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चीन के पड़ोसी देश को ब्रह्मोस बेचने जा रहा भारत, अंतिम चरण में पहुंचा निर्यात समझौता

 Published : Jun 18, 2026 04:16 pm IST,  Updated : Jun 18, 2026 04:16 pm IST

भारत और वियतनाम के बीच ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के मुताबिक, केवल कुछ सरकारी मंजूरियां बची हैं। कंपनी स्वदेशीकरण, लागत में कमी और ब्रह्मोस-एनजी जैसे नए संस्करणों पर काम कर रही है।

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भारत और वियतनाम के बीच मिसाइल निर्यात समझौता अब अंतिम चरण में है। Image Source : INDIA TV

नागपुर: भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस के निर्यात को लेकर बड़ी प्रगति हुई है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के प्रमुख जयतीर्थ जोशी ने ANI के साथ बातचीत में कहा है कि वियतनाम के साथ ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात संबंधी बातचीत लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। अब केवल कुछ जरूरी मंजूरियां बाकी हैं, जिनके बाद इस महत्वपूर्ण रक्षा सौदे को अंतिम रूप दिया जा सकता है। बता दें कि वियतनाम की सीमा चीन से भी लगती है और दोनों पड़ोसी देश हैं।

'कई अन्य देशों के साथ भी बातचीत'

नागपुर में ब्रह्मोस कार्यक्रम के लिए सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड द्वारा निर्मित 100वें स्वदेशी बूस्टर को रवाना करने के अवसर पर जोशी ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वियतनाम के अलावा पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों के कई अन्य देशों के साथ भी ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात को लेकर बातचीत चल रही है। उन्होंने कहा कि जैसे ही सरकार की मंजूरी मिलेगी, इन देशों के बारे में सार्वजनिक रूप से जानकारी साझा की जाएगी।

लागत घटाने और स्वदेशीकरण पर जोर

जयतीर्थ जोशी ने बताया कि पिछले डेढ़ साल में लागत कम करने और स्वदेशीकरण बढ़ाने के लिए बड़े स्तर पर काम किया गया है। उन्होंने कहा,

'वैल्यू इंजीनियरिंग के जरिए कच्चे माल की लागत में लगभग 24 प्रतिशत की कमी लाई गई है, जबकि विनिर्माण और अन्य पुर्जों की लागत में करीब 10 प्रतिशत की कमी हुई है। अगले एक से दो सालों में ब्रह्मोस में इस्तेमाल होने वाले भारतीय हिस्सों की कुल लागत में लगभग 20 प्रतिशत तक की कमी आने की उम्मीद है। इससे मिसाइल सिस्टम और अधिक प्रतिस्पर्धी तथा किफायती बनेगी।'

'ब्रह्मोस की और मिसाइलों पर हो रहा काम'

जोशी ने बताया कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ब्रह्मोस-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) और विस्तारित मारक क्षमता वाले नए संस्करणों पर काम किया जा रहा है। इसके अलावा उन्नत कंपोजिट सामग्री के उपयोग से मिसाइल को हल्का बनाने के लिए भी अनुसंधान जारी है। उन्होंने कहा कि नए संस्करणों की अंतिम तकनीकी विशेषताएं डिजाइन सत्यापन और सिमुलेशन अध्ययन पूरा होने के बाद तय की जाएंगी।

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Image Source : PTIदुनिया के कई देशों ने ब्रह्मोस खरीदने की इच्छा जताई है।

ऑपरेशन सिंदूर में हुई ‘लाइव’ टेस्टिंग

ब्रह्मोस प्रमुख ने दावा किया कि हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल का वास्तविक परिस्थितियों में उपयोग कर परीक्षण किया गया। उन्होंने कहा कि ब्रह्मोस एक अनूठी सुपरसोनिक मिसाइल प्रणाली बन चुकी है, जिसे DRDO के सहयोग से विकसित और सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है। उनके अनुसार, यह पहली बार था जब मिसाइल का परीक्षण सीधे प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ वास्तविक ऑपरेशन के दौरान किया गया।

