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पश्चिम बंगाल के स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था चरमराई, सुप्रीम कोर्ट ने 26 हजार शिक्षकों-कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द की

 Published : Apr 05, 2025 02:43 pm IST,  Updated : Apr 05, 2025 02:43 pm IST

लगभग 26,000 शिक्षकों और कर्मचारियों ने ड्यूटी पर आना बंद कर दिया, एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्तियों को रद्द कर दिया था।

School- India TV Hindi
स्कूल Image Source : FILE

कोलकाता: सुप्रीम कोर्ट द्वारा पश्चिम बंगाल में 26,000 शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति रद्द किए जाने के फैसले का असर राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर साफ दिख रहा है। बंगाल के स्कूलों में शुक्रवार को अव्यवस्था फैल गई। लगभग 26,000 शिक्षकों और कर्मचारियों ने ड्यूटी पर आना बंद कर दिया, एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने रिश्वत-के-लिए-नौकरी घोटाले में उनकी  नियुक्तियों को रद्द कर दिया था। ये नियुक्तियां वर्ष 2016 में हुई थीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक सामूहिक निष्कासन से  कई जूनियर-माध्यमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था बाधित हुई है। इनमें कई स्कूल ऐसे हैं जहां आंतरिक परीक्षाएं चल रही हैं।

कई स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं

हिंदुस्तान टाइम्स की  एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कई स्कूलों पर इसका गंभीर असर दिखा। हुगली जिले के बांसबेरिया गंगा हाई स्कूल में हेडमास्टर विशाल तिवारी ने कहा, "जिन शिक्षकों की नियुक्तियां कोर्ट ने रद्द की हैं, उनमें तीन लाइफ साइंस और दो गणित के शिक्षक शामिल हैं। हमारे लिए स्कूल चलाना बेहद मुश्किल है।" उन्होंने कहा कि रातों रात स्कूल के 41 कर्मचारियों में से 15 चले गए। 

यह संकट राज्य के तकरीब हर जगह दिख रहा है। जलपाईगुड़ी जिले के धूपगुड़ी में, घोषपारा जूनियर हाई स्कूल में ग्रुप-डी का एकमात्र कर्मचारी प्रभावित लोगों में से एक था। नाम न बताने की शर्त पर एक स्थानीय अधिकारी ने कहा, "मई में शिक्षक की मृत्यु के बाद, जिला स्कूल बोर्ड द्वारा दूसरे स्कूल से एक शिक्षक को प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया था। शुक्रवार को ऐसी स्थिति थी कि स्कूल का गेट और क्लास को खोलने वाला कोई नहीं था, क्योंकि ग्रुप-डी कर्मचारी की नौकरी चली गई थी। लिहाजा अस्थायी शिक्षक को अपना काम करना पड़ा।"

शिक्षक नियुक्ति घोटाला मामला

सुप्रीम कोर्ट का फैसला कलकत्ता हाईकोर्ट  के आदेश पर शुरू की गई सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा लंबी जांच के बाद आया। एजेंसियों ने बड़े पैमाने पर भर्ती अनियमितताओं की जांच की, जिसमें शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि व्यापक भ्रष्टाचार के कारण उन्हें नौकरी नहीं दी गई। प्रभावित नियुक्तियां वर्ष 2016 में हुई थीं। भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अगुआई वाली पीठ ने कहा कि वैध और अवैध नियुक्तियों के बीच अंतर करना असंभव हो गया है, जिससे अदालत को पूरी सूची को रद्द करना पड़ा। 

ममता सुप्रीम कोर्ट के फैसले से असहमत

वहीं इस मामले पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि वह न्यायपालिका का सम्मान करती हैं, लेकिन सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ‘‘मानवीय आधार पर’’ असहमत हैं। बनर्जी ने भाजपा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) पर ‘‘षड्यंत्र रचने और फैसले को प्रभावित करने’’ का आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी सरकार शीर्ष अदालत के फैसले का पालन करेगी, साथ ही वह सभी संभावित कानूनी विकल्पों पर भी विचार करेगी।

ममता ने कहा, ‘‘मैं न्यायपालिका और न्यायाधीशों का बहुत सम्मान करती हूं, लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से मैं इस फैसले को स्वीकार नहीं कर सकती। इस देश की नागरिक होने के नाते मुझे अपनी राय व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। मैं न्यायाधीश और न्यायपालिका का सम्मान करती हूं, लेकिन मैं फैसले से असहमत हूं।’’ मुख्यमंत्री ने सवाल किया, ‘‘एक व्यक्ति के अपराध के कारण सभी को सजा कैसे मिल सकती है?’’ बनर्जी ने बर्खास्त शिक्षकों के समर्थन के लिए भाजपा द्वारा उन्हें निशाना बनाए जाने की आलोचना की। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे वकील इस मामले की समीक्षा करेंगे। अगर भाजपा मुझे उनका समर्थन करने के लिए जेल भेजना चाहती है, तो भेज सकती है। अगर आप चाहें तो मुझे पकड़ लें।’’

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