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शशि थरूर ने इमरजेंसी पर उठाए सवाल, कहा- इससे सबक लेना जरूरी, संजय गांधी ने जबरन कराई नसबंदियां

 Edited By: Malaika Imam @MalaikaImam1
 Published : Jul 10, 2025 01:53 pm IST,  Updated : Jul 10, 2025 01:56 pm IST

शशि थरूर ने कहा कि इमरजेंसी से सबक लेने की जरूरत है। उन्होंने संजय गांधी द्वारा चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान को 'क्रूरता का उदाहरण' बताया।

शशि थरूर- India TV Hindi
शशि थरूर Image Source : PTI

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने 1975 में लगी इमरजेंसी पर सवाल उठाए हैं। हाल ही में एक लेख में उन्होंने इसे सिर्फ भारतीय इतिहास के 'काले अध्याय' के रूप में याद नहीं करके, इससे सबक लेने की बात कही। मलयालम भाषा के अखबार 'दीपिका' में गुरुवार को प्रकाशित अपने लेख में शशि थरूर ने कहा कि अनुशासन और व्यवस्था के लिए उठाए गए कदम कई बार ऐसी क्रूरता में बदल जाते हैं, जिन्हें किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।

नसबंदी अभियान मनमाना फैसला: थरूर

50 साल पहले, 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई थी, जो 21 मार्च 1977 तक लागू रही। थरूर ने अपने लेख में इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी द्वारा चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान को 'क्रूरता का उदाहरण' बताया। उन्होंने लिखा, "गरीब ग्रामीण इलाकों में लक्ष्य पूरा करने के लिए हिंसा और दबाव का सहारा लिया गया। नई दिल्ली जैसे शहरों में बेरहमी से झुग्गियां तोड़ी गईं। हजारों लोग बेघर हो गए और उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया।" थरूर के अनुसार, यह अभियान मनमाना और क्रूर फैसला था, जिसने लोगों के जीवन पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला।

लोकतंत्र को हल्के में नहीं लेने की सलाह

थरूर ने अपने आर्टिकल में लोकतंत्र को हल्के में नहीं लेने की बात पर जोर दिया। उन्होंने इसे एक 'बहुमूल्य विरासत' बताया, जिसे लगातार संरक्षित करना आवश्यक है। उन्होंने चेतावनी दी कि सत्ता को केंद्रित करने, असहमति को दबाने और संविधान को दरकिनार करने का असंतोष कई रूपों में फिर सामने आ सकता है।

थरूर ने कहा कि अक्सर ऐसे कार्यों को देशहित या स्थिरता के नाम पर उचित ठहराया जाता है। इस अर्थ में, इमरजेंसी एक चेतावनी के रूप में खड़ी है। उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि लोकतंत्र के संरक्षकों को हमेशा सतर्क रहना होगा, ताकि ऐसी स्थितियां दोबारा पैदा न हों। थरूर का यह लेख इमरजेंसी के 50 साल पूरे होने से पहले आया है।

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