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पाकिस्तान की अदालत का बड़ा फैसला, 2014 के वाघा आत्मघाती हमले में 300 साल की सजा पाए दोषियों को किया बरी

 Published : Nov 05, 2025 11:06 pm IST,  Updated : Nov 05, 2025 11:06 pm IST

वाघा हमला भारत-पाकिस्तान के बीच विश्वासघात का प्रतीक था, और यह फैसला दोनों देशों को सतर्क रहने की चेतावनी देता है। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाना जरूरी है। कुल मिलाकर, यह घटना दक्षिण एशिया की सुरक्षा चुनौतियों को उजागर करती है, जहां आतंकवाद की जड़ें गहरी हैं।

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट। (फाइल)- India TV Hindi
पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट। (फाइल) Image Source : AP

Pakistan Court Verdict: पाकिस्तान की एक अदालत ने 2014 वाघा हमले के तीन दोषियों की मौत की सजा रद्द कर दी है। पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था में यह महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब लाहौर उच्च न्यायालय ने 2014 के वाघा सीमा आत्मघाती हमले के तीन दोषियों की मौत की सजा और 300 साल की कैद की सजा को रद्द कर दिया।

60 लोगों की हुई थी मौत

वाघा बॉर्डर पर हुए आत्मघाती हमले में 60 से अधिक निर्दोष लोग मारे गए थे। अदालत के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बुधवार को इस फैसले की पुष्टि की, जो मंगलवार को सुनाया गया। इस हमले ने भारत-पाकिस्तान संबंधों को गहरा आघात पहुंचाया था। न्यायमूर्ति सैयद शाहबाज अली रिजवी की अगुवाई वाली खंडपीठ ने हसीनुल्लाह हसीना, हबीबुल्लाह और सैयद जान उर्फ गजनी की अपील को स्वीकार करते हुए इन तीनों दोषियों को बरी कर दिया। यह फैसला न केवल पीड़ित परिवारों के लिए झटका है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं को भी नई दिशा दे सकता है।

2014 में क्या हुआ था

 2 नवंबर 2014 को वाघा-अटारी सीमा पर परेड समारोह के दौरान एक घातक आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें धमाका इतना जोरदार था कि आसपास के लोग उछल पड़े। इसमें 60 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। मारे गए लोगों में ज्यादातर पाकिस्तानी नागरिक थे। इस हमले में 100 से अधिक घायल हुए। घायलों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, जो उस दिन सीमा की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बने समारोह को देखने आए थे। हमले की जिम्मेदारी दो प्रतिबंधित संगठनों ने जुंदुल्लाह और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से अलग हुआ गुट जमात-उल-अहरार ने ली थी। 

300 साल की मिली थी सजा

हमले की जिम्मेदारी लेने वाले इन संगठनों ने पाकिस्तानी सेना और नागरिकों को निशाना बनाने की धमकी दी थी, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ सरकार के खिलाफ विद्रोह का हिस्सा था। 2020 में लाहौर की एक विशेष आतंकवाद-रोधी अदालत ने इन तीनों को दोषी ठहराया था। अदालत ने पाया कि वे प्रतिबंधित जमात-उल-अहरार के सदस्य थे और आत्मघाती हमलावरों को सहायता प्रदान करने, हथियार उपलब्ध कराने तथा हमले की योजना में शामिल होने के आरोप सिद्ध हुए। सजा इतनी कठोर थी कि मौत की सजा के साथ-साथ 300 साल की उम्रकैद जो पाकिस्तानी कानून की सख्ती को दर्शाती थी।

इन सुबूतों पर ठहराया गया था दोषी

 दोषियों पर आरोप था कि उन्होंने हमलावरों को सीमा तक पहुंचाने, विस्फोटक सामग्री जुटाने और फरार होने की व्यवस्था करने में भूमिका निभाई। जांच एजेंसियों ने सीसीटीवी फुटेज, गवाहों के बयान और मोबाइल रिकॉर्ड के आधार पर सबूत जुटाए थे। हालांकि, अपील अदालत ने इन सजाओं को रद्द करते हुए तर्क दिया कि सबूत पर्याप्त मजबूत नहीं थे और प्रक्रियागत खामियां थीं। अधिकारी ने कहा, "उच्च न्यायालय ने मंगलवार को फैसला सुनाते हुए तीनों को बरी करने का आदेश दिया है।" यह फैसला पाकिस्तान की न्यायिक स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करता है, खासकर जब आतंकवाद के मामलों में सजाएं अक्सर राजनीतिक दबाव से प्रभावित होती हैं। पीड़ित परिवारों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है, जबकि मानवाधिकार संगठन इसे न्याय का विजय मान रहे हैं। (भाषा)

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