नई दिल्ली: आवारा कुत्तों का प्रबंधन देश में एक बड़ा मुद्दा है, जिसका स्थायी समाधान निकलना जरूरी है। ऐसे में सांसदों, कानूनी विशेषज्ञों, कार्यकर्ताओं, प्रशासकों और नागरिक समाज के नेताओं के एक प्रतिष्ठित पैनल ने भारत में आवारा कुत्तों के प्रबंधन के लिए समाधान पर विचार-विमर्श करने के लिए दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में बैठक की। इस दौरान हुई चर्चा में ये स्वीकार किया गया कि फैसले ने सामुदायिक पशुपालकों और आवारा कुत्तों को स्थायी रूप से हटाने की मांग करने वालों के बीच ध्रुवीकरण को और गहरा कर दिया है। इस विभाजन की वजह से सामुदायिक पशुओं के खिलाफ हिंसा में वृद्धि हुई है, जिसमें तेलंगाना में रिपोर्ट की गई परेशान करने वाली घटनाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा भोजन कराने वालों और देखभाल करने वालों पर उत्पीड़न और हमले भी हुए हैं।
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इस बैठक में 2 बातें मुख्य रूप से स्वीकार की गईं कि पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) कार्यक्रम को पर्याप्त निधि नहीं मिली है और इसका पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है। स्थायी सामूहिक आश्रय स्थल बनाना न तो टिकाऊ है और न ही मानवीय समाधान। इसके अलावा पैनल ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को जानवरों को मारने जैसे उपायों से दूर हटकर वैज्ञानिक नसबंदी, टीकाकरण, जवाबदेही और जन जागरूकता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
शिव सेना यूबीटी सांसद प्रियंका चतुर्वेदी का भी सामने आया बयान
शिव सेना यूबीटी सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने स्वीकार किया कि मनुष्य और कुत्ते के बीच संघर्ष होता है और इसका जिम्मेदारी से समाधान किया जाना चाहिए। उन्होंने इस मामले में तकनीकी सुधारों की मांग की। उन्होंने कहा कि हम अलग-थलग रहकर काम नहीं कर सकते और साथ ही यह भी जोड़ा कि केंद्र, राज्य और नागरिक समाज के बीच समन्वित कार्रवाई महत्वपूर्ण है। उन्होंने नसबंदी, टीकाकरण और शिकायत प्रणालियों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए एआई उपकरणों सहित एकीकरण पर जोर दिया।
एनसीपी सांसद अनीश गावंडे ने कही ये बात
अनीश गावंडे ने महाराष्ट्र में प्रशासनिक बाधाओं को उजागर करते हुए इसे नगरपालिका प्रशासन की विफलता बताया। उन्होंने दोहराया कि एबीसी कार्यक्रम का उचित कार्यान्वयन ही तार्किक और कानूनी रूप से समर्थित समाधान है और जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए राजनीतिक दबाव बनाने हेतु जनता से एकजुट होकर मांग करने का आग्रह किया।
कार्यकर्ता अंजली गोपालन ने दी ये राय
अंजली गोपालन ने इस बात पर जोर दिया कि गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) यह दिखा सकते हैं कि क्या कारगर है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति अपरिहार्य है। नीदरलैंड्स को एक वैश्विक उदाहरण के रूप में उद्धृत करते हुए, उन्होंने गोद लेने के अभियान और सख्त प्रजनन नियंत्रण को प्रभावी मॉडल बताया। उन्होंने कहा कि सख्त प्रवर्तन केवल पशु कल्याण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह समाज की सुरक्षा का भी एक साधन है।
कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने क्या कहा?
कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने इस बात पर जोर दिया कि जानवरों के प्रति क्रूरता अक्सर मनुष्यों के प्रति क्रूरता की ओर ले जाती है। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें दोनों ही जवाबदेह हैं।
अधिवक्ता पौलोमी पाविनी शुक्ला ने इस बात पर जोर दिया
पौलोमी पाविनी शुक्ला ने बाल कल्याण और पशु कल्याण को जोड़ते हुए एक सशक्त भाषण दिया। उन्होंने कहा कि जो समाज पशुओं के प्रति निर्दयी है, वह अपने बच्चों के प्रति दयालु नहीं हो सकता। भारत में अनुमानित 31 करोड़ अनाथ बच्चों और सड़कों पर रहने वाले 16 करोड़ बच्चों की ओर ध्यान दिलाते हुए, उन्होंने इस बात पर सवाल उठाया कि जब मानव कल्याण के महत्वपूर्ण क्षेत्र संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, तो स्थायी कुत्ते आश्रयों को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है।
उन्होंने चेतावनी दी कि बड़े पैमाने पर आश्रय स्थल बनाने से स्वास्थ्य संकट पैदा हो सकते हैं, जिनमें जानवरों और मनुष्यों दोनों को प्रभावित करने वाले वायरल संक्रमण भी शामिल हैं। उन्होंने सामुदायिक आधारित नसबंदी की सफलता पर जोर दिया।
पीपल फार्म के रॉबिन सिंह ने क्या कहा?
रॉबिन सिंह ने गांव-गांव से शुरू करके और बाहर की ओर विस्तार करते हुए ग्रिड-आधारित नसबंदी मॉडल की वकालत की और जयपुर में इसके सफल परिणामों का हवाला दिया। इस दृष्टिकोण से प्रजनन चक्र कम होते हैं, आक्रामकता घटती है और आबादी स्वाभाविक रूप से स्थिर होती है। उन्होंने बच्चों को कम उम्र से ही शिक्षित करने और उनमें भय के बजाय करुणा की भावना पैदा करने की आवश्यकता पर बल दिया।
दिल्ली उच्च न्यायालय की एडवोकेट ऐश्वर्या सिंह ने क्या कहा?
ऐश्वर्या सिंह ने मानव और पशु कल्याण के बीच प्रत्यक्ष इंटररिलेशन पर बल दिया। उन्होंने काटने के बाद की देखभाल के संबंध में जागरूकता की कमी को उजागर करते हुए कहा कि यहां तक कि प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों में भी स्थापित प्रोटोकॉल को लेकर स्पष्टता का अभाव है। इसके लिए शिक्षा अभियान चलाया जाना चाहिए।
आरडब्ल्यूए और नागरिक समाज का दृष्टिकोण
जंगपुरा आरडब्ल्यूए के अनिल गोस्वामी ने नगरपालिकाओं से सामूहिक जवाबदेही की मांग करने के लिए एक एकीकृत आरडब्ल्यूए मंच बनाने का आह्वान किया। उन्होंने सामुदायिक स्तर पर जागरूकता पर जोर देते हुए कहा, "हर एक, दूसरे को सिखाए।"
बैठक में हुई चर्चा से क्या प्रमुख प्रस्ताव निकले?
- एबीसी कार्यक्रम के लिए तत्काल और पर्याप्त धनराशि हो।
- पारदर्शी डैशबोर्ड और लेखापरीक्षित नगरपालिका व्यय रिकॉर्ड हो।
- केंद्र-राज्य समन्वय और सभी दलों का सहयोग हो।
- अवैध प्रजनन और परित्याग पर सख्त नियमन हो।
- टीकाकरण और काटने के बाद की देखभाल पर जन जागरूकता अभियान हो।
- बचपन से ही सहानुभूति विकसित करने वाली शिक्षा प्रणाली हो।
- आवारा कुत्तों के वैज्ञानिक प्रबंधन में न्यायपालिका की सहायता के लिए एक विशेषज्ञ सलाहकार समिति का गठन हो।
क्या निकला निष्कर्ष?
पैनल ने इस बात पर जोर दिया कि यह मुद्दा जानवरों बनाम मनुष्यों का नहीं है, बल्कि यह शासन, जवाबदेही, सहानुभूति और वैज्ञानिक नीति कार्यान्वयन से संबंधित है। भारत में समाधानों की कमी नहीं है; बल्कि समन्वित कार्यान्वयन की कमी है। सभा से स्पष्ट संदेश मिला: ध्रुवीकरण से आगे बढ़ें, भय-आधारित कथनों को नकारें और करुणा, डेटा पारदर्शिता और सहयोगात्मक शासन पर आधारित एक राष्ट्रीय ढांचा तैयार करें।