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आवारा कुत्तों पर टिप्पणी के लिए मेनका गांधी को सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार, क्या क्या हुआ, जानें

 Reported By: Atul Bhatia Edited By: Kajal Kumari
 Published : Jan 20, 2026 03:39 pm IST,  Updated : Jan 20, 2026 11:51 pm IST

सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के मामले में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि हम कुत्ते को प्रमाण पत्र ले जाने के लिए क्यों नहीं कह सकते? जानें कोर्ट में और क्या क्या कहा गया?

आवारा कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई- India TV Hindi
आवारा कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई Image Source : WIKIPEDIA

आवारा कुत्तों के मामले पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई  हुई। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने कहा कि इस विषय पर बहुत साहित्य उपलब्ध हैं, यह विशेषज्ञों का मामला है और कृपया विशेषज्ञ समिति की नियुक्ति पर विचार करें। मेनका गांधी की ओर से पेश वकील राजू रामचंद्रन ने कहा-मेरी मुवक्किल कई वर्षों तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री रह चुकी हैं। इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि कुछ देर पहले आप कह रहे थे कि अदालत को सतर्क रहना चाहिए। क्या आपने पता लगाया कि वह किस तरह के बयान दे रही हैं।


मेनका गांधी ने नाराजगी जताई, कोर्ट ने लगाई फटकार

बेघर कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की आलोचना पर अदालत ने पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी पर नाराज़गी जताई। कोर्ट ने  कहा कि उन्होंने अदालत की अवमानना की है। बेघर कुत्तों पर दिए गए आदेश की आलोचना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह अपनी उदारता के चलते मेनका गांधी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी से सवाल किया कि बेघर कुत्तों की समस्या के समाधान के लिए उन्होंने अब तक कितना बजटीय आवंटन दिलाने में मदद की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कुत्तों को खाना खिलाने वालों की जवाबदेही तय करने संबंधी टिप्पणी व्यंग्यात्मक नहीं थी, बल्कि पूरी तरह गंभीर और सोच-समझकर की गई टिप्पणी थी।

अगर मैं कसाब के लिए पेश हो सकता हूं, तो...

रामचंद्रन ने कहा कि बिल्कुल, अगर मैं अजमल कसाब के लिए पेश हो सकता हूं, तो उनके लिए भी पेश हो सकता हूं। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि आपकी मुवक्किल ने अवमानना की है। हमने कोई कार्रवाई नहीं की है, यही हमारी उदारता है। आप देखिए वह क्या कहती हैं, उनकी बॉडी लैंग्वेज देखिए। रामचंद्रन ने कहा कि सार्वजनिक टिप्पणियों के मामले में वकीलों और जजों का दृष्टिकोण अलग-अलग होता है, मुझे आवेदनों पर बोलने दीजिए।

वकील राजू रामचंद्रन ने समस्या के समाधान के लिए सुझाव दिए। कहा-एबीसी नियमों का कार्यान्वयन समग्र रणनीति का अभिन्न अंग है। इसमें सभी हितधारकों की भूमिका स्पष्ट रूप से बताई गई है और राज्यों को अपनी कार्य योजनाएं विकसित करने का निर्देश दिया गया है। 30 से अधिक राज्यों ने ऐसा नहीं किया है, समाधान स्थायी आश्रय स्थल बनाने में नहीं, बल्कि मौजूदा ढांचे के समयबद्ध कार्यान्वयन में निहित है।

जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि चूंकि आपकी मुवक्किल मंत्री रह चुकी हैं और पशु अधिकार कार्यकर्ता हैं। तो हमें बताइए कि आपके आवेदन में बजट आवंटन का ज़िक्र क्यों नहीं है। इन क्षेत्रों में आपके मुवक्किल का क्या योगदान रहा है...? रामचंद्रन ने कहा कि मैं इसका मौखिक उत्तर नहीं दे सकता।

हर शहर में हेल्पलाइन होनी चाहिए

एक अन्य वकील ने कहा कि हर शहर में हेल्पलाइन होनी चाहिए, कुत्तों को मारना जायज़ नहीं है। इस अदालत के फैसले के बाद HC इस मामले को देखें। भारती त्यागी के वकील ने कहा कि मैंने इस मुद्दे से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायक्षेत्रों द्वारा अपनाए जा रहे उपायों पर एक नोट दिया है, नीदरलैंड इसका एक सफल उदाहरण है। जानवरों को छोड़ने से रोकने के लिए नीदरलैंड का मॉडल अपनाया गया है।

वकील ने कहा-मेरी चिंता अलग है

वकील हर्ष जैदका ने कहा कि मेरी चिंता अलग है। मेरे इलाके में बहुत सारे आवारा कुत्ते हैं, पूरी तरह से अशांति है मुझे, नींद की समस्या होने लगी है और बच्चे पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने कहा कि हम केवल टीकाकरण और नसबंदी कर सकते हैं।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग ने भी कोई कार्रवाई नहीं की है, उपद्रव होने पर आवारा कुत्तों को हटाया जा सकता है। वकील प्रशांत भूषण ने आगे कहा कि कुत्तों का अल्ट्रासाउंड भी किया जा सकता है। इसपर जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि हम कुत्ते को प्रमाण पत्र ले जाने के लिए क्यों नहीं कह सकते?  इसपर भूषण ने कहा कि मैं कहना चाहता हूं कि सुनवाई के दौरान जजों ने कुछ टिप्पणियां की हैं, जिनमें से कुछ का गलत अर्थ निकाला गया है।

इसपर जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि कोई बात नहीं, तर्क अव्यावहारिक हैं। भूषण ने कहा कि कभी-कभी कोर्ट की टिप्पणियों के गंभीर परिणाम हो जाते हैं। जैसे मान लीजिए पीठ ने व्यंग्यपूर्वक टिप्पणी की कि दाना चुगली करने वालों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, इसकी रिपोर्ट प्रकाशित हुई। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि नहीं नहीं, बिल्कुल भी व्यंग्यपूर्ण नहीं था। हम गंभीर थे, हमें नहीं पता कि हम क्या करेंगे, लेकिन हम गंभीर थे।

वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने कहा कि बार के सदस्य के रूप में मैं भी इस पर कुछ कहना चाहता हूं। कार्यवाही का टेलीविजन पर प्रसारण होता है। बार और पीठ दोनों का कर्तव्य है कि वे सतर्क रहें। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि हम जानते हैं, इसे ध्यान में रखते हुए हम ऐसा करने से बच रहे हैं।

 

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