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'शतक' रिव्यू: वीरता के किस्से और कुछ अनकहे सवालों के बीच संघ का सफर, एक संगठन के बनने की सजीव कहानी

 Written By: जया द्विवेदी
 Published : Feb 20, 2026 10:32 am IST,  Updated : Feb 20, 2026 11:21 am IST

निर्देशक आशीष मॉल की फिल्म 'शतक: संघ के 100 साल' RSS के शताब्दी सफर की गाथा है। AI तकनीक के जरिए डॉ. हेडगेवार और गुरुजी के संघर्षों को जीवंत किया गया है। वीरता और राष्ट्र निर्माण पर केंद्रित यह फिल्म समर्थकों के लिए प्रेरणादायक है।

Shatak
शतक। Photo: PRESS KIT
  • फिल्म रिव्यू: शतक
  • स्टार रेटिंग 3.5/5
  • पर्दे पर: 20/02/2026
  • डायरेक्टर: आशीष मॉल
  • शैली: डॉक्यू ड्रामा

भारतीय सिनेमा के पर्दे पर वैचारिक और ऐतिहासिक विषयों को उतारने का चलन बढ़ता जा रहा है और इसी कड़ी में हालिया फिल्म ‘शतक: संघ के 100 साल’ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में सामने आई है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह फिल्म राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक सदी लंबे सफर की गाथा कहती है। फिल्म का मुख्य केंद्र संगठन की स्थापना, उसकी विचारधारा और इसके दो सबसे प्रभावशाली स्तंभों डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और माधव सदाशिव गोलवलकर गुरुजी के जीवन संघर्षों को दिखाना है। निर्देशक ने आरएसएस को एक ऐसे संगठन के रूप में पेश करने की कोशिश की है, जो प्रत्यक्ष राजनीति की चकाचौंध से दूर रहकर मौन रूप से राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुटा रहा। आरएसएस (RSS) को लेकर दशकों से चल रही बहसों और आलोचनाओं के बीच फिल्म 'शतक' एक अलग अनुभव देगी। डायरेक्टर आशीष मॉल ने अपनी समझ और बारीकी से इस फिल्म को सिर्फ एक डॉक्युमेंट्री नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव बना दिया है जो सीधे आरएसएस के जन्म से शुरू हुई सोच को दर्शाती है। उन्होंने इतिहास के सूखे पन्नों को एक जीती-जागती कहानी में बदल दिया है, जहां दर्शक सिर्फ घटनाओं को देखते नहीं बल्कि उन्हें महसूस कर सकते हैं।

कहानी

कहानी की शुरुआत नागपुर के उन गलियों से होती है जहाँ केशव बलिराम हेडगेवार का बचपन बीता। फिल्म उन्हें एक कुशाग्र, अनुशासित और प्रखर राष्ट्रवादी बालक के रूप में चित्रित करती है। उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ वह त्रासदी है, जब प्लेग की महामारी में उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया। इस व्यक्तिगत दुख ने उनके भीतर समाज सेवा और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना को और प्रबल कर दिया। आगे चलकर, पुणे और कलकत्ता में उनकी डॉक्टरी की पढ़ाई और ‘अनुशीलन समिति’ जैसे क्रांतिकारी समूहों के साथ उनके जुड़ाव को बड़े विस्तार से दिखाया गया है। फिल्म यह स्थापित करती है कि इन्हीं अनुभवों ने उनकी सोच को आकार दिया और अंत में 1925 में विजयदशमी के दिन आरएसएस की नींव पड़ी। फिल्म का दूसरा बड़ा हिस्सा एमएस गोलवलकर के इर्द-गिर्द घूमता है, जिन्हें ‘गुरुजी’ के नाम से जाना जाता है। उन्हें एक ऐसे आध्यात्मिक और दृढ़निश्चयी नेता के रूप में दिखाया गया है, जिन्होंने हेडगेवार के सपने को एक संगठनात्मक ढांचा दिया और कार्यकर्ताओं के एक विशाल नेटवर्क को खड़ा किया।

फिल्म कई ऐतिहासिक प्रसंगों को भी उजागर करती है, जैसे दादरा और नगर हवेली को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराने का अभियान (जिसमें लता मंगेशकर के योगदान का भी ज़िक्र है) और 1948 के कश्मीर संकट के दौरान संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका। फिल्म दिखाती है कि कैसे भारतीय सेना के पहुंचने से पहले स्वयंसेवकों ने अपनी जान जोखिम में डालकर सीमाओं की रक्षा की। हालांकि जहां एक तरफ फिल्म वीरता और समर्पण के किस्से सुनाती है, वहीं दूसरी तरफ यह ऐतिहासिक रूप से काफी ‘सेलेक्टिव’ या चयनात्मक भी नजर आती है। उदाहरण के तौर पर जब फिल्म महात्मा गांधी की हत्या जैसे संवेदनशील मुद्दे का जिक्र करती है तो वह नाथूराम गोडसे के नाम या उससे जुड़े विवादों से पूरी तरह बच निकलती है। इन कमियों के कारण ‘शतक’ एक निष्पक्ष ऐतिहासिक दस्तावेज के बजाय संगठन की उपलब्धियों पर ज्यादा फोकस करने वाली एकतरफा कहानी पेश कर रही है। आजादी के बाद के भारत के चित्रण में फिल्म जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी को प्रबल विरोधियों के रूप में पेश करती है, जिन्होंने संगठन के प्रभाव को कम करने की कोशिश की, लेकिन यहां भी फिल्म की दृष्टि संकुचित है, वह यह विश्लेषण नहीं करती कि इन नेताओं के संघ के साथ वैचारिक मतभेद क्यों थे। इसके बजाय, पूरे राजनीतिक तनाव को सही बनाम गलत के एक सरल युद्ध की तरह दिखाया गया है, जहां बारीकियों और तर्कों की हल्की झलक हैं। अगर फिल्म में दूसरे पक्ष को भी उतनी ही गंभीरता से दिखाया जाता तो ये मास्टरपीस बन सकती थी। फिलहाल सिनेमैटिक प्वाइंट से देखें और आरएसएस का पक्ष समझे तो ये कहानी आपको पसंद आएगी।

