थिएटर से बाहर निकलते हुए एक अजीब सी कशमकश दिल में रह जाती है। जब आप ऐसी किसी फिल्म का टिकट खरीदते हैं, जो हमारे देश के इतिहास के एक बहुत बड़े और नाजुक हिस्से से जुड़ी हो तो उम्मीदें आसमान छू रही होती हैं। 'गवर्नर' भी एक ऐसी ही कहानी लेकर बड़े पर्दे पर आई है, जिसकी नीव बहुत मजबूत और दिलचस्प है। डायरेक्टर चिन्मय मांडलेकर और प्रोड्यूसर विपुल शाह ने एक ऐसी घटना को चुना है, जिसने आज के हिंदुस्तान की पूरी तकदीर को बदल कर रख दिया, लेकिन क्या यह फिल्म सिर्फ एक सरकारी दस्तावेज बनकर रह गई या फिर एक बेहतरीन सिनेमाई अनुभव दे पाई? आइए इस पर तफ्सील से बात करते हैं।
एक अनसुनी कहानी की शुरुआत
फिल्म की शुरुआत हमें सीधे उस दौर में ले जाती है जहां सब कुछ बहुत शांत दिख रहा है, लेकिन अंदर ही अंदर एक बहुत बड़ा तूफान पक रहा है। अमूमन ऐसी फिल्मों में पहले ही फ्रेम से सब कुछ साफ कर दिया जाता है, लेकिन 'गवर्नर' यहां थोड़ा सा अलग रास्ता चुनती है। शुरुआत में कहानी अपने पत्ते बहुत धीरे-धीरे खोलती है। यह किसी आम कमर्शियल फिल्म की तरह तेज तर्रार गानों या मारधाड़ से शुरू नहीं होती, बल्कि एक दफ्तर की खामोशी और फाइलों के बीच दबे उन राजों से होती है, जो पूरे देश की किस्मत तय करने वाले थे। फिल्म का माहौल आपको धीरे-धीरे अपनी तरफ खींचता है। यह देखना काफी दिलचस्प है कि कैसे एक आम इंसान को अचानक एक ऐसी कुर्सी पर बिठा दिया जाता है, जहाँ से गिरने का मतलब सिर्फ उसका नुकसान नहीं, बल्कि पूरे देश का दिवालिया होना था। निर्देशक ने शुरुआत में ही यह साफ कर दिया कि यह फिल्म किसी एक हीरो की नहीं, बल्कि उस कुर्सी और उस पर बैठे इंसान की जिम्मेदारी की कहानी है। यह शुरुआती हिस्सा काफी सधा हुआ है और दर्शकों के मन में एक उत्सुकता जगाता है कि आगे क्या होने वाला है।
कहानी और पटकथा का ताना-बाना
फिल्म की मुख्य कहानी साल 1991 के उस दौर पर आधारित है जब भारत के पास अपना देश चलाने के लिए फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व लगभग खत्म होने की कगार पर था। कहानी के केंद्र में हैं ए. रमणन (मनोज बाजपेयी), जिन्हें अचानक देश के राष्ट्रीय बैंक (आरबीआई) का गवर्नर बना दिया जाता है। रमणन का कोई बहुत बड़ा इकोनॉमिक्स का बैकग्राउंड नहीं है, इसलिए उनके खुद के डिप्टी गवर्नर सी रंगराजन (नौशाद मोहम्मद कुंजू) और सरकार के कई बड़े अधिकारी उन पर शक करते हैं।
रमणन जब कार्यभार संभालते हैं तो उनके सामने गल्फ वॉर की वजह से पैदा हुआ एक भयानक संकट खड़ा होता है। देश के पास सिर्फ कुछ ही हफ्तों का पैसा बचा है। इसके बाद शुरू होती है समय के खिलाफ एक ऐसी दौड़, जहां रमणन को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से बात करनी है, विदेशों से कर्ज लेना है और जरूरत पड़ने पर देश का सोना तक गिरवी रखना है। पटकथा इस पूरे आर्थिक संकट को बहुत ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश करती है, ताकि एक आम दर्शक भी यह समझ सके कि आखिर उस वक्त देश किस दौर से गुजर रहा था। जब लगता है कि सब कुछ ठीक हो रहा है, तभी रुपए की कीमत में भारी गिरावट आती है और कहानी में एक नया मोड़ आता है।
चिन्मय मांडलेकर का निर्देशन
चिन्मय मांडलेकर एक बेहद संवेदनशील निर्देशक हैं और उन्होंने इस फिल्म में भी अपनी उस संवेदनशीलता को बनाए रखने की पूरी कोशिश की है। इतिहास के इतने बड़े पन्ने को ढाई घंटे की फिल्म में समेटना कोई आसान काम नहीं है। चिन्मय की तारीफ इस बात के लिए होनी चाहिए कि उन्होंने आर्थिक संकट जैसे सूखे और तकनीकी विषय को भी मानवीय कोण से देखने की कोशिश की। उन्होंने फिल्म में कुछ ऐसे छोटे-छोटे सीन डाले हैं जो सीधे दिल को छूते हैं। मिसाल के तौर पर ट्रैफिक सिग्नल पर एक छोटी बच्ची से पेन खरीदने वाला सीन या फिर दफ्तर के चपरासी का बार-बार लोन मांगने की आदत से मुख्य किरदार को एक बहुत बड़ा आइडिया मिलना। ये वो पल हैं जहां चिन्मय का निर्देशन चमकता है। वह यह दिखाने में कामयाब रहे कि बड़े-बड़े फैसले एसी कमरों में बैठकर जरूर लिए जाते हैं, लेकिन उनका असर और प्रेरणा जमीन पर रहने वाले आम लोगों से ही आती है। हालांकि इतने भारी-भरकम विषय को संभालते हुए उनका नियंत्रण कुछ जगहों पर ढीला भी पड़ा, जिसके बारे में हम आगे बात करेंगे।
अभिनय में कौन चमका, कौन चूका?
