Iran Revolutionary Guard: ईरान में अभी सबसे ताकतवर संस्था प्रेसीडेंसी नहीं है। यह पार्लियामेंट नहीं है और यह अंतरिम लीडरशिप काउंसिल भी नहीं है। यह इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) है। अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई और कई सीनियर कमांडरों के मारे जाने के बाद, IRGC सिस्टम का स्टेबलाइजिंग सेंटर बन गया है। इसके कमांडर इन चीफ मोहम्मद पाकपुर भी मारे गए लोगों में शामिल हैं। पाकपुर की मौत के बाद अहमद वहीदी ने फोर्स का चार्ज संभाला है।
पॉलिटिकल लेवल पर एक अंतरिम स्ट्रक्चर काम कर रहा है जिसमें प्रेसिडेंट मसूद पेजेशकियन, चीफ जस्टिस गुलाम मोहसेनी एजेई और अयातुल्ला अलीरेजा अराफी शामिल हैं। इन्हें परमानेंट सक्सेसर चुने जाने तक अंतरिम सुप्रीम लीडर बनाया गया है। लेकिन, जब ऑपरेशनल अथॉरिटी की बात आती है मिलिट्री फैसले, इलाके की स्थिति, डिटरेंस तो फैसला IRGC ही लेती है। तो यह समझने के लिए कि आगे क्या हो सकता है हमें IRGC को समझना होगा। तो चलिए ऐसे में जानते हैं कि यह कितना बड़ा है, इसका स्ट्रक्चर कैसा है और यह कैसे काम करता है।
IRGC की शुरुआत 1979 की ईरानी क्रांति के बाद हुई थी। इसका मकसद था इस्लामिक रिपब्लिक को अंदरूनी और बाहरी खतरों से बचाना। समय के साथ यह ईरान की नियमित सेना के साथ-साथ एक अलग, मजबूत मिलिट्री बन गई। इसकी ताकत लगभग 1.25 लाख से 1.9 लाख सैनिकों के बीच है। इसमें शामिल हैं...
ईरान की ड्रोन इन्वेंट्री भी IRGC के अंडर है जिनकी संख्या हजारों में है। इनमें सर्विलांस प्लेटफॉर्म और स्ट्राइक कैपेबल सिस्टम शामिल हैं। समुद्र में IRGC एक एसिमेट्रिक डॉक्ट्रिन को फॉलो करता है। बड़े सरफेस फ्लीट के बजाय यह सैकड़ों फास्ट अटैक क्राफ्ट, कोस्टल एंटी-शिप मिसाइल बैटरी, सी माइंस और उथले पानी के लिए सही छोटी सबमरीन पर डिपेंड करता है। इसका फोकस डिटरेंस खासकर स्ट्रेटेजिक मैरीटाइम चोकपॉइंट के आसपास रहता है।
जमीन पर IRGC यूनिट्स आर्मर, आर्टिलरी और रैपिड-रिस्पॉन्स फॉर्मेशन बनाए रखती हैं जो इंटरनल सिक्योरिटी और बॉर्डर डिफेंस पर ध्यान केंद्रित करती है। IRGC को इस इलाके के सबसे काबिल मिलिट्री ऑर्गनाइजेशन में से एक माना जाता है। अंदर से IRGC का स्ट्रक्चर बना हुआ है, लेकिन यह एक जैसा नहीं है। एनालिस्ट अक्सर इसकी लीडरशिप में 3 बड़े ग्रुप की बात करते हैं।
एक ग्रुप अंदरूनी स्थिरता और सरकार की निरंतरता को प्राथमिकता देता है। दूसरा रीजनल प्रोजेक्शन और स्ट्रेटेजिक कमांड पर जोर देता है। तीसरा ग्रुप आर्थिक रुकावटों के जोखिमों को देखता है। ये फॉर्मल ग्रुप नहीं हैं लेकिन बाहरी दबाव और लीडरशिप में बदलाव के आधार पर असर बदल सकता है। अब तक ऑर्गनाइजेशन की तरफ से पब्लिक मैसेज में एकता पर जोर दिया गया है। खासकर मौजूदा समय में इस एकता की बेहद जरूरत भी नजर आती है।
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायली हमलों के बाद जवाबी कार्रवाई का एक ही पैटर्न दिखता है। ईरान ने दुबई, दोहा और मनामा सहित अरब की खाड़ी में मिसाइल और ड्रोन लॉन्च किए, जिससे जंग फैलती हुई नजर आ रही है। इससे IRGC की ऑपरेशनल पहुंच का भी पता चला। इससे यह संकेत मिलता है कि एस्केलेशन का प्लान भौगोलिक रूप से सीमित नहीं हैं। कम से कम अभी के लिए तो ऐसा ही लगता है।
समय के साथ किसी भी संस्था की असली ताकत की परीक्षा होती है। ईरान में यह परीक्षा अब IRGC और पूरे सिस्टम पर हो रही है। अमेरिका और इजरायल ने IRGC हेडक्वार्टर पर हमला करके साफ कर दिया कि ऑर्गनाइजेशन उनके रडार में है। अमेरिका का इसे ‘सांप का सिर काटना’ बताना साफ संकेत है कि IRGC के कमांड स्ट्रक्चर पर इसकी पूरी नजर है। अगर अमेरिका का हमला जारी रहा तो दबाव बढ़ता जाएगा, इससे ऑर्गनाइजेशन के कोऑर्डिनेशन पर असर जरूर पड़ेगा।
जंग के समय में अगर दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया तो ईरान की अंदरूनी ताकत का संतुलन चरमरा सकता है। वैसे IRGC को मूलरूप से सिस्टम की रक्षा करने के लिए बनाया गया था लेकिन अब स्थिति उलट गई है। IRGC को सिस्टम बचाना है वो भी ऐसे समय में जब खुद वह निशाने पर है। वैसे तो ईरान का सिस्टम मजबूत है, लेकिन अभी वह बड़े टेस्ट से गुजर रहा है। जंग को माहौल में अगर दबाव बढ़ा तो सिस्टम में अंदरूनी दरारें आ सकती हैं। ऐसे में IRGC की भूमिका बड़ी होने वाली है ना सिर्फ खुद को संभालना बल्कि सिस्टम को भी बचाना।
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