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112 इमरजेंसी सर्विस का रियलिटी टेस्ट: आपके लिए कितनी मददगार यह सेवा, कुछ शहरों में तो 5-7 मिनट में ही पहुंच गई पुलिस

 Edited By: Vineet Kumar Singh
 Published : Mar 14, 2026 06:24 pm IST,  Updated : Mar 14, 2026 10:22 pm IST

डॉयल 112 द्वारा आपात स्थितियों में तुरंत मदद पहुंचाने का दावा किया जाता है। यह सर्विस निर्भया कांड के बाद साल 2012 में शुरू हुई थी। आज भी यह इमरजेंसी सर्विस लाखों लोगों को मदद मुहैया करा रही है। इस इमरजेंसी सर्विस के रिस्पॉन्स टाइम का ग्राउंड पर सच क्या है? जानिए

Dial 112- India TV Hindi
डायल 112 Image Source : INDIA TV

नई दिल्ली/लखनऊ: निर्भया कांड के बाद साल 2012 में शुरू हुई देश की इमरजेंसी सर्विस 112 आज भी लाखों लोगों की जान बचाने का काम कर रही है। इसके तहत एक कॉल पर पुलिस, एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड या महिला हेल्पलाइन द्वारा तुरंत मदद पहुंचाने का दावा किया जाता है। लेकिन इंडिया टीवी ने देश के अलग-अलग शहरों में इसका रियलिटी टेस्ट किया तो सामने आया कि कहीं मदद सिर्फ 4-7 मिनट में पहुंच गई, तो कहीं 53 मिनट तक इंतजार करना पड़ा। उत्तर प्रदेश पुलिस का दावा है कि उनका औसत रिस्पॉन्स टाइम साढ़े 6 मिनट है। लेकिन ग्राउंड पर क्या सच है? आइए देखते हैं पूरा रिपोर्ट।

उत्तर प्रदेश के कंट्रोल रूम से पूरे राज्य में 6278 गाड़ियां जुड़ी हुई हैं। इनमें 4278 चार पहिया और 2000 चेतक मोटरबाइक हैं। हर रोज कंट्रोल रूम में औसतन 45 लाख कॉल आती हैं। ज्यादातर कॉल गलती से कनेक्ट होती हैं जैसे मोबाइल जेब में दबने या बच्चे के द्वारा दबा देने से, लेकिन असली इमरजेंसी कॉल्स की संख्या रोज करीब 20,000 है। होली-दिवाली जैसे त्योहारों में यह संख्या 80,000 तक पहुंच जाती है। कंट्रोल रूम में बड़ी-बड़ी स्क्रीन्स पर पूरे यूपी की सभी गाड़ियों की लोकेशन दिखती रहती है। सबसे नजदीकी गाड़ी को ऑटोमैटिक अलर्ट जाता है।

खास बात ये है कि यहां टेलीकॉलर पुलिस वाले नहीं, बल्कि प्राइवेट लड़कियां हैं ताकि परेशान व्यक्ति को अपने जैसी आवाज सुनकर सहारा मिले। पूरे राज्य में 112 में 50,000 पुलिसकर्मी 24 घंटे ड्यूटी पर रहते हैं। कॉल आने पर लोकेशन ट्रैक होती है, कंप्यूटर सिस्टम सबसे नजदीकी गाड़ी को भेजता है और बाद में पीड़ित से फीडबैक भी लिया जाता है। लखनऊ कंट्रोल रूम में इंडिया टीवी के संवाददाता विशाल प्रताप सिंह ने देखा, जैसे ही 112 डायल होता है, कॉलर की लोकेशन ऑटोमैटिक ट्रैस हो जाती है। पता बताने की जरूरत नहीं। अपराध हो तो पुलिस, मेडिकल इश्यू हो तो एंबुलेंस भेजी जाती है। हर गाड़ी की रियल टाइम मॉनिटरिंग होती है।

आइए, जानते हैं ग्राउंड पर क्या हैं हालात

अब जानिए ग्राउंड पर क्या हालात हैं। इंडिया टीवी की टीम ने कई शहरों में रियलिटी चेक किया। रिपोर्टरों ने खुद 112 डायल कर इमरजेंसी बताई और समय नोट किया।

