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नर्सरी दाखिला मुद्दे पर अदालत ने कहा वक्त काफी कम है

 Written By: Bhasha
 Published : Feb 07, 2017 06:18 pm IST,  Updated : Feb 07, 2017 06:20 pm IST

नयी दिल्ली: नर्सरी दाखिले के लिए पड़ोस के मापदंड पर दिल्ली सरकार की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला करने से पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने काफी कम समय होने का उल्लेख करते

Nuresery admission- India TV Hindi
Nuresery admission

नयी दिल्ली: नर्सरी दाखिले के लिए पड़ोस के मापदंड पर दिल्ली सरकार की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला करने से पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने काफी कम समय होने का उल्लेख करते हुए आज कहा कि काफी कम वक्त में तेजी से काम करना है। 

सुनवाई की शुरूआत में न्यायमूर्ति मनमोहन ने कहा, काफी कम वक्त में तेजी से काम करना है। हमारे पास बहुत कम समय है जिसके पहले इस मामले पर फैसला किया जाना है। 

अदालत की टिप्पणी का इसलिए महत्व है क्योंकि स्कूलों में नर्सरी में दाखिले के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया 14 फरवरी को समाप्त होगी। 

उच्च न्यायालय बच्चों के माता-पिता और दो स्कूल समूहों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है जिसमें दिल्ली सरकार की 19 दिसंबर 2016 और सात जनवरी की अधिसूचनाओ को चुनौती दी गई है। इन अधिसूचनाओं में दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की जमीन पर बनाए गए 298 निजी स्कूलों में दाखिले के लिए सिर्फ पड़ोस या दूरी मापदंड पर आधारित नर्सरी दाखिला फॉर्म को स्वीकार करने को कहा गया है। 

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्कूल निकायों में से एक की तरफ से उपस्थित वकील से कहा, उनकी (सरकार की) दलील है कि भूमि आवंटन पत्र के संबंध में चुनौती पर विचार नहीं करें। क्या आप इस रूप में दो भागों में बांट सकते हैं कि अगर अदालत आवंटन पत्र को चुनौती पर विचार नहीं करती है तो क्या आप आवंटन से स्वतंत्र रूप से मापदंड को चुनौती दे सकते हैं। 

इसका जवाब देते हुए वकील ने कहा कि मुद्दे को दो भागों में बांटा जा सकता है क्योंकि नये परिपत्रों के परिणामस्वरूप दो वर्ग के छात्रों के बीच भेदभाव किए जाने का नया आधार आ गया है। 

स्कूल निकाय ने आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार ने स्कूलों के बीच भेदभाव किया हैै क्योंकि पड़ोस मापदंड सिर्फ 298 स्कूलों के खिलाफ लागू किया गया है, जबकि 1400 अन्य स्कूलों के लिए इसे अनिवार्य नहीं बनाया गया है। 

वकील ने कहा, अगर तकरीबन 1400 स्कूलों में जा रहे बच्चों का मुद्दा सरकार के लिए चिंता का विषय नहीं है तो 298 स्कूलों के छात्रों के लिए यह क्यों चिंता का विषय है। क्यों सिर्फ 298 स्कूलों के साथ इस तरह का व्यवहार किया गया है। यह और कुछ नहीं बल्कि मनमानी और भेदभाव है। 

उन्होंने दलील दी कि इन 298 स्कूलों के हितों की भी रक्षा की जानी चाहिए और सरकार होने के नाते उसे छात्रों के बीच भेदभाव नहीं करना चाहिए। 
उन्होंने यह भी दावा किया कि स्कूलों को भूमि आवंटित करने वाले पत्र में पड़ोस मापदंड की कोई परिभाषा नहीं है। 

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