रूस के साथ उत्पादन बढ़ाने पर बातचीत

जोशी ने बताया कि ब्रह्मोस कार्यक्रम की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए रूस के साथ उत्पादन क्षमता बढ़ाने को लेकर भी बातचीत चल रही है। उन्होंने कहा कि रूस के अपने औद्योगिक साझेदार हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए वहां भी मांग बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में ब्रह्मोस के 100वें स्वदेशी बूस्टर को रवाना किया गया। इसे ब्रह्मोस कार्यक्रम में स्वदेशीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

'स्वदेशी वारहेड का परीक्षण भी पूरा हुआ'

जयतीर्थ जोशी ने बताया कि पहले यह बूस्टर रूस से आयात किया जाता था, लेकिन अब इसका निर्माण भारत में ही हो रहा है। उन्होंने कहा, 

'अब तक 100 स्वदेशी बूस्टर की आपूर्ति की जा चुकी है और इसमें सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कंपनी ने स्वदेशी वारहेड के परीक्षण भी पूरे कर लिए हैं। प्रक्रिया पूरी तरह सफल होने के बाद आयातित वारहेड की जगह भारतीय वारहेड का उपयोग शुरू कर दिया जाएगा।'

भारत-रूस की संयुक्त परियोजना है ब्रह्मोस

भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से विकसित ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज और घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक मानी जाती है। अपनी गति, सटीकता और बहु-आयामी लॉन्च क्षमता के कारण यह भारतीय सशस्त्र बलों की प्रमुख मारक शक्ति बन चुकी है। आइए, आपको ब्रह्मोस की खूबियों के बारे में बताते हैं:

  1. संयुक्त विकास: DRDO (भारत) और रूस की NPO मशीनोस्त्रोयेनिया द्वारा विकसित।
  2. नाम की खासियत: भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मॉस्कवा नदी के नामों को मिलाकर रखा गया है।
  3. दो चरणों वाली मिसाइल: पहले चरण में ठोस ईंधन बूस्टर और दूसरे चरण में तरल ईंधन रैमजेट इंजन का उपयोग।
  4. सुपरसोनिक गति: लगभग मैक 2.8 (ध्वनि की गति से करीब तीन गुना तेज) की रफ्तार से उड़ान भर सकती है।
  5. मल्टी-प्लेटफॉर्म लॉन्च क्षमता: जमीन, समुद्र, पनडुब्बी और लड़ाकू विमान से दागी जा सकती है।
  6. फायर एंड फॉरगेट तकनीक: लॉन्च के बाद लक्ष्य तक पहुंचने के लिए किसी अतिरिक्त मार्गदर्शन की जरूरत नहीं होती।
  7. दोहरे लक्ष्य पर हमला: जमीन और समुद्र दोनों प्रकार के लक्ष्यों को निशाना बना सकती है।
  8. उच्च सटीकता: लक्ष्य पर बेहद सटीक वार करने की क्षमता।
  9. कम ऊंचाई पर उड़ान: अंतिम चरण में बेहद कम ऊंचाई पर उड़ती है, जिससे दुश्मन के रडार से बचना आसान होता है।
  10. इंटरसेप्ट करना मुश्किल: तेज गति और विशेष उड़ान प्रोफाइल के कारण इसे रोकना बेहद कठिन माना जाता है।
  11. भारतीय सेना की प्रमुख ताकत: थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों में तैनात।
  12. रक्षा निर्यात की बड़ी उम्मीद: ब्रह्मोस भारत के सबसे महत्वपूर्ण रक्षा निर्यात उत्पादों में शामिल है।

वर्तमान में ब्रह्मोस मिसाइल भारतीय सशस्त्र बलों की विभिन्न शाखाओं में तैनात है और वैश्विक रक्षा बाजार में भारत के सबसे महत्वपूर्ण रक्षा निर्यात उत्पादों में से एक मानी जाती है। वियतनाम के साथ संभावित समझौता भारत की रक्षा निर्यात रणनीति को नई मजबूती दे सकता है।

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