Maha Shivaratri 2026 Date Live Updates: भगवान भोलेनाथ की आराधना का सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि हर शिव भक्त के लिए खास होता है। इस दिन श्रद्धालु सच्चे मन से व्रत रखते हैं और भोलेनाथ की विधि विधान पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यताओं अनुसार ये शिवरात्रि इसलिए बेहद खास होती है क्योंकि इस दिन महादेव धरती के सभी शिवलिंग में वास करते हैं। यही कारण है कि इस दिन शिवलिंग का अभिषेक और पूजन जरूर किया जाता है जिससे भगवान की कृपा प्राप्त की जा सके। चलिए आपको बताते हैं इस साल महा शिवरात्रि किस तारीख को मनाई जाएगी और पूजा का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा।
पंचांग अनुसार महा शिवरात्रि की पावन तिथि 15 फरवरी 2026 की शाम 05:04 बजे से शुरू होकर 16 फरवरी 2026 की शाम 05:34 बजे तक रहेगी। चूंकि 15 फरवरी 2026 की रात में चतुर्दशी तिथि मौजूद रहेगी इसलिए महा शिवरात्रि का पावन पर्व 15 फरवरी 2026, रविवार को मनाया जाएगा।
महा शिवरात्रि की पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त 15 फरवरी 2026 की देर रात 12 बजकर 9 मिनट से रात 1 बजकर 1 मिनट तक रहेगा। ये निशिता काल है जो शिवरात्रि पूजन के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है। इसके अलावा कई लोग रात्रि के चारों प्रहर में शिव पूजा करते है इसलिए आगे हम आपको बताएंगे चार प्रहर की पूजा का सही समय।
गंगा नाहया पर्वत को पाया तू है कहा
ये दुनिया छोड़ी मैने मन सजाया तू है कहा
तुम डरबदार की राहो में या हो कही शिवलो में
मेरे साथ ही तुम हो कही फिर क्यू नही निगाहो में
जब लाउ उठी इस दिल में तो एहसास हुआ
तुझमे शिवा मुझमे शिवा तन में शिवा मन में शिवा
ओम नमः शिवाय....
मान की गहराई में तू था चाओं में तेरी मई चला
तेरी राहो में ही खोके खुद से ही में आ मिला
अब ना रही पल की खबर जो तू मिला है इस क़दर
समा गया तुझमे कही भटका था जो ये बेसबर
हर ओर से बस एक धुन मैं सुन रहा
तुझमे शिवा मुझमे शिवा....
भक्तिभारत लिरिक्स
सत्या-असत्या में उलझी दुनिया अपने करमो से है परे
समझे ना क्यू तेरी माया तूने ही हर रूप धरे
है शोर में खामोशी तू खामोशी मेी एक नाद है
संगीत है जीवन का तू अनसुना एक राग है
आँख मूंडे भीतर ही वो है बसा
तुझमे शिवा मुझमे शिवा....
शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले अक्षत (चावल) साबुत और साफ होने चाहिए। टूटे हुए या खंडित चावल अर्पित करने से पूजा अधूरी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पूजन में इन नियमों का पालन करते हुए की गई पूजा से मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर विधिपूर्वक पूजा करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
जी हां, महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव के मंदिर जरूर जाना चाहिए और वहां जाकर शिवलिंग का अभिषेक करके उसके समक्ष दीपक भी जरूर जलाना चाहिए।
पीरियड में महाशिवरात्रि व्रत नहीं रखना चाहिए। लेकिन अगर आपको व्रत वाले दिन पीरियड आ गए हैं तो आप इस व्रत को बीच में न छोड़ें। इसे बिना पूजा किए ही संपन्न करें।
शास्त्रों के अनुसार सोमवार और चतुर्दशी तिथि को बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए। महाशिवरात्रि स्वयं चतुर्दशी को पड़ती है, इसलिए इस दिन बेलपत्र तोड़ना वर्जित माना गया है। आवश्यकता होने पर बेलपत्र एक दिन पहले तोड़कर रख लेना चाहिए। मान्यता है कि इन दिनों बेलपत्र तोड़ने से भगवान शिव अप्रसन्न हो सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमों का पालन करते हुए बेलपत्र अर्पित करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
जी हां, महाशिवरात्रि व्रत के दिन बाल धो सकते हैं। लेकिन नाखून नहीं काट सकते हैं। इसके अलावा बाल कटवा नहीं सकते हैं।
महाशिवरात्रि व्रत की शुरुआत 15 फरवरी 2026 की सुबह 5 बजकर 17 मिनट से होगी और इसका समापन 16 फरवरी 2026 की सुबह 06:59 बजे के बाद किया जाएगा। व्रत वाले दिन अन्न का सेवन नहीं करना है। सिर्फ फलाहारी भोजन करना है। संंभव हो तो इस दिन रात्रि जागरण जरूर करें।
शिवलिंग की पूजा में शंख बजाना या शंख से जल अर्पित करना वर्जित माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था, जिससे शंख की उत्पत्ति जुड़ी मानी जाती है। इसलिए शिवलिंग पर जल या दूध सीधे पात्र से ही अर्पित करना चाहिए।
महाशिवरात्रि पर शिवलिंग की पूजा से पहले उसका अभिषेक किया जाता है। शिवलिंग अभिषेक वह विधि होती है, जिसमें मंत्रोच्चार करते हुए शिवलिंग पर जल, दूध, शहद, दही से स्नान कराया जाता है। मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दौरान ब्रह्मांडीय ऊर्जाएं अत्यधिक सक्रिय हो जाती है, ऐसे में यह अनुष्ठान और भी अधिक शक्तिशाली हो जाता है। महाशिवरात्रि पर शिवलिंग अभिषेक एक रस्म से कहीं ज्यादा है, यह आत्म शुद्धि, समर्पण और रूपांतरण की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इसके जरिए आप स्वयं को शिव की शक्तिशाली ऊर्जा से जोड़ते हैं।
शिवलिंग की पूजा में शंख बजाना या शंख से जल अर्पित करना पूर्णतः वर्जित है। इसके पीछे पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था और उसके शरीर की अस्थियों से शंख उत्पन्न हुआ। इसी कारण से शिवलिंग पूजा में शंख का प्रयोग नहीं किया जाता। शिवलिंग पर जल, दूध, दही या अन्य पवित्र द्रव सीधे पात्र से अर्पित करना ही शास्त्रानुसार सही माना गया है।
धतूरे और आक यानी मदार के फूलों की माला महादेव को बहुत प्रिय है. विष को देवताओं और राक्षसों ने जब ग्रहण नहीं किया तो संसार को विनाश से बचाने के लिए शिवजी ने उस विष को पीकर अपने गले में रोक लिया. संसार जिसे जहर मानकर नहीं अपनाता है, शिव उसे औषधि के रूप में स्वीकार करते हैं. वह बताते हैं कि कोई भी वस्तु जहर तब है जब उसका प्रयोग गलत तरीके से किया जाए.
