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ऑब्सेस रिव्यू: सड़क का मामूली विवाद और खौफनाक अंजाम, रोंगटे खड़े कर देगी एक्सपेरिमेंटल थ्रिलर

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : May 27, 2026 01:56 pm IST,  Updated : Jun 26, 2026 01:11 pm IST

'ऑब्सेस' सड़क पर हुए मामूली विवाद से शुरू होने वाली एक अलग शैली की साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म है। मुख्य कलाकारों का उम्दा अभिनय, बेहतरीन साउंड डिजाइन और लगातार बना रहने वाला तनाव इसकी ताकत है।

Obsess
पीटर विलसेन। Photo: STILL FROM TRAILER
  • फिल्म रिव्यू: ऑब्सेस
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 29.05.2026
  • डायरेक्टर: पीटर विल्सन
  • शैली: थ्रिलर

हिंदी सिनेमा में पारंपरिक और व्यावसायिक फिल्मों के समानांतर हमेशा से एक्सपेरिमेंटल सिनेमा का एक खास वजूद रहा है। लीक से हटकर बनाई जाने वाली ऐसी फिल्में अक्सर बड़े बजट, तड़क-भड़क वाले गानों और भारी-भरकम स्टारकास्ट पर निर्भर न होकर सीधे इंसानी मनोविज्ञान, अनूठे विषयों और किरदारों के अंतर्द्वंद्व पर ध्यान केंद्रित करती हैं। इस हफ्ते बॉक्स ऑफिस और डिजिटल स्पेस में दस्तक देने वाली क्राइम-साइकोलॉजिकल थ्रिलर 'ऑब्सेस' भी इसी शैली की एक अनूठी और साहसिक कोशिश है। यह फिल्म एक बेहद ही सीमित दायरे में बुनी गई कहानी है, जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन की एक आम घटना से शुरू होती है और देखते ही देखते मानसिक प्रताड़ना, खौफ और हिंसा के एक ऐसे खूनी खेल में बदल जाती है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचता। केवल दो मुख्य किरदारों के कंधों पर टिकी यह फिल्म दर्शकों को इंसानी गुस्से के सबसे काले और डरावने हिस्से से रूबरू कराने का दावा करती है। लेकिन क्या यह प्रयोगात्मक थ्रिलर दर्शकों को अंत तक बांधे रखने में पूरी तरह सफल हो पाती है या फिर अपनी ही धीमी रफ्तार के जाल में उलझकर रह जाती है?

कहानी

फिल्म की पटकथा की शुरुआत उत्तर भारत के एक गुमनाम शहर की बेहद अंधेरी और खामोश रात से होती है। एक सुनसान और वीरान घर के भीतर पीटर (पीटर विल्सन) नाम का एक व्यक्ति किसी की बेरहमी से हत्या कर देता है। पीटर कोई आम अपराधी नहीं है; वह मानसिक रूप से पूरी तरह अस्थिर और विक्षिप्त है। उसका मानना है कि यह पूरी दुनिया उसके खिलाफ है और उसने जो भी हिंसा की है, वह पूरी तरह जायज है। इस खौफनाक वारदात को अंजाम देने के बाद वह अपने ट्रक में बैठ जाता है, जहां वह भारी मात्रा में मानसिक अवसाद की दवाइयाँ खाता है और शराब पीने लगता है।

तभी उसके मोबाइल पर उसके बॉस का एक मैसेज आता है, जिसमें शराब पीकर गाड़ी चलाने की आदत के कारण उसे नौकरी से निकालने की बात लिखी होती है। इस अपमानजनक संदेश को पढ़ते ही पीटर का मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है और वह सीधे अपने बॉस के घर पहुंचकर उसकी भी हत्या कर देता है। इसके बाद वह एक चर्च के कन्फेशन बॉक्स में जाकर एक महिला की हत्या का गुनाह कबूल करता है, लेकिन सनक के चरम पर पहुंचकर वह वहाँ के फादर को भी मौत के घाट उतार देता है। अब उसका इंसानी समाज और भरोसे से पूरी तरह विश्वास उठ चुका है।

कहानी का दूसरा सिरा सारा (ईशा सिंह) से जुड़ता है। सारा अपने निजी जीवन में एक बेहद कठिन दौर से गुजर रही है। उसका अपने पति से अलगाव हो चुका है और वह कानूनी रूप से अपने इकलौते बेटे सचिन की कस्टडी किसी भी कीमत पर अपने पति को नहीं सौंपना चाहती। इसी तनाव के बीच वह अपने बेटे को साथ लेकर अपनी माँ के घर जाने के लिए कार से निकलती है। रास्ते में एक जगह सड़क निर्माण कार्य चलने के कारण उसे अपनी कार रोकनी पड़ती है।

