भारत और पाकिस्तान संघर्ष के बाद देश के अंदर तुर्किये का बहिष्कार किया जाने लगा है। जेएनयू और जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने तुर्किये के साथ MoU को रद्द कर दिया है। वहीं, अब हैदराबाद में स्थित मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय ने भारत से तनाव के दौरान तुर्किये द्वारा पाकिस्तान का समर्थन करने के लिए उसके एक संस्थान यूनुस एमरे के साथ अकादमिक सहयोग समझौते को तत्काल रद्द करने की घोषणा की है।
तुर्किये के 'समर्थन' के विरोध में लिया गया निर्णय
विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने गुरुवार को जारी एक बयान में कहा कि भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों के लिए तुर्किये के 'समर्थन' के विरोध में यह निर्णय लिया गया है।
पांच साल का था MoU
केंद्रीय विश्वविद्यालय ने कहा कि उसने 2020 में तुर्किये के संस्थान के साथ पांच साल की अवधि के लिए एक सहमति पत्र (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत विश्वविद्यालय में भाषा, भाषा विज्ञान और इंडोलॉजी स्कूल में तुर्किये भाषा में डिप्लोमा शुरू किया गया।
विजटिंग प्रोफेसर अपने देश लौटे
अधिकारी ने बताया कि पाठ्यक्रम के लिए नियुक्त एक विजिटिंग प्रोफेसर पहले ही अपने देश लौट चुके हैं। अधिकारियों ने हाल ही में कहा था कि भारत से बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान को तुर्किये के समर्थन के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) समेत कई शैक्षणिक संस्थानों ने तुर्किये के विश्वविद्यालयों के साथ अपने सहयोग को या तो निलंबित कर दिया है या इस तरह के कदम पर विचार कर रहे हैं।
जामिया और JNU ने की कड़ी निंदा
इस बीच, आजाद यूनाइटेड स्टूडेंट्स फेडरेशन (AUSF) ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक बयान में कहा कि वह तुर्किये के संस्थानों के साथ अपने शैक्षणिक समझौतों को रद्द करने या निलंबित करने के मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI) और जेएनयू के फैसलों की कड़ी निंदा करता है।
बयान में कहा गया है, 'भारत ने राजनीतिक संघर्ष के समय भी बौद्धिक सहभागिता के लिए अपने दरवाजे कभी बंद नहीं किए। आतंकवाद या राजनीतिक असहमति के आरोपों का इस्तेमाल अकादमिक सहयोग को रोकने के बहाने के रूप में करना उच्च शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय समझ की मूल भावना को कमजोर करता है।' (भाषा के इनपुट के साथ)