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कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में आसान नहीं है राहुल गांधी की राह, ये हैं अहम चुनौतियां

 Edited By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : Dec 16, 2017 07:03 pm IST,  Updated : Dec 16, 2017 07:03 pm IST

पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब पार्टी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। उनके सामने 2019 के लोकसभा चुनाव के रूप में सबसे बड़ी चुनौती खड़ी है।

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Rahul Gandhi Image Source : PTI

नई दिल्ली: पार्टी की लंबे समय से लंबित मांग पूरी करते हुए राहुल गांधी ने शनिवार को कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल ली। पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब पार्टी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। उनके सामने 2019 के लोकसभा चुनाव के रूप में सबसे बड़ी चुनौती खड़ी है। 132 साल पुरानी पार्टी की बागडोर संभालने वाले 47 वर्षीय राहुल गांधी नेहरू-गांधी परिवार के छठे सदस्य हैं। 

शीर्ष स्तर पर यह फेरबदल ऐसे वक्त में हुआ है, जब गुजरात विधानसभा चुनाव की मतगणना सोमवार को होने वाली है। यह समय राहुल गांधी की अग्नि परीक्षा से कम नहीं है, क्योंकि गुजरात चुनाव में प्रचार अभियान की उन्होंने अगुआई की है। दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव बाद पार्टी को लगातार हार का समान करना पड़ा है। लेकिन इस साल हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में पार्टी ने जीत दर्ज की थी। 

राहुल के सामने 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव भी बड़ी चुनौती लेकर आने वाले हैं। अगले साल पहले कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने हैं, जो उनके लिए काफी महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। उसके बाद लोकसभा चुनाव राहुल के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहने वाली है। 

राहुल गांधी के सामने खड़ी चुनौतियों में से एक चुनौती कांग्रेस में नई शक्ति का संचार करना और जान फूंकना है, जो 2014 लोकसभा चुनाव के बाद से मिली हार के बाद डांवाडोल-सी नजर आ रही है। राहुल के समक्ष कांग्रेस को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की भी चुनौती है, ताकि मोदी की अगुआई वाली भाजपा और पार्टी प्रमुख अमित शाह जैसे चुनावी रणनीतिकारों से टक्कर ली जा सके। 

गांधी के सामने 2019 लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक बड़ा विपक्ष तैयार करने की भी चुनौती होगी। उन्हें मोदी के खिलाफ लड़ने के लिए विभिन्न पार्टियों के समर्थन के साथ खुद को एक विकल्प के रूप में पेश करना होगा। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में राहुल कांग्रेस का चेहरा रहे थे। 

विदेशों में अपनी कुछ लंबी यात्राओं के चलते गांधी को एक अनिच्छुक राजनेता के रूप में माना जाता था। साथ ही पार्टी प्रमुख की भूमिका में देरी, संप्रग सरकार के दोनों कार्यकाल में मंत्री पद की जिम्मेदारी नहीं संभालने और कुछ मुद्दों पर उचित तरीके से प्रतिक्रिया न करने से उनकी छवि को नुकसान पहुंचा है।

हालांकि बाद में मोदी और भाजपा पर उनके तेज और आक्रामक हमलों ने इस धारणा को बदला और यह दिखाया कि वे उनका सामना करने में सक्षम हैं। अपनी एक अमेरिका यात्रा के दौरान उन्होंने थिंक टैंकों के साथ बातचीत की थी, जिससे उनकी छवि में आमूलचूल बदलाव आया।गुजरात में सफलता कांग्रेस के लिए एक बड़ा मनोबल बढ़ाने वाली घटना हो सकती है। गांधी एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने में सफल रहे और उन्होंने मोदी को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर कर दिया। 

राहुल के सामने अन्य बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश में पार्टी की खिसके जनाधार को दोबारा हासिल करने की होगी। राज्य में सबसे अधिक लोकसभा सीट (80) हैं। गांधी ने विधानसभा चुनाव में दो बार पार्टी के प्रचार अभियान का नेतृत्व किया, लेकिन दोनों बार असफलता ही हाथ लगी।  हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में अमेठी और रायबरेली में पार्टी अपनी छवि के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सकी थी। अमेठी और रायबरेली राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी के लोकससभा क्षेत्र हैं। 

कांग्रेस चुनावी रूप से सिकुड़ रही है, पार्टी अब बिहार जैसे राज्य में चौथे पायदान पर है, वहीं पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु समेत दिल्ली में वह तीसरे स्थान पर है। 2014 के बाद से विभिन्न विधानसभा चुनावों में, पार्टी तीसरे या चौथे स्थान पर रही है। पार्टी के मुख्य पक्षों में से एक दलित और अन्य पक्ष पार्टी से दूर चले गए हैं।

राहुल गांधी को एक युवा नेता के रूप में पेश किया गया है, जो युवाओं की भाषा और उनकी आवाज को समझता है। लेकिन मोदी ने इस वर्ग को अपने साथ लाने में सफलता हासिल की है। युवा बड़ी संख्या में चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। कांग्रेस को मध्य वर्ग को लुभाने के तरीके भी तलाशने होंगे। ममता बनर्जी और लालू प्रसाद जैसे वरिष्ठ नेताओं का सोनिया गांधी के साथ एक सहज स्तर रहा है, अब देखना यह होगा कि क्या राहुल गांधी के साथ भी वही रहता है। 

राहुल गांधी के सामने पार्टी की राज्य इकाइयों में गुटबाजी को समाप्त करने और सभी को एकजुट करने की भी चुनौती होगी। राहुल के सामने कांग्रेस के पुराने नेताओं और युवा नेताओं के बीच संतुलन बनाने की भी चुनौती होगी।कांग्रेस वर्तमान में पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में सत्ता में है और पार्टी गुजरात के साथ अगले साल कर्नाटक में हारती है तो उसके लिए 2019 में वापसी करना खासा मुश्किल हो सकता है। बतौर लोकसभा सांसद राहुल का यह तीसरा कार्यकाल है, और उन्हें 2013 में पार्टी उपाध्यक्ष बनाया गया था। 

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