़ ग़लत तरीके से लिया गया है इसलिए इसे ख़ारिज माने या फिर इसे इस्लामी तरीका मान लें अगर दोनों सूरत नहीं तो ख़त्म करें ये कानून। अगर मुस्लिम समाज का कोई मर्द 'ट्रिपल तलाक़' का ग़ैर इस्लामी इस्तेमाल कर रहा है तो यह परम्परा या तो ख़त्म होनी चाहिए या फिर इसके ग़लत तरीक़े से इस्तेमाल पर उस मर्द और उसके परिवार को धर्म बहिष्कृत करना चाहिये। और अगर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ये हिम्मत नहीं कर पा रहा तो मुस्लिम महिलाओं के पास सुप्रीम कोर्ट जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जीवन जीने का समान अधिकार देश का संविधान हर नागरिक को देता है।

मुझे बहुत दुःख है आफ़रीन मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पा रही, तुम कभी मेरे बहुत करीब तो नहीं रही लेकिन मैंने करीब से तुम्हारी हिम्मत को समझा और देखा है, तब भी जब हम साथ वक़्त बिताते थे और आज भी जब आज तुम अपने हक़ के लिए लड़ रही हो। मैं नहीं जानती ये तलाक़ क्यों हुआ, नहीं जानती मुस्लिम धर्म तुम्हें कितने अधिकार देता है, लेकिन इतना जानती हूँ कि जिस तरह तलाक़नामा तुम्हें भिजवा दिया गया ये ग़लत है, ग़लत है, ग़लत है।

जब मुस्लिम देशों में ये रिवाज़ ख़त्म हो सकता है तो भारत में भी मुस्लिम समाज को एक साथ सख्त कदम उठाना होगा वरना ऐसी कई और ‪#‎SairaBano आफ़रीन रहमान होंगी जो ग़लत नहीं सहेंगी अपने हक़ को हासिल करने के लिए क़यामत तक जाएंगी। मैं भी इस मुहीम में खुद को हिस्सा मानती हूँ और अन्य महिलाओं-पुरुषों से साथ देने की गुज़ारिश करती हूँ।

(ब्‍लॉग लेखिका मीनाक्षी जोशी युवा पत्रकार हैं और देश के नंबर वन चैनल इंडिया टीवी में कार्यरत हैं। )

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