भारतीय इतिहास के पन्नों में छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम केवल एक राजा के रूप में नहीं, बल्कि एक देवता के रूप में दर्ज है। उनकी वीरता, नीति और स्वराज्य के प्रति उनके समर्पण की कहानियां पीढ़ियों से हमें प्रेरित करती आई हैं। सिनेमाई पर्दे पर जब भी महाराज की गाथा को उतारा जाता है तो दर्शकों की भावनाएं और उम्मीदें सातवें आसमान पर होती हैं। मराठी सिनेमा ने महाराज को हमेशा एक सांस्कृतिक नायक के रूप में प्रस्तुत किया है। इसी कड़ी में अभिनेता-निर्देशक रितेश देशमुख का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 'राजा शिवाजी' अब हमारे सामने है। यह फिल्म रितेश का एक पुराना सपना है, जिसे उन्होंने सालों के इंतजार और कई बदलावों के बाद खुद निर्देशित और निर्मित किया है। एक प्रशंसक के तौर पर महाराज की जय-जयकार करने वाली किसी भी फिल्म को नापसंद करना असंभव है, लेकिन एक समीक्षक के तौर पर इस फिल्म का विश्लेषण करना जरूरी है। यह फिल्म एक भव्य श्रद्धांजलि तो है, लेकिन क्या यह एक शानदार सिनेमाई अनुभव दे पाती है? ये आपको हम बताएंगे।
प्लॉट क्या है?
फिल्म की शुरुआत 17वीं शताब्दी के उस दौर से होती है जब भारत की धरती बाहरी आक्रांताओं के अत्याचारों से कराह रही थी। उत्तर में शाहजहां का प्रभाव बढ़ रहा था तो दक्षिण में आदिल शाह और निजाम शाह अपनी जड़ें जमाए हुए थे। महाराष्ट्र की जनता इन सुल्तानों के बीच पिस रही थी। कहानी हमें शाहजी भोसले के दौर में ले जाती है, जिन्हें पुणे की जागीर सौंपी गई थी। शिवाजी महाराज के जन्म के बाद मां जीजाबाई के संरक्षण में पुणे में स्वराज्य का बीज बोया जाता है। फिल्म बारीकी से दिखाती है कि कैसे जीजाबाई ने युवा शिवबा के मन में स्वतंत्रता की मशाल जलाई। जैसे-जैसे शिवाजी महाराज बड़े होते हैं, वे किलों को जीतना शुरू करते हैं, तोरणा, कोंढाणा और पुरंदर की विजय गाथाएं दर्शकों में जोश भरती हैं।
कहानी में मुख्य मोड़ तब आता है जब आदिल शाह महाराज को गंभीरता से लेना शुरू करता है और उनके पिता शाहजी राजे को बंदी बना लिया जाता है। इसके बाद अफजल खान का उदय और महाराज के साथ उसका वह ऐतिहासिक टकराव फिल्म का मुख्य आधार बनता है। यह कहानी केवल युद्ध की नहीं, बल्कि कूटनीति, बलिदान और उस अटूट संकल्प की है जिसे 'स्वराज्य' कहा गया।
निर्देशन
विजन बड़ा है, पर अनुभव की कमी ये साफ नजर आता है। रितेश देशमुख ने इस फिल्म के साथ एक बड़ा जोखिम उठाया है। नागराज मंजुले और रवि जाधव जैसे दिग्गजों के इस प्रोजेक्ट से हटने के बाद रितेश ने इसकी कमान संभाली। निर्देशन के मोर्चे पर रितेश का विजन निश्चित रूप से भव्य है। वे जानते हैं कि बड़े पर्दे पर मास यानी आम जनता को क्या पसंद आता है। हालांकि फिल्म देखते समय महसूस होता है कि उन्हें एक निर्देशक के रूप में अभी काफी कुछ सीखना बाकी है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका डेली सोप जैसा प्रोजेक्शन है। कई सीन इतने नाटकीय हैं कि वे ऐतिहासिक गंभीरता को थोड़ा कम कर देते हैं। एक भव्य ऐतिहासिक फिल्म के लिए जिस तरह की गहराई और ठहराव की जरूरत होती है, वह कहीं-कहीं गायब दिखता है। रितेश ने फिल्म को 'लार्जर दैन लाइफ' बनाने की कोशिश तो की है, लेकिन कहानी कहने के पारंपरिक और आधुनिक तरीकों के बीच वे थोड़े उलझे हुए नजर आते हैं। इसके बावजूद फिल्म के क्लाइमेक्स को उन्होंने जिस तरह हैंडल किया है, वह उनकी निर्देशकीय क्षमता का सबसे मजबूत हिस्सा है।
अभिनय
मुख्य भूमिका में रितेश देशमुख ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। कुछ दृश्यों में उनकी सादगी और कुछ में उनका रौद्र रूप प्रभावित करता है। हालांकि कहीं-कहीं वे अपनी पुरानी फिल्म 'लय भारी' वाले अंदाज में नजर आते हैं, जो महाराज के किरदार की गरिमा के साथ थोड़ा विरोधाभास पैदा करता है। फिर भी एक्शन सीक्वेंस और स्लो-मोशन शॉट्स में वे काफी जचते हैं। जेनेलिया डिसूजा ने महारानी सईबाई का किरदार निभाया है, लेकिन उनके मराठी लहजे में अभी भी वह सहजता नहीं आ पाई है जो इस तरह के ऐतिहासिक पात्र के लिए अनिवार्य थी।
विद्या बालन जैसी दिग्गज अभिनेत्री को फिल्म में बहुत कम मौका मिला है, जिससे उनके प्रशंसकों को थोड़ी निराशा हो सकती है। उनके चेहरे के भाव कई बार टीवी सीरियल्स की याद दिलाते हैं। संजय दत्त ने अफजल खान के रूप में शानदार काम किया है। उनकी कद-काठी और दमदार आवाज ने अफजल खान के खौफ को पर्दे पर बखूबी उतारा है। अभिषेक बच्चन का कैमियो और मराठी संवाद सुनने में थोड़े असहज लगते हैं, जबकि फरदीन खान का किरदार बिना किसी खास प्रभाव के शुरू और खत्म हो जाता है। सचिन खेडेकर और भाग्यश्री जैसे मंझे हुए कलाकारों ने अपने अनुभव से फिल्म को सहारा दिया है। अंत में सलमान खान की धमाकेदार मौजूदगी फिल्म की स्टार पावर में चार चांद लगा देती है।
फिल्म में क्या खलता है?