शिवलिंग पर हमेशा तीन पत्तियों वाला बेलपत्र ही अर्पित करना चाहिए। अगर 5 पत्तियों वाला बेलपत्र मिल जाए तो सोने पर सुहागा होगा। शिवलिंग पर साफ सुथरे, बगैर कटे-फटे और बगैर दाग धब्बों वाले बेलपत्र ही चढ़ाएं। बेलपत्र अर्पित करने से पहले अच्छी तरह से धोकर साफ कर लें। कोशिश करें की हमेशा ताजे तोड़े हुए बेलपत्र ही पूजा में उपयोग करें। भूलकर भी मुरझाए और सूखे हुए बेलपत्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। शिवलिंग पर चढ़ाने से पहले बेलपत्र पर चंदन से ओम या श्रीराम लिखें। बेलपत्र शिवलिंग पर इस तरह चढ़ाएं कि उसका चिकना हिस्सा शिवलिंग को स्पर्श करें और शिवलिंग पर बिल्वपत्र चढ़ाते समय ऊं नम: शिवाय मंत्र का जाप
सोमवार भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित दिन है, लेकिन इसी दिन बेलपत्र तोड़ना निषिद्ध बताया गया है। मान्यता है कि सोमवार के दिन बेलपत्र में माता पार्वती का वास होता है। ऐसे में इस दिन पत्ते तोड़ना अनादर माना जाता है।
शास्त्रों के अनुसार सोमवार और चतुर्दशी तिथि को बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए। महाशिवरात्रि स्वयं चतुर्दशी को पड़ती है, इसलिए इस दिन बेलपत्र तोड़ना वर्जित माना गया है। आवश्यकता होने पर बेलपत्र एक दिन पहले तोड़कर रख लेना चाहिए। मान्यता है कि इन दिनों बेलपत्र तोड़ने से भगवान शिव अप्रसन्न हो सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमों का पालन करते हुए बेलपत्र अर्पित करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
महाशिवरात्रि में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। अगर किसी कारणवश आपके लिए पूरी रात जागना संभव न हो, तो कम से कम कुछ समय भजन, शिव चालीसा या मंत्र जाप अवश्य करें। इससे मन एकाग्र और शांत रहता है।
व्रत केवल भोजन से परहेज नहीं है। इस दिन क्रोध, झूठ, कटु वचन और नकारात्मक सोच से दूर रहें। मन को शांत और सकारात्मक रखें। सच्ची भक्ति और अच्छा व्यवहार ही भगवान शिव को प्रिय है।
अगर किसी को बीमारी, कमजोरी या डॉक्टर की सलाह हो, तो व्रत अपनी क्षमता के अनुसार रखें। भगवान शिव भावना देखते हैं, कठोर तप नहीं। व्रत खोलते समय अगले दिन स्नान कर पूजा करें और हल्का भोजन लें। अचानक भारी भोजन करने से बचें।
नियमों से ज्यादा महत्वपूर्ण श्रद्धा और विश्वास है। सच्चे मन से किया गया छोटा सा व्रत भी भगवान शिव को प्रसन्न करता है और जीवन में सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।
भगवान शिव वैराग्य और तप के प्रतीक हैं। इसी कारण शिवलिंग पर हल्दी, कुमकुम, सिंदूर और अन्य श्रृंगार सामग्री चढ़ाना उचित नहीं माना जाता। हालांकि, यदि माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित हो, तो वहां सुहाग सामग्री अर्पित की जा सकती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवलिंग का अभिषेक सबसे पहले गंगाजल या फिर गंगाजल मिश्रित जल से करना चाहिए। इसके बाद दूध, दही, घी, बेलपत्र, भांग, धतूरा आदि से आप शिवलिंग का अभिषेक कर सकते हैं।
'ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्' यह शिव गायत्री मंत्र है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि पर इसका जप करने से आपकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कम से कम 108 बार आपको इस मंत्र का जप करना चाहिए।
महाशिवरात्रि के दिन पर भगवान शिव माता पार्वती के साथ कैलाश पर निवास करते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करते हैं। हालांकि महाशिवरात्रि उन दिनों में से एक है जब शिववास देखे बिना भी आप शिव पूजन कर सकते हैं। महाशिवरात्रि को निष्काम पूजा का दिन माना जाता है इसलिए इस दिन शिव पूजन आप बिना शिववास देखे कर सकते हैं।
जय गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम,
देहु अभय वरदान॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।
जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।
येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट से मोहि आन उबारो॥
मात-पिता भ्राता सब होई।
संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु मम संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदा हीं।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन।
मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत है शम्भु सहाई॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे।
ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।
ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे।
अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण॥
शास्त्रों में बताया गया है कि निशिता काल में की गई पूजा, मंत्र जाप और ध्यान कई गुना फल देता है। ऐसे में इस समय सोने से साधना का यह दुर्लभ अवसर छूट जाता है, इसलिए भक्तजन इस अवधि में जागरण कर शिव का स्मरण करते हैं। माना जाता है कि इस काल में शिव तत्व की ऊर्जा अधिक सक्रिय रहती है, जिससे मन को शांति, नकारात्मकता से मुक्ति और आत्मिक बल मिलता है।
महाशिवरात्रि पर निशिता काल पूजा समय 15 फरवरी 2026 की रात 12 बजकर 9 मिनट से लेकर देर रात 1 बजकर 1 मिनट तक रहेगा। ये शिवरात्रि पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त है। इस दौरान पूरी श्रद्धा से शिव की उपासना करें और उनके मंत्रों का जाप करें। इससे आपको भोलेनाथ की शीघ्र ही कृपा प्राप्त हो जाएगी।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
यह शिव गायत्री मंत्र है। इसके जाप से बुद्धि और एकाग्रता बेहतर होती है। ये चमत्कारी मंत्र व्यक्ति को सही निर्णय लेने की शक्ति देता है।
धर्म शास्त्रों अनुसार महाशिवरात्रि की पूरी रात भक्तों को भगवान शिव का जागरण और ध्यान करना चाहिए। लेकिन अगर ये संभव न हो तो कम से कम रात के 1 बजे तक जरूर जागना चाहिए और 12 से 1 के बीच भगवान शिव की पूजा भी जरूर करनी चाहिए।
महाशिवरात्रि पर प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, साध्य, शिव, शुक्ल, शोभन, सर्वार्थसिद्ध, चंद्रमंगल, त्रिग्रही, राज और ध्रुव योग का एक साथ निर्माण हो रहा है।
महाशिवरात्रि व्रत 15 फरवरी 2026 को रखा जाएगा और इसका पारण अगले दिन यानी 16 फरवरी 2026 को किया जाएगा। इस व्रत को निर्जला या फलाहारी भोजन का सेवन करके कैसे भी रख सकते हैं।
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं ममलेश्वरम् ॥1॥
परल्यां वैजनाथं च डाकियन्यां भीमशंकरम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥2॥
वारणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी तटे।
हिमालये तु केदारं ध्रुष्णेशं च शिवालये ॥3॥
एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरेण विनश्यति ॥4॥
धतूरे का फूल और फल भगवान शंकर का बेहद प्रिय माना जाता है। ऐसे में महाशिवरात्रि पर शिव पूजन करते समय भोलेनाथ को धतूरा अवश्य अर्पित करें। इस पावन दिन के लिए पूजन सामग्री में धतूरे का फूल और फल अर्पित करने से महादेव आपकी सभी मनोकामनाएं वश्य ही पूरी करेंगे।
मिट्टी के शिवलिंग का अभिषेक करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। महाशिवरात्रि में अलग-अलग तरह के पूजे जाने वाले शिवलिंग में पार्थिव शिवलिंग की पूजा सबसे उत्तम मानी गई है। इस दिन अपने हाथों से पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा करने से व्यक्ति को सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। साथ ही जीवन में आने वाले बड़े कष्टों से भी मुक्ति मिलती है।
पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि का आरंभ 15 फरवरी 2026 को शाम 5 बजकर 4 मिनट पर होगा। चतुर्दशी तिथि का समापन 16 फरवरी को शाम 5 बजकर 34 मिनट पर होगा। महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग जलाभिषेक का पहला मुहूर्त सुबह 8 बजकर 24 मिनट से सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा। दूसरा मुहूर्त सुबह 9 बजकर 48 मिनट से सुबह 11 बजकर 11 मिनट तक रहेगा। तीसरा मुहूर्त सुबह 11 बजकर 11 मिनट से दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा। ये तीनों मुहूर्त शिवलिंग जलाभिषेक के लिए अति उत्तम है। भगवान शिव की उपासना के लिए महाशिवरात्रि के दिन निशिता काल पूजा समय 12:28 ए एम से 01:17 ए एम (16 फरवरी) तक रहेगा।
महाशिवरात्रि पर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और इसके बाद स्वच्छ कपड़े पहनें।
संभव हो तो इस दिन सफेद या हल्के रंग के कपड़े पहनें।
घर के मंदिर की सफाई करें।
इसके बाद मंदिर में घी का दीपक जलाएं और हाथ में जल लेकर व्रत और पूजा का संकल्प लें।
फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करें।
शिवलिंग का जल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें। आप ये काम घर पर या मंदिर में कहीं भी कर सकते हैं। लेकिन इस मंदिर जरूर जाना है।
इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, भांग, आक के फूल और सफेद पुष्प चढ़ाएं। अगर घर पर शिवलिंग नहीं है तो भगवान की प्रतिमा पर ये सब चीजें अर्पित करें।
संभव हो तो शिव चालीसा का पाठ जरूर करें। साथ ही महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
इस दिन शिव परिवार की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है इसलिए भगवान शिव के साथ माता पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय और नंदी की पूजा भी अवश्य करें।
भगवान को भोग लगाएं और उनकी आरती करें।
सुबह की पूजा के बाद आप चाहें तो फलाहारी चीजों का सेवन कर सकते हैं।
कई भक्त महाशिवरात्रि की शाम में भगवान शिव की पूजा और अभिषेक करते हैं।
तो शाम की पूजा से पहले एक बार फिर से स्नान कर लें।
फिर घर के मंदिर में दीपक जलाएं और महाशिवरात्रि की कथा सुनें।
भगवान को फूल, बेलपत्र, भांग, धूतरा इत्यादि चीजें चढ़ाएं और मौसमी फल अर्पित करें।
फिर शिव जी की आरती करें।
इसके बाद परिवार के साथ बैठकर भजन या कीर्तन करें।
महाशिवरात्रि व्रत आप निर्जला भी रख सकते हैं फलाहारी भी। वैसे ज्यादातर श्रद्धालु इस व्रत को फलाहारी ही रखते हैं।
महा शिवरात्रि की मुख्य पूजा रात के समय निशिता काल में होती है। निशिता काल समय रात 12 बजे से 1 बजे तक रहा है। इसके अलावा कई लोग रात्रि के चारों प्रहर की पूजा भी करते हैं।
महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को फल, साबूदाना खिचड़ी, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी), दूध, गुड़, और सफेद बर्फी का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। ठंडाई और मालपुआ भी भगवान शिव का प्रिय भोग हैं।
तुलसी के पत्ते
केतकी के फूल
सिंदूर
नारियल का पानी
शंख से जल
खंडित अक्षत
महाशिवरात्रि मुख्य रूप से फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह, शिवलिंग के रूप में शिव के प्रथम प्राकट्य और समुद्र मंथन के दौरान विष पीने के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। यह रात आध्यात्मिक जागरण और नकारात्मकता को नष्ट कर मोक्ष पाने के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है।
शिवलिंग पर एक-एक करके जल या दूध चढ़ाना चाहिए और कभी भी एक साथ दोनों चीजों को न चढ़ाएं।
शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय मन ही मन ओम नम: शिवाय मंत्र का जाप करते रहें।
अभिषेक के बाद शिवलिंग पर धतूरा, भांग, बेलपत्र, गंगाजल, दूध शहद और दही चढ़ानी चाहिए।
महाशिवरात्रि पर नीलकंठ पक्षी को देखना बेहद शुभ माना जाता है। कहते हैं इस दिन इस पक्षी का दिखना समृद्धि और किस्मत खुलने का संकेत देता है।
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥
एक दंत दयावंत,