ठीक इसी समय पीटर का ट्रक उसकी कार के पीछे आकर रुकता है। नशे और गुस्से में चूर पीटर बिना रुके लगातार हॉर्न बजाने लगता है। पहले से ही परेशान सारा का धैर्य जवाब दे जाता है। वह गुस्से में कार से उतरकर पीटर के ट्रक के पास जाती है और उसे उसकी इस बदतमीजी के लिए जमकर फटकार लगाती है। पीटर बिना कुछ बोले, शून्य आंखों से सिर्फ उसे घूरता रहता है। सारा कार में वापस लौट आती है, लेकिन वह इस बात से अनजान है कि उसने एक सोए हुए भेड़िए को जगा दिया है। यहीं से शुरू होता है बिल्ली और चूहे का एक खतरनाक खेल। मानसिक रूप से बीमार साइको किलर पीटर अब सारा और उसके बच्चे के पीछे हाथ धोकर पड़ जाता है, और कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुंच जाती है जहाँ सारा के बच्चे का अपहरण हो जाता है और हर पल सिर्फ मौत का साया मंडराने लगता है।

अभिनय और परफॉर्मेंस

चूंकि यह पूरी फिल्म केवल दो किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है, इसलिए अभिनय के मोर्चे पर दोनों ही कलाकारों के कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। पीटर विल्सन ने इस फिल्म में न केवल निर्देशन किया है, बल्कि मुख्य खलनायक 'पीटर' की भूमिका भी निभाई है। एक सायको किलर के रूप में उनका अभिनय वाकई काबिल-ए-तारीफ है। उन्होंने एक विक्षिप्त, समाज से कटे हुए और अंदर से पूरी तरह टूट चुके इंसान के गुस्से और हिंसक प्रवृत्ति को बिना किसी लाउड डायलॉगबाजी के, सिर्फ अपनी आंखों और चेहरे के हाव-भाव से पर्दे पर उतारा है। फिल्म में संवाद बेहद कम हैं, इसलिए कई दृश्यों में उनका सिर्फ शांत खड़े रहना या सारा को घूरना ही दर्शकों के भीतर एक अजीब सी असहजता और डर पैदा करने में कामयाब रहता है।

दूसरी तरफ ईशा सिंह ने 'सारा' के किरदार में पीटर विल्सन को बेहतरीन टक्कर दी है। उनके किरदार की कई परतें हैं। शुरुआत में वह एक आधुनिक, आत्मनिर्भर, थोड़ी गुस्सैल और अहंकारी महिला के रूप में दिखती हैं, जो किसी के आगे झुकना नहीं जानती। लेकिन जैसे ही कहानी आगे बढ़ती है और उनका बच्चा पीटर के चंगुल में फंस जाता है, ईशा सिंह ने एक बेबस और डरी हुई मां की तड़प, बेचैनी और अपने बच्चे को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने वाले जज्बे को बेहद खूबसूरती से निभाया है। खासकर फिल्म के उत्तरार्ध में पीटर और सारा के बीच के 'फेस-ऑफ' (सामना करने वाले) दृश्य फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी बन जाते हैं, जहां दोनों कलाकार बिना बोले स्क्रीन पर जबरदस्त तनाव पैदा कर देते हैं।

निर्देशन

निर्देशक के तौर पर पीटर विल्सन ने एक बेहद ही साहसिक और लीक से हटकर विषय को चुना है। सिर्फ दो किरदारों को लेकर पूरी दो घंटे की फिल्म को डायरेक्ट करना और उसमें थ्रिल बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है। विल्सन का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि उन्होंने फिल्म को पारंपरिक बॉलीवुड थ्रिलर की तरह सनसनीखेज बनाने के बजाय इसे एक शुद्ध 'साइकोलॉजिकल थ्रिलर' का रूप दिया है।

