अनुष्का शर्मा ने एनएच10 जैसी महिला प्रधान फ़िल्म में काम करके अपने करिअर का एक नया अध्याय शुरु किया है। इस फ़िल्म में उन्होंने नायक के बग़ैर ग़ुंडों से मुक़ाबला कर समाज की एक बिराई से लोहा लिया था। अनिष्का की बतौर प्रोड्यूसर ये पहली फ़िल्म थी।
इस फ़िल्म की सफ़लता के बाद अनुष्का बॉलीवुड में महिला अदाकारों के लिये चार बदलाव चाहती हैं।
1.महिला अदाकारों को चुनौतीपूर्ण भूमिका की मांग करनी चाहिये:
"एक फिल्म में लड़के को लट्टू बनाने के लिये लड़कियों को सुंदर होने के अलावा दिलचस्प भी होना पड़ता है। महिला का फिल्म में वजूद तभी होता है जब उसमें लड़का भी हो। लज़का उनकी तरफ आकर्षित हो इसके लिये उनका ख़ूबसूरत दिखना बेहद ज़रुरी होता है। हम उन्हें कुछ एक फिल्मों को छोड़कर, ऐसे ही रुप में देखते रहे हैं। मेरा कहना है कि आप (महिला अदाकारा) अपनी ख़ूबसूरती और नाज़-ओ-नख़रे के अलावा फ़िल्म को और क्या दे सकती हैं?"
2.100 करोड़ शब्द से मीडिया सिस्टम को भ्रष्ट कर रहा है।:
पुरुष कलाकारों का प्रयोगात्मक फ़िल्म न करने पर अनुष्का का कहना है कि ऐसा नहीं है कि वे हमारे साथ मतलबी हो रहे हैं। समस्या ये है कि उन पर 100 करोड़ रुपये कमाने वाली देने का दबाव रहता है। इसलिये वे जोख़िम लेने से कतराते हैं। अगर कोई लड़की 100 करोड़ की फिल्म दे दे तो कहते हैं 'ओह अच्छा उसने 100 करोड़ की फिल्म बना दी। लेकिन लड़को के मामले में तो ये होता है कि उसे 100 करोड़ कमाने वाली फ़िल्म देनी ही देनी है। मीडिया को किसी फिल्म की सफलता को 100 करोड़ के तराज़ू पर नहीं तौलना चाहिये। इस शब्द से मीडिया सिस्टम को भ्रष्ट कर रहा है।
शायद इसीलिये लड़कियों के लिये जोख़िम लेना आसान होता है क्योंकि लोग उनसे अपेक्षाएं(100 कोरड़) नहीं रखते!"
3.महिला अदाकारों को मेहनताना और सुविधाओं में मौजूद अंतर के खिलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिये।
अनुष्का का कहना है कि बराबर के दर्जे के बावजूद पुरुष और महिला कलाकर के मेहनतानें में बहुत फ़र्क होता है। यही नहीं सुविधाओं में भी फ़र्क किया जाता है। "मुझे नहीं मालूम कि ऐसा क्यों होता है लेकिन लगता है कि ऐसा होता है क्योंकि ये हमारे समाज में व्याप्त है। लड़कों को ज़्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। उदाहरण के लिये अगर कोई पुरुष कलाकरा महिला कलाकार के बराबर है लेकिन उसकी वजह से फ़िल्म पैसा कमाती है तो उसे ज़्यादा पैसा दिया जाएगा क्योंकि वह पुरुष है।
बॉलीवुड में नये लड़के और नयी लड़की के मेहताने में भी फर्क होता है। मान लिया जाता है कि पुरुष को ज़्यादा पैसे की ज़रुरत होती है। लोगों को लगता है कि पुरष को धर चलाना पड़ता है जबकि लड़की की तो देखरेख होती ही है इसलिये उसे ज़्यादा मिलना चाहिये। मैं किसी लालच में ये बात नहीं कह रही—मैं तो बस इतना कह रही हूं कि मेरी क़द्र करो क्योंकि अंत में आप इज़्ज़त ही चाहते हैं। और जब आप मुझे कम पैसा देते हैं तो इसका मतलब है कि आप मुझसे कह रहे हैं कि मेरी कम क़द्र है।
आप इस भेदभाव को मेहसूस कर सकते हैं। सिर्फ पैसे के मामले में ही नहीं, और भी कई मामलों में। आउटडोर शूटिंग में लड़के को आपसे बेहतर कमरा मिलता है। आख़िर हर होटल में दो कमरे तो अच्छे हो ही सकते हैं।"
4. कलाकारों को लोगों की बक़वास नहीं सुननी चाहिये
लिप जॉब से लेकर विराट कोहली से संबंध तक मीडिया ने अनुष्का की ज़ाती ज़िंदगी में घसने की कोई कसर नहीं छोड़ी।
"मैं खुद से कहती हूं कि अगर मैं न लोगों को सुनना शुरु कर दूं और उन्हें ये तय करने का हक़ दे दूं कि मुजे कैसे रहना चाहिये फिर तो ये मेरी नहीं उनकी ज़िंदगी हुई। मुझे कभी कभी दुख होता है। लगता है मुझे निशाना बनाया जा रहा है। आपको खुद को बताना होता है कि 'या तो आप इन सबकी सुनो और मैच देखने मत जाओ क्योंकि लोग तरह तरह की बातें करेंगे या फिर वो करो जो ठीक है। अगर मेरे विराट से संबंध हैं और वो चाहता है कि मैं उसका मैच देखने आऊं या मैं उसका मैच देखना चाहती हूं तो फिर मुझे क्यों नहीं जाना चाहिये। अगर मैं मैच देखने नहीं जाती तो इसका मतलब होगा जो बक़वास की जा रही है वो सच है।"