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अमरनाथ यात्रा पर आतंकी हमला हो सकता है किसी बड़े ख़तरे का संकेत?

 Published : Jul 11, 2017 10:04 am IST,  Updated : Jul 11, 2017 10:04 am IST

अमरनाथ गुफा की खोज भी पहली बार 1850 में एक मुस्लिम चरवाहे बूटा मलिक ने की थी। इसीलिए दशनामी अखाड़े और पुरोहित सभा मट्‌टन के साथ मलिक के परिवार को भी इस गुफा का संरक्षक बनाया गया। यानी यह स्थल सिर्फ हिंदुओं के लिए नहीं बल्कि घाटी के मुस्लिमों के लिए भी

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नई दिल्ली: हिन्दुओं के पवित्र माह सावन के पहले सोमवार को कश्मीर में आतंकियों ने अमरनाथ यात्रियों की एक बस को अपना निशाना बनाया। आतंकियों ने अनंतनाग में पुलिस के काफिले पर हमला करने के बाद अमरनाथ यात्रियों की एक बस पर फायरिंग की जिसमें 7 यात्रियों की मौत की हो गई। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में यह अमरनाथ यात्रियों पर हुई पहली आतंकी घटना है। तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या तीर्थयात्रियों पर यह आतंकी हमला किसी बड़े ख़तरे का संकेत मानी जा सकती है? एक अंग्रेजी दैनिक में छपी ख़बर की मानें तो निश्चित रूप से यह हमला इसी तरह के संकेत देता है क्योंकि इसे एक तरह से कश्मीर की साझी विरासत और परंपरा पर हमला माना जा रहा है। ये भी पढ़ें: भारत और चीन में बढ़ी तल्खियां, जानिए किसके पास है कितनी ताकत

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक बीते 17 साल में आतंकियों ने कभी अमरनाथ यात्रा को निशाना नहीं बनाया क्योंकि यह यात्रा न सिर्फ कश्मीर की परंपरा बल्कि वहां के पर्यटन को मज़बूती देने वाली मानी जाती है। यहां तक कि अमरनाथ गुफा की खोज भी पहली बार 1850 में एक मुस्लिम चरवाहे बूटा मलिक ने की थी। इसीलिए दशनामी अखाड़े और पुरोहित सभा मट्‌टन के साथ मलिक के परिवार को भी इस गुफा का संरक्षक बनाया गया। यानी यह स्थल सिर्फ हिंदुओं के लिए नहीं बल्कि घाटी के मुस्लिमों के लिए भी काफी मायने रखता है।

शायद यही कारण रहा कि आतंकी संगठन अमरनाथ यात्रा को निशाने पर नहीं ले सके। ख़बर के अनुसार इस यात्रा को निशाने पर लेने की पहली कोशिश 1990 के उस दौर हुई जब घाटी में आतंक उभार पर था। सन् 1993 में आतंकी संगठन हरकत-उल-अंसार ने इस यात्रा पर हमले की कोशिश की। उसने अमरनाथ यात्रा पर प्रतिबंध का भी एलान किया। इस संगठन ने अपने इस कदम को बाबरी मस्ज़िद ढहाए जाने के विरोध में की गई कार्रवाई बताया। लेकिन स्थानीय आतंकियों की मदद न मिलने से यह मंसूबा सफल नहीं हो सका।

हालांकि एक अगस्त 2000 को आतंकी अपने मंसूबे में कामयाब रहे। तब पहलगाम में अमरनाथ यात्रा पर हुए हमले में 17 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई थी। कुल 25 लोग मारे गए थे। इनमें दो पुलिस वाले ओर छह ग्रामीण थे। केंद्र में उस वक़्त की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इस हमले के लिए लश्कर-ए-तैयबा को ज़िम्मेदार माना था। लेकिन इसके बाद 2008, 2009, 2010 और 2016 में घाटी में विरोध प्रदर्शन, पत्थरबाज़ी के दौर में भी कभी इस यात्रा पर हमला नहीं किया गया। इसीलिए ताज़ा हमले को नए ख़तरे का संकेत माना जा रहा है।

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