वह पीटर के दिमाग के भीतर चल रहे तूफ़ान और सारा के डर के बीच के मानसिक टकराव को लगातार परदे पर दिखाने में सफल रहे हैं। निर्देशक ने फिल्म में 'खामोशी'का इस्तेमाल एक हथियार की तरह किया है। बिना संवादों के सिर्फ किरदारों की सांसों की आवाज़, कदमों की आहट और उनके एक्सप्रेशंस के जरिए माहौल में तनाव बनाए रखना उनके सधे हुए निर्देशन की गवाही देता है। वह यह संदेश देने में पूरी तरह सफल रहते हैं कि सड़क पर हुआ एक पल का अनियंत्रित गुस्सा किस तरह किसी की पूरी जिंदगी को तबाह कर सकता है।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी तौर पर 'ऑब्सेस' एक बेहतरीन और उच्च दर्जे की फिल्म है, जो इसके कथानक को बहुत मजबूती देती है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इस फिल्म की असली रीढ़ की हड्डी है। रात के अंधेरे, सुनसान सड़कों, कार के भीतर के तंग दायरे और ट्रक के केबिन को कैमरे के लेंस से जिस तरह से दिखाया गया है, वह दर्शकों के भीतर एक किस्म का दमघोंटू माहौल पैदा करता है। डार्क टोन और शैडो लाइटिंग का इस्तेमाल फिल्म के मिजाज से पूरी तरह मेल खाता है।

फिल्म का साउंड डिजाइन और बैकग्राउंड स्कोर अद्भुत है। चूंकि फिल्म में संवाद लगभग ना के बराबर हैं, इसलिए बैकग्राउंड म्यूजिक ही कहानी को आगे बढ़ाने और दर्शकों के दिल की धड़कनें तेज करने का काम करता है। गाड़ियों के हॉर्न की कर्कश आवाज, सन्नाटे में गूंजती पीटर के कदमों की आहट और गाड़ियों के टकराने की आवाज़ों को बहुत बारीकी से मिक्स किया गया है, जो थ्रिलर के अनुभव को कई गुना बढ़ा देता है। फिल्म की एडिटिंग भी काफी क्रिस्प है, जो अनावश्यक दृश्यों को हटाकर कहानी को सीधे पॉइंट पर रखती है।

कहां कमी रह गई?

तमाम खूबियों और एक बेहतरीन तकनीकी टीम के बावजूद 'ऑब्सेस' एक मास्टरपीस बनने से चूक जाती है और इसकी वजह फिल्म के कुछ कमजोर पहलू हैं। सबसे बड़ी कमी है फिल्म की बेहद धीमी रफ्तार। प्रयोगात्मक सिनेमा के नाम पर कई जगहों पर दृश्यों को इतना लंबा खींच दिया गया है कि आम दर्शक थ्रिल महसूस करने के बजाय ऊबने लगता है। बिना संवादों के कहानी कहना एक अच्छा प्रयोग है, लेकिन एक समय के बाद यह प्रयोग अखरने लगता है और कहानी ठहरी हुई महसूस होती है।

दूसरी कमी इसकी पटकथा का अत्यधिक सीमित होना है। फिल्म की मूल कहानी सिर्फ एक सड़क विवाद और उसके बाद के पीछा करने पर टिकी है। इसके अलावा कहानी में कोई सब-प्लॉट या कोई बड़ा सरप्राइज एलिमेंट नहीं है। दर्शक बहुत पहले ही अंदाजा लगा लेते हैं कि क्लाइमेक्स किस दिशा में जाने वाला है, जिससे फिल्म की प्रेडिक्टेबिलिटी बढ़ जाती है। साथ ही पीटर के किरदार को इतना हिंसक क्यों दिखाया गया, उसके अतीत या उसकी मानसिक बीमारी के कारणों पर थोड़ा और प्रकाश डाला जाता, तो दर्शक उसके किरदार के प्रति और ज्यादा जुड़ाव या खौफ महसूस कर पाते।

निष्कर्ष

'ऑब्सेस' रेगुलर व्यावसायिक मसालों, गानों और मेलोड्रामा से दूर एक शुद्ध और संजीदा साइकोलॉजिकल थ्रिलर है। यह फिल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिक समाज में हमारा अनियंत्रित गुस्सा और मानसिक अवसाद कितना खतरनाक रूप ले सकता है। दोनों मुख्य कलाकारों का बेहतरीन अभिनय, कमाल का साउंड डिजाइन और निर्देशक की अनूठी सोच इस फिल्म को देखने लायक बनाते हैं। हालांकि इसकी धीमी गति के कारण यह हर वर्ग के दर्शकों को शायद पसंद न आए। यह फिल्म उन लोगों के लिए बेहतरीन है जो हॉलीवुड शैली का धीमा, गंभीर और प्रयोगात्मक सिनेमा देखना पसंद करते हैं। यदि आप बिना किसी शोर-शराबे के सिर्फ किरदारों के अभिनय और तकनीकी बारीकियों के दम पर चलने वाली फिल्में पसंद करते हैं तो 'ऑब्सेस' आपको एक बार ज़रूर देखनी चाहिए।

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