चार भुजा धारी ।
माथे सिंदूर सोहे
मूसे की सवारी ॥
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥
पान चढ़े फल चढ़े,
और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे
संत करें सेवा ॥
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥
अंधन को आंख देत,
कोढ़िन को काया ।
बांझन को पुत्र देत
निर्धन को माया ॥
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥
'सूर' श्याम शरण आए,
सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥
दीनन की लाज रखो,
शंभु सुतकारी ।
कामना को पूर्ण करो
जाऊं बलिहारी ॥
जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥
प्राचीन समय की बात है। एक शिकारी था जिसका नाम चित्रभानु था। वह जंगल में शिकार कर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। एक बार वह एक साहूकार से लिया गया कर्ज नहीं चुका सका, जिससे नाराज होकर साहूकार ने उसे बंदी बना लिया। सहयोग से उसी दिन महाशिवरात्रि का पर्व था। बंदीगृह में रहते हुए चित्रभानु ने वहां शिवरात्रि व्रत और भगवान शिव की महिमा से जुड़ी बातें सुनीं। उसके मन में एक अजीब-सी शांति उतर आई। संध्या को साहूकार ने उससे फिर ऋण का हिसाब मांगा, तो शिकारी ने वचन दिया कि वह अगली सुबह चुका देगा। साहूकार ने उसे छोड़ दिया।
रिहा होते ही चित्रभानु जंगल की ओर शिकार के लिए निकल पड़ा। दिनभर भूखा-प्यासा रहने के कारण वह थका हुआ था। सूर्यास्त के बाद वह एक जलाशय के पास पहुंचा और एक बेल वृक्ष पर चढ़ गया। उसे उम्मीद थी कि रात के समय कोई जानवर वहां पानी पीने जरूर आएगा। जिस पेड़ पर वह बैठा था, उसके नीचे एक शिवलिंग स्थापित था, जो बेलपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को इसकी जानकारी नहीं थी। जैसे ही उसने मचान बनाने के लिए शाखाएं तोड़ीं, कुछ बेलपत्र और पानी की बूंदें शिवलिंग पर गिर पड़ीं और अनजाने में ही उसके पहले प्रहर की पूजा हो गई।
रात के पहले पहर एक गर्भवती मृगी जल पीने आई। शिकारी ने धनुष ताना, तभी मृगी बोली "मैं गर्भवती हूं, कृपया मुझे जाने दो। प्रसव के बाद लौटकर आऊंगी।" शिकारी ने उसे दया से जाने दिया। इस तरह उसका व्रत और रात्रि-जागरण चलता रहा। दूसरे प्रहर में एक और मृगी आई। शिकारी ने तीर साधा, तो वह बोली "मैं अपने साथी की खोज में हूं। मिलकर तुरंत लौट आऊंगी।" शिकारी ने उसे भी छोड़ दिया।
तीसरे प्रहर में एक मृगी अपने बच्चों के साथ पहुंची। शिकारी फिर से तीर चलाने को हुआ, लेकिन मृगी ने आग्रह किया कि उसे बच्चों को उनके पिता के पास छोड़कर आने दिया जाए। शिकारी ने फिर से दया दिखाई और उसे जाने दिया। हर बार जब शिकारी तीर चलाने को होता, तब कुछ बेलपत्र और पानी की बूंदें शिवलिंग पर गिरते रहे — और इस तरह उसकी पूजा क्रमशः पूरी होती रही। रात के अंतिम प्रहर में एक मृग वहां आया। शिकारी ने सोचा "अब कोई बहाना नहीं मानूंगा।" लेकिन मृग बोला — "अगर तुमने मेरी तीनों पत्नियों को माफ कर दिया है, तो मुझे भी थोड़ी देर का जीवनदान दो। हम सब तुम्हारे सामने लौट आएंगे।" शिकारी ने मृग को भी जाने दिया।
कुछ ही देर में मृग अपनी तीनों पत्नियों और बच्चों के साथ वापस आया। शिकारी यह देखकर बहुत भावुक हो गया। उसकी आंखों से आंसू बह निकले और वह समझ गया कि करुणा ही सबसे बड़ा धर्म है। उसने शिकार का जीवन छोड़ दिया और शिवभक्ति में लीन हो गया। भगवान शिव उसकी भक्ति और करुणा से प्रसन्न हो गए। उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसे गुह नाम दिया और आशीर्वाद स्वरूप जीवन में सुख, समृद्धि व भक्ति का वरदान दिया। यही गुह, बाद में भगवान श्रीराम का घनिष्ठ मित्र बना।
शिव शंकर को जिसने पूजा,
उसका ही उद्धार हुआ ।
अंत काल को भवसागर में,
उसका बेडा पार हुआ ॥
भोले शंकर की पूजा करो,
ध्यान चरणों में इसके धरो ।
हर हर महादेव शिव शम्भू,
हर हर महादेव शिव शम्भू ।
हर हर महादेव शिव शम्भू...
