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Economic Survey 2026: PMAY-U के तहत 96 लाख से ज्यादा परिवारों को मिला अपना घर, बढ़ती अफोर्डेबल हाउसिंग डिमांड का दिखा असर

 Edited By: Shivendra Singh
 Published : Jan 29, 2026 01:38 pm IST,  Updated : Jan 29, 2026 01:38 pm IST

इकोनॉमिक सर्वे 2026 के मुताबिक, केंद्र सरकार की स्कीम PMAY-U के तहत अब तक 96 लाख से ज्यादा घर पूरे होकर लाभार्थियों को सौंपे जा चुके हैं। यह आंकड़ा न केवल सरकार की आवास नीति की सफलता को दर्शाता है, बल्कि देश में बढ़ती अफोर्डेबल हाउसिंग की मांग का भी साफ संकेत देता है।

PMAY-U के तहत 96 लाख घर किए...- India TV Hindi
PMAY-U के तहत 96 लाख घर किए गए डिलीवर Image Source : PMAY-U OFFICIAL WEBSITE

देश में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच 'अपने घर' का सपना अब करोड़ों परिवारों के लिए हकीकत बनता दिख रहा है। यूनियन बजट से पहले संसद में पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2026 ने शहरी आवास की तस्वीर को साफ तौर पर सामने रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार की फ्लैगशिप योजना प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (PMAY-U) के तहत अब तक 96 लाख से ज्यादा घर बनकर लाभार्थियों को सौंपे जा चुके हैं। यह आंकड़ा न सिर्फ सरकारी प्रयासों की सफलता दिखाता है, बल्कि देश में तेजी से बढ़ती अफोर्डेबल हाउसिंग की मांग की ओर भी इशारा करता है।

PMAY-U की दो फेज में बड़ी उपलब्धि

इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के अनुसार, PMAY-U के दो चरणों के तहत अब तक कुल 122.06 लाख घरों को मंजूरी दी गई है। इनमें से 96.02 लाख घर पूरे होकर 24 नवंबर 2025 तक देशभर में लाभार्थियों को सौंपे जा चुके हैं। यह योजना खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में रहने वाले निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए राहत बनकर उभरी है, जो लंबे समय से घर की कमी से जूझ रहे थे।

शहरी भारत में क्यों बढ़ रही है घरों की जरूरत

सर्वे में बताया गया है कि भारतीय शहरों में अनौपचारिकता अब भी एक बड़ी सच्चाई है। झुग्गी-झोपड़ियां, असंगठित रोजगार और बिना पंजीकरण वाले छोटे व्यवसाय शहरी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बने हुए हैं। ये अनौपचारिक बस्तियां रोजगार के केंद्रों के पास सस्ती रहने की सुविधा देती हैं और बड़ी आबादी की जरूरतों को पूरा करती हैं। इससे साफ है कि अनौपचारिक आवास कोई अस्थायी समस्या नहीं, बल्कि तेज शहरीकरण का संरचनात्मक परिणाम है।

अफोर्डेबल हाउसिंग की बढ़ती कमी

रिपोर्ट के मुताबिक, बीते एक दशक में सस्ते घरों की कमी तेजी से बढ़ी है। जहां 2012-17 के दौरान शहरी आवास की कमी 1.88 करोड़ घरों की थी, वहीं 2018 तक यह आंकड़ा बढ़कर 2.9 करोड़ तक पहुंच गया। अनुमान है कि 2030 तक अफोर्डेबल हाउसिंग की कुल मांग 3 करोड़ यूनिट तक पहुंच सकती है। इसके साथ ही बड़े शहरों में 50 लाख रुपये से कम कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी भी तेजी से घटी है।

शहरों के बाहरी इलाकों में सस्ते घर

इकोनॉमिक सर्वे बताता है कि अफोर्डेबल हाउसिंग अब शहरों के बाहरी इलाकों में ज्यादा देखने को मिल रही है, जहां जमीन सस्ती है। हालांकि, यहां ट्रांसपोर्ट, रोजगार केंद्रों से कनेक्टिविटी और बुनियादी सुविधाओं की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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