अभिनय की बात करें तो मनोज बाजपेयी इस फिल्म के लिए रीढ़ की हड्डी साबित हुए हैं। उन्होंने ए रमणन के किरदार को पूरी ईमानदारी और शिद्दत से जिया है। मनोज जब भी स्क्रीन पर आते हैं, अपनी दमदार मौजूदगी से उस दृश्य का वजन बढ़ा देते हैं। देश को संकट से निकालने की फिक्र उनकी आंखों में साफ दिखती है, लेकिन इस बार उनके साथ एक छोटी सी समस्या रही। चूंकि वह एक तमिल अफसर का किरदार निभा रहे थे तो उनका लहजा और बोलने का तरीका एक्सेंट पूरी फिल्म में एक जैसा नहीं रह पाया। कुछ सीन्स में वह पूरी तरह तमिल बाबू लगते हैं, तो अगले ही पल वह अपने पुराने वाले अंदाज में आ जाते हैं। यह भटकाव थोड़ा खटकता है, फिर भी उनकी संजीदगी किरदार की गरिमा को बनाए रखती है।
सरप्राइज पैकेज के तौर पर नौशाद मोहम्मद कुंजू ने डिप्टी गवर्नर सी रंगराजन के रोल में कमाल का काम किया है। उन्होंने इस किरदार को जो ठहराव और गरिमा दी है, वह वाकई तारीफ के काबिल है। मनोज बाजपेयी के साथ उनके वैचारिक मतभेद वाले सीन फिल्म के सबसे बेहतरीन हिस्सों में से हैं। दूसरी तरफ मधू को रमणन की पत्नी के रूप में बहुत ही कम स्क्रीन टाइम मिला है, उनके पास करने के लिए कुछ खास नहीं था। अदा शर्मा ने एक निडर पत्रकार अदिति वर्मा का किरदार निभाया है। अदा ने अपने किरदार के साथ न्याय तो किया है, लेकिन कहानी में उनके किरदार की लिखावट ही इतनी कमजोर थी कि वह कोई गहरा असर नहीं छोड़ पातीं।
कहां रह गई कमी?
'गवर्नर' एक बहुत अच्छी फिल्म बन सकती थी, लेकिन यह सिर्फ एक ठीक-ठाक फिल्म बनकर रह गई। इसकी सबसे बड़ी वजह है फिल्म में प्रेशर कुकर वाले माहौल का गायब होना। जब कोई देश आर्थिक रूप से पूरी तरह तबाह होने वाला हो तो उस वक्त दफ्तरों में गलियारों में जो छटपटाहट, जो घबराहट और जो तनाव होना चाहिए, वह पर्दे पर महसूस ही नहीं होता। पटकथा इतनी ठंडी है कि आपको कभी यह डर ही नहीं लगता कि अगर हमारे गवर्नर साहब फेल हो गए तो क्या होगा। फिल्म संकट को बहुत बड़ा बताती तो है, लेकिन उसे महसूस कराने में नाकाम रहती है।
इसके अलावा फिल्म का पूरा ध्यान सिर्फ गवर्नर और डिप्टी गवर्नर पर ही टिका रहा। उस वक्त देश को बचाने में कई बड़े अर्थशास्त्रियों, नौकरशाहों और राजनेताओं की एक पूरी टीम शामिल थी, जिन्हें फिल्म में बिल्कुल बैकग्राउंड में धकेल दिया गया। सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच जो तीखी बहसें या टकराव होने चाहिए थे, उन्हें बहुत ही हल्के में निपटा दिया गया। फिल्म राजनीतिक दबावों और ब्यूरोक्रेसी की अड़चनों को छूती तो है, लेकिन गहराई में जाने से कतराती है। ऐसा लगता है कि मेकर्स किसी भी तरह के विवाद से बचना चाहते थे और इसी सेफ खेलने की आदत ने फिल्म के ड्रामे को फीका कर दिया। साथ ही फिल्म आज के समय के साथ कोई सीधा संवाद नहीं बना पाती कि आखिर 35 साल पुरानी इस कहानी को आज के दर्शकों को दिखाना क्यों जरूरी था।
वर्डिक्ट
कुल मिलाकर 'गवर्नर' इतिहास के एक बेहद महत्वपूर्ण और गौरवशाली अध्याय को जानने का एक अच्छा जरिया है, लेकिन एक सिनेमा के तौर पर यह पूरी तरह से बांध कर नहीं रख पाती। यह फिल्म उस सोने की तरह है जिसे चमकाने की कोशिश तो पूरी की गई, लेकिन उसकी भट्टी की आंच थोड़ी धीमी रह गई। अगर आपको देश का इतिहास, राजनीति और आर्थिक मामलों पर बनी फिल्में देखना पसंद है, तो मनोज बाजपेयी और नौशाद मोहम्मद कुंजू की बेहतरीन जुगलबंदी के लिए आप इसे एक बार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप 'अंडरकरंट' तनाव और रोंगटे खड़े कर देने वाले ड्रामे की उम्मीद लेकर जा रहे हैं तो शायद आपको थोड़ी निराशा होगी। हमारी तरफ से इस फिल्म को मिलते हैं 3 स्टार।