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Maa Katyayani Katha: नवरात्रि की षष्ठी तिथि पर जरूर पढ़ें मां कात्यायनी की कथा, भय-बाधा और नकारात्मक शक्तियों से मिलेगा छुटकारा!

 Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
 Published : Mar 23, 2026 07:47 pm IST,  Updated : Mar 23, 2026 07:47 pm IST

Maa Katyayani Katha: नवरात्रि का छठा दिन मां दुर्गा के छठी शक्ति को समर्पित हैं। इस दिन मां कात्यायनी की आराधना की जाती है। व्रत रखकर विधि-विधान से माता का स्मरण करते हैं। व्रत न होने पर भी आपको मां कात्यायनी की इस कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। यहां पढ़िए संपूर्ण कथा।

Maa Katyayani Katha मां कात्यायनी की कथा- India TV Hindi
नवरात्रि के छठे दिन जरूर पढ़ें मां कात्यायनी की कथा Image Source : INDIA TV

Maa Katyayani Katha in Hindi: नवरात्रि की षष्ठी तिथि बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है, इस दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की उपासना होती है। मां कात्यायनी की पूजा शत्रुओं पर विजय दिलाने, रोग-शोक से राहत दिलाने वाली और आत्मविश्वास बढ़ाने में भी सहायक मानी जाती है। पुराणों के अनुसार, मां कात्यायनी की पूजा के दौरान उनकी कथा का पाठ करने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और योग्य जीवनसाथी मिलने की मान्यता है। इसके साथ ही वैवाहिक जीवन सुखमय बनता है। नवरात्रि के छठे दिन की पूजा के समय पढ़ी जाने वासी इस कथा के पाठ से माता भक्तों को शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। यहां पढ़िए मां कात्यायनी की संपूर्ण कथा। 

देवी कात्यायनी आराधना मंत्र (Maa Katyayani Puja Mantra)

नवरात्रि के छठे दिन देवी दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा का बहुत महत्व है। मान्यता है कि देवी कात्यायनी की पूजा में लाल और सफेद रंग के कपड़े पहनना बहुत शुभ होता है। देवी कात्यायनी का ध्यान गोधूलि बेला में किया जाना चाहिए। कथा पाठ करने से पहले माता कात्यायनी के इस मंत्र का जाप जरूर करेंः

  • ॐ देवी कात्यायन्यै नम:

 देवी कात्यायनी की कथा (Maa Katyayani Katha In Hindi)

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, 'कत' नामक एक प्रसिद्ध महर्षि हुआ करते थे। उनका एक पुत्र हुआ, जिसका नाम कात्य पड़ा। आगे चलकर ऋषि कात्य के गोत्र में एक महर्षि कात्यायन हुए, जो अपने तप के कारण पूरे संसार में जाने गए। ऋषि कात्यायन की एक मनोकामना थी कि देवी दुर्गा उनके यहां पुत्री रूप में जन्म लें। ऐसे में मां भगवती को प्रसन्न करने के लिए महर्षि कात्यायन ने वर्षों तक कठोर तपस्या भी की। ऋषि के घोर तप से प्रसन्न होकर मां अंबे ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी इच्छा पूरी करने का वचन भी दिया। इसके बाद देवी ने अपना वचन पूरा करते हुए और ऋषि कात्यायन के घर जन्म लिया। उनकी पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण ही देवी भगवती का नाम कात्यायनी पड़ा।

पुराणों में वर्णन मिलता है कि महर्षि कात्यायन ने बड़े ही प्रेम से देवी कात्यायनी का पालन-पोषण किया था। इधर पृथ्वी पर महिषासुर का आंतक बढ़ता जा रहा था, वह दुराचारी सारी सीमाएं लांघ रहा था। दरअसल, महिषासुर को ये वरदान मिला हुआ था कि कोई भी पुरुष कभी उसे पराजित नहीं कर सकता, ना उसका अंत कर पाएगा। इसलिए उसे किसी का डर नहीं था और देखते ही देखते उसने देवलोक पर भी अपना कब्जा कर लिया था। तब भगवान विष्णु, ब्रह्मा और महादेव ने उसका अंत करने के लिए अपने तेज से एक शक्ति को उत्पन्न किया। मान्यता है कि महर्षि कात्यायन ने ही इस देवी की सर्वप्रथम विधिवत पूजा की थी, इसलिए देवी को कात्यायनी के नाम से जाना गया।

वहीं, देवी कात्यायनी से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, आश्विन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महर्षि कात्यायन के घर देवी की उत्पत्ति हुई थी। इसके बाद महर्षि ने शुक्ल पक्ष की सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक अपने आश्रम में देवी की विधिवत पूजा की और दशमी को देवी के इस स्वरूप ने महिषासुर का वध किया था। जिसके कारण ही देवी के इस स्वरूप को कात्यायनी के नाम से जाना गया था। वहीं, महिषासुर का वध करने के कारण देवी को 'महिषासुर मर्दिनी' के नाम से भी जाना गया।

एक अन्य कथा के अनुसार, देवी दुर्गा का कात्यायनी स्वरूप अमोघ फलदायिनी है। ब्रज की गोपियों ने करुणावतार श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में पाने के लिए कालिंदी यमुना के किनारे देवी कात्यायनी की ही आराधना की थी। यही वजह है कि आज भी मां कात्यायनी पूरे ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वहीं, स्कन्द पुराण में देवी कात्यायनी के बारे में उल्लेख मिलता है कि उनकी उत्पत्ति परमेश्वर के सांसारिक क्रोध से हुई थी।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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