डमरू वाला है जग में दयालु बड़ा
दीन दुखियों का देता जगत का पिता ॥
सब पे करता है ये भोला शंकर दया
सबको देता है ये आसरा ॥
इन पावन चरणों में अर्पण,
आकर जो इक बार हुआ,
अंतकाल को भवसागर में,
उसका बेडा पार हुआ,
हर हर महादेव शिव शम्भू,
हर हर महादेव शिव शम्भू ।
हर हर महादेव शिव शम्भू...
नाम ऊँचा है सबसे महादेव का,
वंदना इसकी करते है सब देवता ।
इसकी पूजा से वरदान पातें हैं सब,
शक्ति का दान पातें हैं सब।
नाथ असुर प्राणी सब पर ही,
भोले का उपकार हुआ ।
अंत काल को भवसागर में,
उसका बेडा पार हुआ॥
शिव शंकर को जिसने पूजा,
उसका ही उद्धार हुआ ।
अंत काल को भवसागर में,
उसका बेडा पार हुआ ॥
भोले शंकर की पूजा करो,
ध्यान चरणों में इसके धरो ।
हर हर महादेव शिव शम्भू,
हर हर महादेव शिव शम्भू ।
हर हर महादेव शिव शम्भू...
आशुतोष शशाँक शेखर,
चन्द्र मौली चिदंबरा,
कोटि कोटि प्रणाम शम्भू,
कोटि नमन दिगम्बरा ॥
निर्विकार ओमकार अविनाशी,
तुम्ही देवाधि देव,
जगत सर्जक प्रलय करता,
शिवम सत्यम सुंदरा ॥
निरंकार स्वरूप कालेश्वर,
महा योगीश्वरा,
दयानिधि दानिश्वर जय,
जटाधार अभयंकरा ॥
शूल पानी त्रिशूल धारी,
औगड़ी बाघम्बरी,
जय महेश त्रिलोचनाय,
विश्वनाथ विशम्भरा ॥
नाथ नागेश्वर हरो हर,
पाप साप अभिशाप तम,
महादेव महान भोले,
सदा शिव शिव संकरा ॥
जगत पति अनुरकती भक्ति,
सदैव तेरे चरण हो,
क्षमा हो अपराध सब,
जय जयति जगदीश्वरा ॥
जनम जीवन जगत का,
संताप ताप मिटे सभी,
ओम नमः शिवाय मन,
जपता रहे पञ्चाक्षरा ॥
आशुतोष शशाँक शेखर,
चन्द्र मौली चिदंबरा,
कोटि कोटि प्रणाम शम्भू,
कोटि नमन दिगम्बरा ॥
कोटि नमन दिगम्बरा..
कोटि नमन दिगम्बरा..
कोटि नमन दिगम्बरा..
महाशिवरात्रि व्रत 15 फरवरी की सुबह सूर्योदय के साथ शुरू होगा और इसका समापन 16 फरवरी की सुबह सूर्योदय के बाद किया जाएगा।
शिवलिंग पर सबसे पहले जल या गंगाजल चढ़ाएं। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शक्कर अर्पित करें। इसके बाद बेलपत्र, धतूरे का फल-फूल, भांग और चंदन इत्यादि चीजें चढ़ाएं।
एक साल में 12 या 13 शिवरात्रि व्रत आते हैं। जिनमें से फाल्गुन और श्रावण महीने की शिवरात्रि सबसे खास मानी जाती है। फाल्गुन महीने की शिवरात्रि 15 फरवरी 2026 को मनाई जाएगी।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् , उर्वारुकमिव बन्धनान्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !!
महामृत्युंजय मंत्र का हिंदी अर्थ - इस मंत्र का तात्पर्य ये है कि हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं। भगवान शंकर सुगंधित हैं और हमारा पोषण करते हैं। जैसे फल शाखा के बंधन से मुक्त हो जाता है वैसे ही हम भी मृत्यु और नश्वरता से मुक्त हो जाएं।
महा शिवरात्रि का पावन पर्व फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है जो इस बार 15 फरवरी को पड़ रही है।
महा शिवरात्रि का पावन पर्व 15 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा और पूजा का शुभ मुहूर्त 15 फरवरी की रात 12:09 से 01:01 बजे तक रहेगा।
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