गाजियाबाद (सुनसान इलाका): गाजियाबाद के एक सुनसान इलाके में संवाददाता अनामिका गौड़ ने नंदग्राम के पास सुनसान सड़क पर कॉल किया। उन्होंने कंट्रोल रूम को बोला- 'मुझे कुछ लोग परेशान कर रहे उनसे बचने के लिए मैं एक सुनसान सड़क पर आ गई हूं मेरी मदद कीजिए।'  पुलिस ने संवाददाता की लोकेशन पूछी जो उन्हें पता नहीं थी तो पुलिस ने लोकेशन ट्रैक की और वैन पहुंच गई। ऐप डाउनलोड करने से लेकर पुलिस के पहुंचने तक की पूरी प्रक्रिया 13 मिनट में हो गई। पुलिस ने बताया कि 'हम 5 मिनट में पहुंचने की कोशिश करते हैं।'

जयपुर (मुहाना इलाका): रिपोर्टर मनीष भट्टाचार्य ने केश्योवाला ग्राम से झगड़े की शिकायत की। 12:55 पर कॉल किया, जिसके बाद 2 मिनट में शिकायत दर्ज हुई, और फिर चेतक बाइक पर पुलिस 20 मिनट के अंदर पहुंच गई।

जोधपुर (बासनी इंडस्ट्री एरिया): चंद्र शेखर ने 5:42 पर झगड़ा और गाड़ी छीने जाने की कॉल की। 8 मिनट के अंदर थाने की 112 गाड़ी मौके पर पहुंची। कांस्टेबल विजय ने बताया, 'पुलिस कमिश्नर शरद कविराज का सख्त निर्देश है कि हर कॉल पर जल्दी रिस्पॉन्स करना है।'

अहमदाबाद (कैपिटल रोड): मदद के लिए 3:01 बजे कॉल किया गया। 1 मिनट में रिकॉर्डिंग हुई और 3:04 पर PCR से कॉल आई, लोकेशन कन्फर्म हुई और 3:08 बजे PCR वैन पहुंच गई। कुल रिस्पॉन्स टाइम सिर्फ 4-6 मिनट ही रहा।

गोरखपुर (रेलवे स्टेशन रोड): गोरखपुर में कॉल किए जाने के 8-9 मिनट में पुलिस पहुंची। पुलिसकर्मी ने बताया, 'हम मैक्सिमम 10 मिनट का टारगेट रखते हैं, 5-6 मिनट में पहुंचने की कोशिश करते हैं।' MDT (मोबाइल डाटा टर्मिनल) पर एक टीम को 35-40 मिनट का समय मिलता है।

झुंझुनूं (चिड़ावा थाना, ग्रामीण इलाका): पुलिस को मारपीट की सूचना दी गई। 53 मिनट बाद टीम पहुंची। पुलिस ने कहा कि पहले दो कॉल्स थीं और लोकेशन 20-25 किमी दूर थी।

भोपाल (MP नगर जोन-1): 1:53 पर एक्सीडेंट की कॉल की गई और 1:57 पर FRV ड्राइवर का कॉल आया। 2:01 बजे गाड़ी (ड्राइवर, असिस्टेंट और सब-इंस्पेक्टर) मौके पर थी। सिर्फ 7 मिनट लगे! पूरे प्रदेश में 1200 FRV गाड़ियां हैं। आमतौर पर 10-15 मिनट का टारगेट।

सीतापुर (बहुगुणा चौराहा): मौके पर 10 मिनट में पुलिस पहुंची। पुलिस ने बताया, 'मैक्सिमम 10 मिनट का टारगेट होता है, लेकिन 5-6 मिनट में पहुंचने का प्रयास किया जाता है।'

हरदोई (एसपी ऑफिस वाली रोड): 12:35 पर एक्सीडेंट की कॉल की गई। 12:50 पर मदद पहुंची, यानी कि कुल 15 मिनट बाद। पुलिस ने माना कि मैप की दिक्कत थी, इसलिए देरी हुई।

बांदा (बाईपास चौराहा): शहर से 3 किमी दूर कॉल किया। 5-7 मिनट में पुलिस पहुंची। पुलिसकर्मी ने कहा, 'रश था, नहीं तो 4-5 मिनट में आ जाते।'

अधिकांश जगहों पर 10 मिनट के अंदर पहुंची पुलिस

राजस्थान का अभय कमांड सेंटर पूरे प्रदेश में 1000 गाड़ियों से जुड़ा है। जयपुर और झुंझुनूं के टेस्ट में अलग-अलग नतीजे आए। कई साल पहले लॉन्च हुई होम मिनिस्ट्री की इस सर्विस के बारे में ज्यादातर लोग अभी भी नहीं जानते। रियलिटी चेक में पाया गया कि इमरजेंसी में ज्यादातर जगहों पर पुलिस 10 मिनट के अंदर ही पहुंच गई।

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