इतिहास को नए अंदाज में पेश करती फिल्म

‘शतक’ शुरुआत से ही साफ कर देती है कि यह सिर्फ पुरानी घटनाओं को दोहराने वाली फिल्म नहीं है। मेकर्स ने लेटेस्ट टेक्नोलॉजी और लाइव-एक्शन का इस्तेमाल करके ऐतिहासिक किरदारों और पलों को काफी रियल और प्रभावशाली बनाया है। कई सीन ऐसे लगते हैं जैसे आप उसी दौर में मौजूद हों। डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार को फिल्म में बेहद सम्मान और संवेदना के साथ दिखाया गया है। उनका सादा जीवन, शुरुआती संघर्ष और एक विचार को जमीन पर उतारने की उनकी लगन दिल को छूती है। छोटे-छोटे मैदानों में बैठकों से शुरू हुआ सफर कैसे 100 साल की यात्रा बनता है, यह देखना प्रेरक है। फिल्म उन्हें सिर्फ संस्थापक नहीं, बल्कि दूर तक सोचने वाले व्यक्तित्व के रूप में सामने लाती है। जब कहानी माधव सदाशिव गोलवलकर के समय में पहुंचती है तो माहौल थोड़ा गंभीर हो जाता है। आजादी के बाद और महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंधों को फिल्म ने बिना ज्यादा ड्रामा किए संतुलित तरीके से दिखाया है। उस दौर में संगठन को फिर से खड़ा करना आसान नहीं था और यही हिस्सा फिल्म को गहराई देता है, लेकिन अगर इसमें गोडसे की भूमिका और बेहतर तरीके से जोड़ी जाती तो कहानी का रंग कुछ और ही होता। फिल्म में दादरा और नगर हवेली की मुक्ति और कश्मीर से जुड़े घटनाक्रम को भी दिखाया गया है। इन सीन में यह एहसास होता है कि कई बार बड़े फैसलों के पीछे ऐसे लोग होते हैं जो सामने नहीं दिखते, लेकिन असर बड़ा छोड़ते हैं।

निर्देशन

तकनीकी पक्ष की बात करें तो ‘शतक’ पूरी तरह से आधुनिक तकनीक, विशेषकर CGI और VFX पर टिकी है। ऐतिहासिक चेहरों को दोबारा बनाने के लिए VFX का उपयोग प्रभावी है, कई हिस्सों में ये काफी भव्य लगता है। कभी-कभी यह इतना अधिक पॉलिश और साफ-सुथरा लगता है कि वास्तविकता से पूरी तरह जोड़ता है। कुल मिलाकर यह फिल्म संघ के समर्थकों के लिए एक प्रेरणादायक अनुभव हो सकती है। हां लेकिन आप लेफ्ट के इतिहास को भी इस फिल्म में गहराई से समझना चाहते हैं तो उसकी कमी खलेगी, लेकिन अगर आप सिर्फ संघ के इतिहास को समझने में दिलचस्पी रखते हैं तो ये फिल्म पूरी तरह से आपके लिए हैं। निर्माण और निर्देशन में टीम ने संतुलन बनाए रखा है। फिल्म में सनसनी या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि सादगी और गंभीरता के साथ कहानी कही गई है। अजय देवगन की आवाज में नरेशन भी प्रभावी लगता है। बता दें, वीर कपूर इसके प्रोड्यूसर हैं और कॉन्सेप्ट अनिल धनपत ने दिया है।

फाइनल वर्डिक्ट

आशीष मॉल द्वारा डायरेक्टेड और वीर कपूर द्वारा प्रोड्यूस फिल्म ‘शतक’ एक ऐसी फिल्म है जो RSS के इतिहास को सिर्फ बताती नहीं, महसूस भी कराती है। RSS को लेकर एक अलग दृष्टिकोण पेश करती है और हां, ये फिल्म संघ को घृणा के भाव से देखने वाले लोगों के मन में गरमाहट जरूर पैदा कर सकती है। पहले 50 सालों की कहानी मजबूत तरीके से पेश की गई है और आगे की यात्रा देखने की उत्सुकता भी छोड़ती है। यह फिल्म एक विचार और उसे जीने वाले लोगों को समर्पित नजर आती है।

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