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कोलकाता का ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर जहां हर मुराद होती है पूरी, पीएम मोदी ने भी टेका था मत्था, जानें इस मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं

 Written By: Vineeta Mandal
 Published : May 05, 2026 11:29 pm IST,  Updated : May 05, 2026 11:29 pm IST

Thanthania Kalibari Temple: ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर में भक्तों की हर मनोकामना पूरी हो जाती है। बंगाल चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने भी यहां दर्शन कर मां काली से प्रार्थना की थी। तो जानिए कोलकाता के ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर के बारे में।

ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर- India TV Hindi
ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर Image Source : ANI/PTI

Kalibari Temple: पश्चिम बंगाल का शहर कोलकाता अपने खानपान और कल्चर के साथ ही मां काली के प्रसिद्ध मंदिर के लिए भी जाना जाता है। इस शहर में मां काली के कई प्रसिद्ध मंदिर है। लेकिन इस दौरान सबसे अधिक चर्चा ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर की हो रही है। दरअसल, बंगाल चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां माता काली के द्वार पर मत्था टेक कर आशीर्वाद लिया था। यह अपनी वास्तुकला बल्कि अपनी आध्यात्मिक शक्ति के लिए भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर में जो भी व्यक्ति सच्चे मन से प्रार्थना करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। तो चलिए जानते हैं कोलकाता के ठंठनिया कालीबाड़ी मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के बारे में।

ठंठनिया कालीबाड़ी से जुड़ी मान्यताएं

ठंठनिया कालीबाड़ी में मां काली के 'सिद्धेश्वरी' रूप की पूजा होती है। इस मंदिर में मां काली का रूप अत्यंत सौम्य और जागृत माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद मां सिद्धेश्वरी जरूर पूरी करती हैं। इस कालीबाड़ी मंदिर में देवी मां के दर्शन के लिए हर दिन भक्तों की भीड़ रहती है लेकिन मंगलवार, शनिवार और अमावस्या के दिन यहां विशेष पूजा का आयोजन होता है। ठंठनिया कालीबाड़ी तंत्र पूजा के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि बंगाल के अधिकांश काली मंदिरों में प्रतिमा को विसर्जित किया जाता है, लेकिन यहां की मिट्टी की मूर्ति स्थायी है, जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।

ठंठनिया कालीबाड़ी  मंदिर का इतिहास

ठंठनिया कालीबाड़ी  मंदिर की स्थापना वर्ष 1703 में हुई थी। यह मंदिर तांत्रिक उदय नारायण ब्रह्मचारी द्वारा एक श्मशान पर बनाया गया था। बाद में 1806 में इस मंदिर को एक व्यापारी शंकर घोष द्वारा पुनः स्थापित किया गया।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पुराने समय में जब कोलकाता में चारों तरफ घने जंगल थे, तब डाकुओं के डर से लोगों को सचेत करने के लिए यहां एक लोहे के घंटे को जोर-जोर से पीटा जाता था। घंटे की उस 'ठन-ठन' आवाज के कारण ही इस पूरे इलाके और मंदिर का नाम 'ठंठनिया' पड़ गया। ठंठनिया कालीबाड़ी   मंदिर में मां काली की मूर्ति मिट्टी से बनी हुई है, जिसे हर साल साल लाल और काले रंगों से रंगा जाता है। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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