'राजा शिवाजी' की सबसे बड़ी समस्या इसकी लंबाई और एडिटिंग है। तीन घंटे से अधिक की यह फिल्म कई जगहों पर खिंची हुई महसूस होती है। फिल्म की गति ऊपर-नीचे होती रहती है, जिससे दर्शक कई बार बेचैन हो सकते हैं। पटकथा में निरंतरता की कमी है, एक सीन से दूसरे सीन पर जाने में वो सहजता नहीं है जो एक विश्वस्तरीय ऐतिहासिक ड्रामा में होनी चाहिए। एक्शन दृश्यों में तर्क की तलाश करना व्यर्थ है, लेकिन उनमें एक सुसंगत ढांचा होना चाहिए था, जिसकी यहां कमी खलती है। फिल्म का कुछ हिस्सा तकनीक के मामले में बहुत आधुनिक लगता है तो कुछ हिस्सा बहुत पुराना। यह असंतुलन फिल्म के समग्र प्रभाव को थोड़ा हल्का कर देता है।
तकनीकी पक्ष
तकनीकी रूप से फिल्म एक मिला-जुला अनुभव है। सिनेमैटोग्राफी अच्छी है और महाराष्ट्र की सह्याद्रि श्रेणियों को खूबसूरती से कैद किया गया है, लेकिन कलर ग्रेडिंग कई जगह असंगत लगती है। साउंड डिजाइन और बैकग्राउंड स्कोर औसत है, जो कई महत्वपूर्ण दृश्यों के प्रभाव को बढ़ा नहीं पाता। हालांकि अजय-अतुल का संगीत इस फिल्म की जान है। छत्रपति शिवाजी महाराज का एंथम और फिल्म के गाने रोंगटे खड़े कर देते हैं। उनका संगीत फिल्म के साधारण दृश्यों को भी असाधारण बना देता है। अजय-अतुल ने एक बार फिर साबित किया है कि महाराज के गौरव गान में उनका कोई सानी नहीं है।
वर्डिक्ट
'राजा शिवाजी' एक ऐसी फिल्म है जिसे आप अपनी बुद्धि से नहीं, बल्कि अपने दिल से देखते हैं। इसमें खामियां हैं, यह कहीं-कहीं बचकानी भी लगती है और संपादन के मामले में कच्ची भी है। लेकिन, जब पर्दे पर भगवा परचम लहराता है और महाराज का जयघोष होता है, तो सारी शिकायतें गौण हो जाती हैं। फिल्म का आखिरी 20 मिनट का क्लाइमेक्स और महाराज का अदम्य साहस दर्शकों को अपनी सीटों से उठकर तालियां बजाने पर मजबूर कर देता है। रितेश देशमुख ने अपनी क्षमता के अनुसार एक भव्य श्रद्धांजलि देने की कोशिश की है, जो व्यावसायिक रूप से सफल साबित होगी। यह फिल्म सिनेमाई बारीकियों के लिए नहीं, बल्कि उस गौरव और गर्व के लिए देखी जानी चाहिए जो हमें अपने इतिहास पर है। यदि आप छत्रपति शिवाजी महाराज के भक्त हैं, तो आप इस फिल्म के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस करेंगे। सिनेमाई कमियों के बावजूद, 'शिवराय' का नाम ही इस फिल्म को देखने के लिए पर्याप्त कारण है। 'राजा शिवाजी' एक भव्य मगर थोड़ी बिखरी हुई फिल्म है। यह महाराज के प्रति रितेश देशमुख का प्रेम और श्रद्धा है जो इस फिल्म को डूबने से बचा लेती है। इसे केवल उस 'पीक शिवराय-इज्म' के लिए देखें जो अंत में आपको एक अलग ही रोमांच से भर देगा।