रवनीत सिंह बिट्टू ने यूनियन काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स से इस्तीफा दे दिया है। पीएम मोदी की सलाह पर राष्ट्रपति मुर्मू ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। वह रेल राज्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। भारत के संविधान के अनुच्छेद 75 के खंड (2) के तहत राष्ट्रपति ने उनका इस्तीफा स्वीकार किया। बिट्टू राज्यसभा सांसद बनने के बाद यूनियन काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स का हिस्सा बने थे और उन्हें रेल राज्यमंत्री का पद दिया गया था। जून 2026 में राज्यसभा सांसद के रूप में उनका कार्यकाल खत्म हुआ और उन्हें दोबारा उच्च सदन में नहीं भेजा गया। आधिकारिक बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर, राष्ट्रपति ने बिट्टू का केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा तुरंत प्रभाव से स्वीकार कर लिया। राष्ट्रपति मुर्मू अभी तीन देशों के दौरे पर विदेश में हैं।
नियमों के अनुसार अगर कोई मंत्री संसद का सदस्य नहीं रहता तो उसे इस्तीफा देना पड़ता है या 6 महीने के अंदर फिर से सदस्य बनना पड़ता है। बिट्टू अब संसद के सदस्य नहीं थे। इसी वजह से उन्होंने इस्तीफा दिया है और उनका इस्तीफा स्वीकार किया गया है। रवनीत सिंह बिट्टू से पहले जॉर्ज कुरियन भी इसी वजह से इस्तीफा दे चुके हैं और उनका इस्तीफा भी स्वीकार किया गया था। कांग्रेस से बीजेपी में आए बिट्टू को मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में केंद्रीय रेलवे और फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज राज्य मंत्री का पद दिया गया था। अब उन्होंने इसी पद से इस्तीफा दिया है। बिट्टू को पिछले महीने जातिसूचक टिप्पणी करने के मामले में चार धार्मिक स्थलों पर माथा टेकने की सजा सुनाई गई थी।
पंजाब चुनाव पर ध्यान देंगे बिट्टू
रवनीत सिंह बिट्टू 2024 से केंद्रीय मंत्रिपरिषद का हिस्सा थे। इस जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद वह अगले साल पंजाब में होने वाले चुनावों पर ध्यान दे सकते हैं। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह 2024 में बीजेपी में शामिल हुए और लोकसभा चुनाव हार गए थे। उन्हें कांग्रेस नेता के सी वेणुगोपाल द्वारा खाली की गई सीट के बाकी समय के लिए राजस्थान से राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया गया था।
पंजाब में जमीन तलाश रही बीजेपी
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है। इससे पहले कांग्रेस पार्टी यहां सत्ता में थी। 117 सीटों वाली विधानसभा के लिए चुनाव फरवरी या मार्च के महीने में होने की संभावना है। इसी वजह से बीजेपी पहले से तैयारी कर रही है। पिछले चुनाव में बीजेपी को दो सीटों से संतोष करना पड़ा था। ऐसे में पार्टी की कोशिश इस बार कम से कम मुख्य विपक्षी दल बनने की होगी।
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