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सार्वजनिक जगह पर ही किए गए अपराध में ही SC-ST कानून होगा लागू, इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

 Published : May 23, 2024 07:14 am IST,  Updated : May 23, 2024 09:00 am IST

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि एसएसी-एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(आर) के तहत मामले में ये जरूरी है कि यह अपराध सार्वजनिक जगह पर किया होना चाहिए। आइए समझते हैं इस पूरे मामले को।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट। Image Source : ANI

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून, 1989 जिसे आम भाषा में एससी-एसटी एक्ट भी कहते हैं। इसको लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा आदेश जारी करते हुए कहा कि जानबूझकर अपमानित करने के कथित कृत्य के लिए एससी एसटी एक्ट के तहत अपराध तभी बनेगा जब यह सार्वजनिक जगह पर किया गया हो। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता पिंटू सिंह और दो अन्य लोगों की याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए इनके खिलाफ एससी एसटी एक्ट की संबंध में मुकदमा रद्द कर दिया।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, याचिकाकर्ता पिंटू कुमार औन दो अन्य लोगों के खिलाफ नवंबर साल 2017 में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं और एससी एसटी कानून की धारा 3(1) (आर) के तहत केस दर्ज किया गया था। केस में आरोप था कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता के घर में घुसकर उन्हें जातिसूचक गालियां दीं तथा उसे और उसके परिवार को मारा-पीटा।

एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा कब बनेगा?

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि यह अपराध शिकायतकर्ता के घर के भीतर हुआ। ये एक सार्वजनिक स्थल नहीं है और आम लोगों ने इस घटना को नहीं देखा। वकील ने कहा कि इस कारण इस मामले में एससी/एसटी कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा तभी बनता है जब व्यक्ति को सरेआम जानबूझकर अपमानित किया जाता है। वहीं, सरकारी वकील ने इस दावे पर आपत्ति जाहिर की। हालांकि, वकील ने कहा कि इस घटना से इनकार नहीं किया जा सकता ये सब शिकायतकर्ता के घर के भीतर हुआ। 

कोर्ट ने क्या कहा?

मामले पर दलीलें सुनने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता के बयान और प्राथमिकी से पता लग रहा है कि घटना जिस जगह पर हुई है वहां कोई बाहरी व्यक्ति मौजूद नहीं था। इसके बाद कोर्ट ने अपना आदेश दिया और कहा कि एसएसी-एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(आर) के तहत यह जरूरी है कि अपराध सार्वजनिक स्थान पर किया होना चाहिए। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने केस को रद्द करते हुए कहा कि अगर अपराध आम लोगों के सामने हुआ है तो एससी-एसटी कानून के प्रावधान लागू होंगे, लेकिन मौजूदा मामले में ऐसा नहीं हुआ। (इनपुट: भाषा)

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