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क्या सुशीला कार्की नहीं बनेंगी अंतरिम प्रधानमंत्री? नेपाली संगठन ने किया राजशाही बहाल करने की साजिश का दावा

 Published : Sep 12, 2025 12:07 pm IST,  Updated : Sep 12, 2025 12:40 pm IST

नेपाल में राजशाही की वापसी का दावा करने वाले संगठन ने यह भी कहा कि आगे का रास्ता राष्ट्रपति के मार्गदर्शन में तय होना चाहिए और कोई भी नई नागरिक सरकार संविधान का पालन, भ्रष्टाचार का विरोध और प्रति-क्रांतिकारी ताकतों को बाहर रखने के लिए प्रतिबद्ध होनी चाहिए।

नेपाल में राष्ट्रपति भवन के बाहर तैनात सेना। - India TV Hindi
नेपाल में राष्ट्रपति भवन के बाहर तैनात सेना। Image Source : PTI

काठमांडू: नेपाल में जेन-जी आंदोलन के पीछे देश में फिर से राजशाही को बहाल करने की साजिश का दावा किया जा रहा है। इस दावे ने सनसनी मचा दी है। नेपाल में नागरिक समाज से जुड़े संगठन ‘बृहत नागरिक आंदोलन’ (बीएनए) की ओर से यह दावा किया गया है। बीएनए का कहना है कि देश में राजशाही बहाल करने की एक साजिश रची जा रही है, जो कथित तौर पर ‘सैन्य मध्यस्थता’ के तहत हो रही है।

सुशीला कार्की नहीं बन पाएंगी पीएम

संगठन का कहना है कि यह साजिश उस समय सामने आ रही है, जब केपी शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद एक संक्रमणकालीन सरकार के गठन के लिए राजनीतिक बातचीत जारी है। ऐसे में सुशीला कार्की का अंतरिम प्रधानमंत्री बन पाना मुश्किल दिख रहा है। बीएनए ने बृहस्पतिवार को जारी एक बयान में नेपाल सेना की बढ़ती भूमिका पर गहरी चिंता जताई। बयान में कहा गया कि मंगलवार से नेपाली सेना द्वारा राष्ट्रव्यापी सुरक्षा अभियानों की कमान संभाले जाने के बाद, उसकी भूमिका केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि राष्ट्रीय मामलों में हस्तक्षेप का रूप ले चुकी है।

‘जेन-जेड आंदोलन’ के बहाने राजशाही की वापसी?

समाचार पोर्टल ‘माई रिपब्लिका’ के अनुसार संगठन का आरोप है कि सेना की मध्यस्थता में राजशाही बहाल करने, धर्मनिरपेक्षता समाप्त करने, संघीय ढांचे को कमजोर करने, और प्रत्येक वर्ग की समावेशिता पर हमला करने की एक गंभीर साजिश रची जा रही है। बीएनए ने बयान में कहा, “जेन-जेड आंदोलन के शहीदों के शवों पर खड़े होकर इस तरह के प्रयास पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं। हमारा आंदोलन कभी भी गणतंत्र या धर्मनिरपेक्षता को समाप्त करने या सेना की असंवैधानिक सक्रियता को बढ़ावा देने के लिए नहीं था।” 

जेनरेशन Z के आंदोलन से मचा सियासी उथल-पुथल

गौरतलब है कि हाल ही में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाए जाने और भ्रष्टाचार के विरोध में ‘जेनरेशन Z’ के बैनर तले स्कूली छात्रों और युवाओं ने देशव्यापी आंदोलन छेड़ दिया था। आंदोलन के दबाव में सरकार ने प्रतिबंध तो हटा लिया, लेकिन इसके बाद देश में गंभीर राजनीतिक अस्थिरता देखने को मिली। प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद देश की बागडोर अस्थायी रूप से सेना के हाथों में है, जिससे नागरिक संगठनों में गणतंत्र और लोकतंत्र की दिशा को लेकर चिंता गहराई है।

क्या है ‘जेनरेशन Z’?

जेनरेशन Z (Gen Z) उन युवाओं को कहा जाता है जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। वर्ष 2025 तक यह पीढ़ी विश्व की 30% कार्यबल (वर्कफोर्स) बन चुकी होगी। यह पीढ़ी सोशल मीडिया, स्वतंत्र सोच और नागरिक अधिकारों को लेकर बेहद सजग मानी जाती है, और हालिया आंदोलनों में उसकी भागीदारी ने नेपाल के राजनीतिक परिदृश्य को हिला कर रख दिया है। (भाषा)

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