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Marital Rape को अपराध घोषित करना संसद का काम है, SC का नहीं, कोर्ट में क्या क्या हुआ?

 Reported By: Atul Bhatia,  Written By: Kajal Kumari
 Published : Sep 09, 2026 05:26 pm IST,  Updated : Sep 09, 2026 05:26 pm IST

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आज कहा कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करना कार्यपालिका और विधायिका का काम है, सुप्रीम कोर्ट का नहीं। जानें सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई में क्या क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई- India TV Hindi
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अगर वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करना है, तो यह फ़ैसला विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि सुप्रीम कोर्ट के। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिकाओं पर तीन हफ़्ते बाद सुनवाई शुरू करेगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने निर्देश दिया कि इस मामले को तीन हफ़्ते बाद बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट में क्या क्या हुआ?

  • केंद्र की ओर से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करना संसद का काम है, न कि सुप्रीम कोर्ट का।
  • यह चुनौती भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 के अपवाद 2 (Exception 2) पर केंद्रित है, जो पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 से वैवाहिक बलात्कार से जुड़े अपवाद को आगे बढ़ाती है।
  • इस प्रावधान के अनुसार, अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है या यौन क्रिया करता है, तो इसे रेप नहीं माना जाएगा, बशर्ते पत्नी की उम्र 18 साल से कम न हो। यह मानते हुए कि महिलाओं की सुरक्षा और शारीरिक सलामती बहुत ज़रूरी मुद्दे हैं, जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या राज्य इसे रेप मानता है या नहीं।
  • जस्टिस बागची ने पूछा, "शादी में बिना मर्ज़ी के यौन संबंध बनाने पर मजबूर की गई महिला निश्चित रूप से पीड़ित है। हम पीड़ितों की रक्षा करेंगे। सवाल बस यह है कि क्या राज्य इसे रेप मानता है।"
  • जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि शादी का मतलब "महिला की आज़ादी का खत्म होना" नहीं हो सकता।

कोर्ट ने क्या कहा

पहला, क्या मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) से जुड़ी छूट के बावजूद मुकदमा चलाया जा सकता है, और दूसरा, क्या यह छूट खुद संविधान के हिसाब से सही है। याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुईं सीनियर एडवोकेट करुणा नंदी ने तर्क दिया कि अगर कोई पति अपनी पत्नी को गंभीर चोट पहुंचाता है, तो वह सिर्फ़ शादी के रिश्ते के आधार पर कानूनी छूट का दावा नहीं कर सकता। नंदी ने कहा कि शादी का रिश्ता किसी व्यक्ति को पत्नी की मर्ज़ी के बिना यौन संबंध बनाने या उसे गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचाने की छूट नहीं देता।

केंद्र सरकार ने क्या कहा
केंद्र सरकार ने पहले अपने हलफ़नामे में कहा था कि वह मैरिटल रेप को एक अलग आपराधिक अपराध बनाने के पक्ष में नहीं है। सरकार का कहना है कि मैरिटल रेप को अपराध मानने से शादी की संस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है और इससे शादी के रिश्तों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
केंद्र ने यह भी तर्क दिया है कि शादी के अंदर यौन संबंधों से जुड़े मामलों को आम रेप के अपराध के बराबर मानने के बजाय मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत निपटाया जाना चाहिए। 2022 में, दिल्ली हाई कोर्ट ने इस बात पर बंटा हुआ फ़ैसला सुनाया था कि क्या मैरिटल रेप को आपराधिक अपराध माना जाना चाहिए। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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