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तात्या टोपे पुण्यतिथि: पेशवाओं से गुरिल्ला युद्ध सीख 1857 में की क्रांति, अंग्रेज इतना डरे कि पकड़ते ही फांसी दे दी

तात्या टोपे से ब्रिटिश सरकार इतनी डरी हुई थी कि उन्हें पकड़ने के बाद तुरंत ही फांसी दे दी गई। आमतौर पर किसी भी कैदी को फांसी देने से पहले लंबा मुकदमा चलाया जाता था, लेकिन तात्या टोपे के मामले में ऐसा नहीं किया गया।

Edited By: Shakti Singh
Published : Apr 18, 2025 10:46 am IST, Updated : Apr 18, 2025 10:55 am IST
Tatya Tope- India TV Hindi
Image Source : X तात्या टोपे (फाइल फोटो)

1857 की क्रांति के महानायक, क्रांतिकारी और देशभक्त सेनापति शहीद तात्या टोपे को साल 1959 में आज के दिन ही फांसी दी गई थी। तात्या टोपे अंग्रेजों को सबसे ज्यादा परेशान करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से एक थे। अंग्रेज उनसे इतना ज्यादा डरे हुए हुए थे कि 7 अप्रैल 1859 को उन्हें पकड़ने के 11 दिन बाद ही उन्हें फांसी दे दी थी। 

तात्या टोपे का पूरा नाम रामचंद्र पांडुरंग टोपे था। उनका जन्म 1814 में येवला, नासिक (महाराष्ट्र) में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता पांडुरंग राव टोपे पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में एक महत्वपूर्ण अधिकारी थे। उनकी माता का नाम रुक्मिणी बाई था। तात्या टोपे का बचपन कानपुर के बिठूर में बीता, जहां पेशवा बाजीराव द्वितीय को ब्रिटिश सरकार ने निर्वासित किया था। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा बिठूर में ही प्राप्त की। मराठी, संस्कृत के अलावा उन्हें युद्ध कला भी सिखाई गई।

1857 युद्ध में योगदान

तात्या टोपे पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहेब के करीबी मित्र और सहयोगी थे। नाना साहेब के साथ उनका गहरा रिश्ता था, और वे उनके विश्वासपात्र बन गए। नाना साहेब के साथ ही उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की कला सीखी। इसी कला के दम पर वह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में से एक बने। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ भारतीय सैनिकों और नागरिकों के विद्रोह को अंग्रेजों ने कुचल दिया था, लेकिन तात्या टोपे ने छापामार युद्ध के जरिए इसे जिंदा रखा।

छापामार युद्ध में पारंगत

तात्या टोपे ने कानपुर में ब्रिटिश सेना के खिलाफ युद्ध का नेतृत्व किया। उन्होंने कानपुर पर कब्जा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और ब्रिटिश सेना को कई बार परास्त किया। वह छापामार युद्ध नीति के लिए प्रसिद्ध थे। वे तेजी से स्थान बदलते थे और ब्रिटिश सेना को अपनी रणनीति से चकमा देते थे। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर झांसी और ग्वालियर में ब्रिटिश सेना के खिलाफ युद्ध लड़ा। ग्वालियर पर कब्जा उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक था, हालांकि यह बेहद कम समय के लिए था।

विश्वासघात के बाद हुई फांसी

अप्रैल 1859 में तात्या टोपे के सहयोगी मान सिंह ने विश्वासघात किया और ब्रिटिश सेना को उनकी लोकेशन की जानकारी दी। सात अप्रैल 1859 को तात्या टोपे को शिवपुरी (मध्य प्रदेश) में ब्रिटिश सेना ने पकड़ लिया। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें बिना लंबे मुकदमे के 18 अप्रैल 1859 को उन्हें फांसी दे दी। कुछ स्थानीय कथाओं और इतिहासकारों का दावा है कि तात्या टोपे फांसी से बच गए थे और गुप्त रूप से जीवन व्यतीत किया। हालांकि, ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, उनकी मृत्यु फांसी के कारण ही हुई थी।

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