नई दिल्ली: केंद्र उत्तराखंड में फ्लोर टेस्ट करवाने के लिए तैयार है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में राज्य में बहुमत परीक्षण करवाया जा सकता है। अटॉर्नी जरनल ने यह जानकारी सुप्रीम कोर्ट में दी।वहीं केंद्र के इस फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की राह आसान होती दिख रही है, जो लंबे समय से बहुमत परीक्षण की मांग कर रहे थे। हालांकि अभी गेंद केंद्र सरकार के ही पाले में है, वो क्या शर्तें तय करती हैं। वहीं अब सबकी निगाहें कांग्रेस के बाकी नौ विधायकों के भविष्य पर टिकी हैं, क्योंकि बहुमत परीक्षण के दौरान वह मुख्य किरदार हो सकते हैं।
इसके पहले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अटॉर्नी जनरल अगर केन्द्र के रुख के बारे में नहीं बताते हैं तो भी इस मामले की सुनवाई छह मई से शुरू होगी। इतना ही नहीं कोर्ट अगली सुनवाई में इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजने के बारे में विचार कर सकता है।
वहीं इससे पहले सुप्रीम कोर्ट से बुधवार को बड़े फैसले की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट की सलाह पर विचार करने के लिए कुछ समय की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए कि 48 घंटे में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, केंद्र सरकार को थोड़ा समय और दे दिया था।
ये मामला जस्टिस दीपक मिश्रा और शिवकीर्ति सिंह की पीठ में चल रहा है। इसके पहले उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले पर केंद्र सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस को बड़ा झटका दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू रहेगा।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड विधानसभा में 29 अप्रैल को होने वाले शक्ति परीक्षण पर भी रोक लगा दी थी। दरअसल, नैनीताल हाईकोर्ट ने हरीश रावत सरकार को 29 अप्रैल को अपना बहुमत साबित करने को कहा था और प्रदेश में से राष्ट्रपति शासन हटा दिया था।
इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी से पूछा, क्या स्टिंग के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है? वहीं मुकुल रोहतगी ने बताया कि वित्त विधेयक कभी पास ही नहीं हुआ है। 18 मार्च को सरकार ही गिर गई थी।